Arya Samaj Indore
08/03/2016
सोमो॑ अ॒स्मभ्यं॑ द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे च प॒शवे॑ । अ॒न॒मी॒वा इष॑स्करत् ॥ ऋग्वेद 3.62.14
somo asmabhyaṁ dvipade catuṣpade ca paśave | anamīvā iṣas karat ॥
पदार्थः हे मनुष्यो ! जो (सोमः) चन्द्रमा (द्विपदे) मनुष्य आदि (अस्मभ्यम्) हम लोगों के (चतुष्पदे) गौ आदि के (च) और (पशवे) अन्य पशु के लिये (अनमीवाः) रोग निवर्त्तक (इषः) अन्न आदि ओषधिसमूहों को (करत्) करै उसका सबकाल में सत्कार करो।
भावार्थः जो वैद्य लोग सब दो पैरवाले अर्थात् मनुष्य आदि और चौपाये गौ आदिकों को रोगरहित करैं वे सब लोगों को मान करने योग्य होवैं।
06/03/2016
महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी के बोधोत्सव को आर्य समाज, महर्षि दयानंदगंज, इंदौर में सहर्ष मानते हुए नगर के आर्यजन
आखिर क्या थे ऋषि दयानन्द ???
मित्रों देव दयानन्द के सम्बन्ध में यूं तो सभी ने अपने-अपने विचार रखे हैं किसी ने प्रशंसा में तो किसी ने आलोचना में भी अपनी बात कही है |
परन्तु एक ऐसे भी हुए हैं जिनके विचार और श्रध्दा ऋषि के प्रति अपने अाप में अद्वितीय हैं और वो हैं अल्लामा चम्पतराय "सादिक" |
अरे भाई ! नहीं पहचाने; चलो मैं ही बता देता हुँ, ये विद्वान वो हैं जिन्होनें उस वक्त मोर्चा संभाला जब मुस्लिम न जाने श्री कृष्ण के पावन चरित्र पर क्या क्या आपत्तिजनक और अश्लील पुस्तके रच रहे थे तब इन्होनें जो प्रामाणिक पुस्तक "रंगीला रसूल" लिखी उसने मुस्लिमों को पूरी तरफ बौखला दिया ऐसे हमारे विद्वान; पश्चात् "पं० चमूपति एम• ए•" के नाम से जाने गये |
पं० जी ने ऋषि के सम्बन्ध में लिखते हैं कि...
"दयानन्द केवल भक्ति नहीं, केवल वीरता नहीं, बन्धुत्व नहीं, एकेश्वरवाद नहीं, सत्यनिष्ठा और विद्वत्ता नहीं | दयानन्द ये सब कुछ है | किसी को बुरा न लगे तो दयानन्द मानवता है |"
बहुत से जन अपने से पूर्वो की बात केवल इस्लिए ही मानते हैं क्योंकि वो उनके नबी हुए हैं, गुरू हुए हैं या मसीहा आदि परन्तु पं० जी देव दयानन्द के सम्बन्ध में लिखते हैं कि...
"दयानन्द का कथन है, इस लिए न मानो कि दयानन्द का वचन है | इस कारण मानो कि तुम्हारी बुध्दि का है | मलीन बुध्दि का नहीं | परिपक्व बुध्दि का है |"
पं० जी ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि "यात्रा का आनन्द ध्येय प्राप्ति में नहीं, यात्रा में ही है |" और इसी विचार को पढ़कर अमर क्रान्तिकारी रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने निम्न पंक्ति "लज़्ज़ते सहरा नवर्दी दूरीय मनज़िल में है |" को रचा |
आगे पं० जी के ही शब्दों में सुनते हैं कि दयानन्द क्या था और क्या नहीं था जिसे उनहोंने सुरो के माध्यम से बताया हैं...
दयानन्द परमात्मा न था, ये नीचा सुर था | दयानन्द परमात्मा का प्रतिनिधि था जैसे हम हैं, ये ऊंचा सुर था |
दयानन्द पूर्ण न था, ये नीचा सुर था | दयानन्द पूर्णता का प्रयास था ये ऊंचा सुर था |
दयानन्द ने ब्राह्मण को मनुष्य कहा, ये नीचा सुर था | दयानन्द ने शूद्र को ब्राह्मण बनाया, ये ऊंचा सुर था |
दयानन्द ने पुरूष को पुरूष कहा, ये नीचा सुर था | दयानन्द ने स्त्री को पुरूष की माता बताया, ये ऊंचा सुर था |
दयानन्द व्यक्ति हुआ, ये पतला सुर था | दयानन्द समाज बन गया, ये मोटा सुर था |
दयानन्द फल भोगने में स्वतन्त्र था, ये मध्दम सुर था | दयानन्द कर्म करने में स्वतन्त्र था, ये ऊंचा सुर था |
अन्त मैं मैं भी बस यही कहुगाँ कि...
दयानन्द मानवता है |
दयानन्द मानवता है |
दयानन्द मानवता है |
ओ३म्...!
जय आर्य ! जय आर्यावर्त !!
04/11/2015
बतायें तुम्हें हम दयानन्द क्या थे ?
ऋषि थे मुनि थे कोई देवता थे ।
अँधेरे में ठोकर जो जन खा रहे थे ।
वह उन गुमरहों के लिए रहनुमां थे ।
जिन्हें हमने गलती से समझा था दुश्मन ।
वही राष्ट्र-नौका के नाविक महा थे ।
उन्हीं की थी हिम्मत बचाया अगर ना ।
निशां हिंदुओं के मिटे जा रहे थे ।
गरज कोई माने न माने 'मुसाफिर' ।
दयानन्द दर्दे वतन की दवा थे ।
बतायें तुम्हें हम दयानन्द क्या थे ।
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