LLB Academy
02/03/2026
प्रिथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ
साइटेशन: 2020 SCC OnLine SC 159
न्यायालय: सर्वोच्च न्यायालय
निर्णय दिनांक: 10 फ़रवरी 2020
पृष्ठभूमि (Background)
यह मामला अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018 की संवैधानिक वैधता से संबंधित है। यह संशोधन सर्वोच्च न्यायालय के Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra (2018) के निर्णय को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया था, जिसमें गिरफ़्तारी से पहले प्रारंभिक जाँच और अनुमति जैसी शर्तें लगाई गई थीं।
मुख्य विधिक प्रश्न
क्या 2018 का संशोधन अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करता है?
क्या धारा 18A, जो अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) पर रोक लगाती है, असंवैधानिक है?
क्या असाधारण परिस्थितियों में न्यायालय अग्रिम ज़मानत दे सकता है?
निर्णय (Held)
सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के संशोधन को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष
अग्रिम ज़मानत पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं:
यद्यपि धारा 18A अग्रिम ज़मानत पर रोक लगाती है, फिर भी यदि प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या शिकायत दुर्भावनापूर्ण (mala fide) है, तो न्यायालय अग्रिम ज़मानत दे सकता है।
प्रारंभिक जाँच अनिवार्य नहीं:
एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जाँच करना सामान्य नियम नहीं है, हालांकि विशेष परिस्थितियों में की जा सकती है।
दुरुपयोग के आधार पर क़ानून असंवैधानिक नहीं:
केवल दुरुपयोग की संभावना के आधार पर इस सामाजिक संरक्षण क़ानून को रद्द नहीं किया जा सकता।
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