Mohd Raza Sid
19/03/2021
आज के भारत को देखिए तो लगता है कि हम अंग्रेजों की "फूट डालो और राज करो" नीति का लाइव देख रहे हैं। हर वर्ग परेशान है, हर वर्ग अपने स्तर पर विरोध करना चाहता है, लेकिन दूसरे के विरोध को वह "देश का विरोध" या गलत काम समझ रहा है।
आप क्रोनोलॉजी समझिए।
पहले मुसलमानों पर हमला किया गया। उनपर फर्जी गौरक्षकों ने हमले किए, हत्याएं कीं, उनके खिलाफ अभियान चलाए गए। जो पार्टी केरल, गोवा और पूर्वोत्तर में 'उच्च कोटि का बीफ सप्लाई' करने का वादा करती है, वही पार्टी यहां हत्यारों को माला पहना रही थी। अखलाक के हत्यारों को भगत सिंह के वारिस बता रही थी। सीएए जैसा कानून इसी लिंचिंग नीति का विस्तार था। लेकिन तब तमाम हिंदू इसके समर्थन में थे। पढ़े लिखे लोगों ने रिटायर्ड जजों तक की बात नहीं सुनी और माना कि सीएए अच्छा कानून है।
फिर नम्बर आया छात्रों का। कैम्पस-दर-कैम्पस छात्रों पर सरकारी हमले किये गए। देशद्रोही खोजे गए। जो भी छात्र या उनके संगठन सरकार का विरोध कर सकते थे, उन्हें जेलों में डाला गया। जिनको भी जेल भेजा गया था, उनमें से किसी का कोई अपराध आजतक सिद्ध नहीं हुआ। लेकिन तमाम लोग ये मानने लगे कि अमुक विचार वाले या अमुक विवि वाले छात्र देशद्रोही होते हैं।
फिर नम्बर आया बुद्धिजीवियों का। देश भर के पढ़े लिखे लोगों, प्रोफेसर, लेखक, कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया गया, उन्हें जेल में डाला गया। तब तक बड़ी संख्या में हिन्दू जनता ये मानने को तैयार हो चुकी थी कि बुद्धिजीवी देशद्रोही होते हैं। कई बुद्धिजीवी अब भी जेलों में हैं लेकिन उनकी रिहाई की मांग तक नहीं हुई।
फिर नम्बर आया मजदूरों का। लेबर लॉ बदल कर उनकी सुरक्षा खत्म की गई। थोड़ा बहुत विरोध हुआ और बात खत्म हो गई।
फिर नम्बर आया किसानों का। कानून बनाकर खेती के निजीकरण का रास्ता साफ किया गया। किसान महीनों से सड़क पर हैं, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई। सरकार के कुछ पालतू मगर आवारा कुत्तों ने प्रचारित करने की कोशिश की कि ये किसानों का नहीं, खालिस्तान का आंदोलन है। गुलाम सोच के लोग किसानों की परेशानी सुनने की जगह ये मानने में ज्यादा सुविधा महसूस करते हैं कि ये 'आंदोलन देश के खिलाफ' कोई षड्यंत्र है।
अब ताज़ा नम्बर बैंक कर्मचारियों का है। 10 लाख कर्मी हड़ताल पर गए तो मीडिया ने शर्माते हुए छोटी छोटी खबर दिखा दी। सुना है बीमा कंपनियों के लोग भी सड़क पर उतरने वाले हैं। वे भी इसी दुख के मारे होंगे कि उनके आंदोलन का असर कम रहा।
इन आंदोलनों का सरकार पर असर क्यों नहीं पड़ता? क्योंकि जो वर्ग आंदोलन कर रहा है, उसे छोड़कर बाकी उसपर शक कर रहे होते हैं।
इस पूरी क्रोनोलॉजी में दो कॉरपोरेट का जबर मुनाफा हुआ। अम्बानी और अडानी। जब देश की अर्थव्यवस्था माइनस में है, जब करोड़ो लोग बेरोजगार हैं, तब इन दोनों की अमीरी दुनिया भर में जलवा बिखेर रही है। देश की आर्थिकी जितनी नीचे जा रही है, इन दोनों के खजाने उतनी तेजी से भर रहे हैं।
आज जो सड़क पर हैं और निराश हैं, हो सकता है कि कल उन्होंने भी छात्रों को 'पाकिस्तानी' और किसानों को 'खालिस्तानी' भी कहा हो। कल वे छात्र अकेले थे, वे बुद्धिजीवी अकेले थे, वे मजदूर अकेले थे, वे डरे हुए मुसलमान अकेले थे, आज आप अकेले हैं।
सरकार अपने मकसद में सफल है। आप बंटे हुए हैं और असफल हैं। आपकी एकजुटता तोड़कर सरकार सफल है। आपकी आपसी कलह सत्ता की सफलता की गारंटी है, चाहे दिन कितने भी बुरे आ जाएं।
आखिर बांटो और राज करो की नीति अंग्रेजों की है जो भारतीय जनता को कुचलने के लिए अपनाई जाती थी।
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#गर्व_से_कहो_हम_भारतीय_हैं
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