Progressive Students Front- PSF

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Photos from Progressive Students Front- PSF's post 22/04/2026

दोस्तो,
LGBTQ समुदाय के अधिकारों को प्रभावित करने वाला प्रस्तावित LGBTQ बिल 2026 गहरी चिंता का विषय है, क्योंकि यह बिल कथित रूप से लैंगिक पहचान और यौनिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंधात्मक प्रावधान लागू करने की दिशा में है, जो न केवल एक विशेष समुदाय के अस्तित्व, पहचान और गरिमा पर सवाल खड़ा करता है। हिंदुत्ववादी विचारधारा से प्रेरित भाजपा सरकार, लंबे समय से लिंग और सामाजिक व्यवस्था से संबंधित एक कठोर एवं ब्राह्मणवादी अवधारणा को थोपने का प्रयास करती रही है। यह विधेयक उसी दृष्टिकोण को दिखाता है, जो व्यक्तियों को स्वयं को परिभाषित करने के अधिकार से वंचित करता है।

13 मार्च 2026 को, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने लोकसभा में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन बिल, 2026 पेश किया। यह विधेयक ज्यादातर ट्रांसजेंडर लोगों को बाहर कर देता है और केवल कुछ विशेष समूहों तक सीमित रह जाता है। आरोप यह भी है कि यह बिल ट्रांस मेन, ट्रांस वीमेन, नॉन-बाइनरी लोगों और ख्वाजा सरा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्तियों को पूरी तरह बाहर रखता है। यह बिल केवल हिजड़ा, किन्नर, अरावानी, जोगता, यूनुक और इंटरसेक्स लोगों को ही ट्रांसजेंडर की परिभाषा में शामिल करता है, जो नालसा जजमेंट के सेक्शन 129 (2) का सीधा उल्लंघन है। नेशनल लीगल सर्विसेज ऑथोरिटी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2014) के ऐतिहासिक निर्णय में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पुष्टि की कि लिंग पहचान आत्म-परिकल्पना पर आधारित है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिंग की आत्म-पहचान का मौलिक अधिकार है। न्यायालय ने माना था कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अनुच्छेद 14, 15, 19, और 21 के तहत पूर्ण संवैधानिक संरक्षण का हकदार है, जो समानता, गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, और गरिमा के साथ जीने के अधिकार की गारंटी देता है। उस ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि ट्रांसजेंडर लोगों की स्व-प्रतिपादित पहचान को कानूनी मान्यता दी जाए।

आज भी समाज में LGBTQ समुदाय को संकीर्ण मानसिकता, पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी सोच के चलते “असामान्य” या “अस्वीकार्य” मान लिया जाता है, जिसके कारण उन्हें परिवार और समाज से बहिष्कार, मानसिक उत्पीड़न, हिंसा तथा शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह बिल शरीर और निजता पर सीधा हमला है। इसमें अस्पतालों को ट्रांसजेंडर लोगों की सर्जरी से जुड़ी सारी जानकारी सरकार को देने का प्रावधान है, जो निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
सरकार का दावा है कि मूल ट्रांस एक्ट कभी भी स्व-प्रतिपादित पहचान को शामिल करने के लिए नहीं था। लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है। ट्रांस एक्ट में स्पष्ट परिभाषा दी गई है कि ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति है जिसका जेंडर जन्म के समय दर्ज सेक्स से मेल नहीं खाता, चाहे मेडिकल स्थिति कुछ भी हो। नालसा जजमेंट के सेक्शन 129 (2) में भी केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडर लोगों की स्व-चयनित जेंडर पहचान- मेल, फीमेल या थर्ड जेंडर को कानूनी मान्यता देने का आदेश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जेंडर पहचान का फैसला व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक स्थिति और स्व-प्रतिपादित पहचान से होना चाहिए, न कि किसी बायोलॉजिकल टेस्ट से। कोर्ट ने यह भी कहा था कि विभिन्न जेंडर पहचानों को शामिल न करना समाज की नैतिक विफलता है।सरकार का कहना है कि एक्ट का दुरुपयोग हो सकता है और लोग फर्जी तरीके से ट्रांस खुद को ट्रांस घोषित करके लाभ ले सकते हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग चार लाख ट्रांसजेंडर लोग हैं। इनमें से केवल 37 हजार को ही ट्रांसजेंडर कार्ड मिल पाया है। आयुष्मान भारत बीमा का लाभ सिर्फ तीन हजार लोगों (0.75 प्रतिशत) तक पहुंचा है। पुनर्वास या कौशल प्रशिक्षण का लाभ 1,500 से भी कम लोगों को मिला है। यानी कुल ट्रांस आबादी का 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा लाभ ले पाया है। सरकार ने अभी तक दुरुपयोग का कोई ठोस उदाहरण नहीं दिया है। इसके अलावा फ्रॉड के लिए पहले से ही कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

प्रदर्शनकारी अब सरकार से कुछ सीधे सवाल भी पूछ रहे हैं: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के राष्ट्रीय परिषद से परामर्श क्यों नहीं लिया गया? जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति पहले ही मूल कानून के तहत अपना जेंडर बदल चुके हैं, उनका क्या होगा? कथित दुरुपयोग के सबूत कहां हैं और वैध लाभार्थियों को क्यों सजा दी जा रही है?

समुदाय का एकमत है कि यह बिल नालसा जजमेंट और मौलिक अधिकारों दोनों का उल्लंघन करता है। इसलिए उनकी मांग बिल को तुरंत वापस लेने और ट्रांस समुदाय से सही मायने में बातचीत करने की है। विरोध प्रदर्शन तेज होते जा रहे है।

सुरक्षा-प्रावधानों को सुनियोजित ढंग से समाप्त कर देता है, और उनके स्थान पर राज्य की निगरानी, चिकित्सा-संबंधी अवरोधों (medical gatekeeping), और नौकरशाही नियंत्रण वाली एक नई व्यवस्था स्थापित कर देता है। यह बिल नालसा जजमेंट को भी दरकिनार करता है जिसमें सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि ट्रांसजेंडर लोगों की स्व-प्रतिपादित पहचान को कानूनी मान्यता दी जाए। यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों क संवैधानिक अधिकारों पर एक सीधा हमला है।

PSF हरियाणा इस जनविरोधी और भेदभावपूर्ण LGBTQ बिल 2026 का कड़ा विरोध करता है और सरकार से इसकी तत्काल वापसी की मांग करता है।साथ ही, PSF हरियाणा सभी प्रगतिशील संगठनों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम जनता से अपील करता है कि वे एकजुट होकर इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ आवाज उठाएं और संविधान, समानता, स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा के लिए मजबूत जनआंदोलन खड़ा करें, क्योंकि यह केवल LGBTQ समुदाय का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे समाज के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई है।

जारीकर्ता : Progressive Students Front- PSF
संपर्क : 080598 70115

फोटो साभार: आउटलुक इंडिया

#मोदीजनताविरोधी

19/04/2026

#सिया गुलेरिया को न्याय दो।
#सिया गुलेरिया के हत्यारों को सख्त से सख्त सजा दो।

साथियों,
प्रोग्रेसिव स्टूडेंट्स फ्रंट हिसार (हरियाणा), हिमाचल प्रदेश के सरकाघाट के गोपालपुर में 19 वर्षीय छात्रा, SFI की कार्यकर्ता सिया गुलेरिया की दिनदहाड़े हत्या की घटना पर गहरा शोक और कड़ी निंदा व्यक्त करता है।

हाल ही में सिया (SFI कार्यकर्ता) की एक नशेड़ी द्वारा की गई निर्मम हत्या ने पूरे समाज को झकझोर दिया है। यह घटना न केवल कानून-व्यवस्था की विफलता को उजागर करती है बल्कि सरकार की तथाकथित महिला सुरक्षा नीतियों (बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं) की सच्चाई भी सामने लाती है। यह घटना कोई पहली घटना नहीं है ना जाने कितनी महिलाओं के साथ ऐसी अमानवीय घटनाएं घटित होती है। एक ओर सरकार महिलाओं की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के खिलाफ अपराध, विशेषकर रेप की घटनाएं, लगातार बढ़ती जा रही हैं—जो इस दोहरे रवैये को उजागर करती है। इस जघन्य हत्या के बाद सरकार द्वारा मात्र 10 लाख रुपये की सहायता देकर मामले को शांत करने का प्रयास किया जा रहा है जो न्याय का विकल्प नहीं हो सकता। यह पीड़ित परिवार के साथ अन्याय है और व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
PSF हरियाणा इस पूरे मामले में पीड़ित परिवार के साथ मजबूती से खड़ा है और स्पष्ट रूप से न्याय की मांग करता है।
साथ ही, हम यह भी मांग करते हैं कि मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच सुनिश्चित की जाए तथा महिला सुरक्षा के लिए ठोस और प्रभावी कदम ज़मीनी स्तर पर लागू किए जाएं।

#सियागुलेरिया
SFI - Students' Federation of India

Photos from Progressive Students Front- PSF's post 19/04/2026

Progressive Students Front- PSF जीजेयू प्रशासन और हिसार प्रशासन के द्वारा इनसो के कार्यकर्ताओं का दमन करने का विरोध करता है।
सम्मेलन के लिए सेमिनार हॉल की अनुमति न मिलने पर भड़के इस विवाद ने अब बड़ा रूप ले लिया है जिसके कारण शहर में धारा 163 लागू की गई है।

इंडियन नेशनल स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन (इनसो ) हरियाणा में जननायक जनता पार्टी के छात्र विंग के रूप में काम करता है।
कुछ दिन पहले इनसो ने जीजेयू में सम्मेलन के लिए सेमिनार हॉल न मिलने के कारण विरोध प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान वीसी सर ने उनसे कोई बातचीत नहीं की,जिसके कारण गुस्साए छात्रों ने वीसी ऑफिस के अंदर घुसने का प्रयास किया। इस दौरान यूनिवर्सिटी प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच झड़प हो गई।

प्रदर्शन को रोकने के लिए प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात किया हुआ था जो कि सरासर गलत है। विरोध प्रदर्शन करना छात्रों का संवैधानिक अधिकार है। वर्तमान फासीवादी भाजपा सरकार ने कॉलेज , विश्वविद्यालयों को पुलिस छावनी बना कर रख दिया है। ये पुलिसबल इसलिए लगाया जाता है ताकि वहां जनवादी माहौल कायम होने से रोक सके।

पुलिस ने इनसो और जेजेपी के 6 कार्यकर्ताओं को गैरकानूनी तरीकों से गिरफ्तार किया। पुलिस रात को उनके घरों में घुस गई और एक महिला साथी को तो बिना महिला पुलिस के ही गिरफ्तार करके ले गई। इसके विरोध में जननायक जनता पार्टी के बड़े चेहरे हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री और उनके भाई दिग्विजय चौटाला व अन्य थाने में अपनी गिरफ्तारी देने पहुंचे।

पर हमें यहां इन वोट बटोरू पार्टियों के नेताओं के दोहरे चरित्र का भी पर्दाफाश करना चाहिए। जो दुष्यन्त चौटाला आज इसे पुलिस की गुंडागर्दी करार दे रहे हैं वो जब हरियाणा के उप मुख्यमंत्री थे तब किसान आंदोलन में किसानों पर अत्याचार करने वाली पुलिस इन्हें गुंडा नहीं दिख रही थी। तब इन्होंने ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फासीवादी भाजपा के साथ मिलकर हर तरीके से आंदोलनकारियों का दमन किया था । वास्तव में सभी वोट बटोरू पार्टियों का मकसद जनता का शोषण करके सत्ता हथियाना ही होता है। जब ये नेता सत्ता में होते हैं तब इन्हें किसान, मजदूर ,दलित , छात्र ,महिलाएं कोई याद नहीं आता।
अतः साथियों हमे इन लोगों के चरित्र को समझते हुए हमेशा सही का साथ देना चाहिए और गलत के खिलाफ खड़ा होना चाहिए।।

जारीकर्ता :- प्रोग्रेसिव स्टूडेंटस फ्रंट (हरियाणा )
संपर्क :- 8059870115

#इनसोहिसार #जेजेपी

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