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25/10/2019
धनतेरस- 13 अंक दिलाएगा धन
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यूं तो ईसाई धर्म में 13 को बहुत ही अशुभ अंक माना जाता है और 13 तारीख को लोग कुछ भी अच्छा काम करने से बचते हैं लेकिन सनातन धर्म में सभी दिनों को किसी ना किसी कार्य के लिए शुभ माना जाता है। पूर्णिमा हो या अमावस्या हो सभी दिन किसी न किसी देवता या देवी के नाम पर समर्पित हैं। ऐसा ही एक दिन है धनतेरस का । तेरस यानि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है। धनवंतरि को अमृत प्रदान करने वाला देवता माना जाता है। धनवंतरि को ही स्वास्थ्य और आयुर्वेद का देवता भी माना जाता है। यानि अमरता के लिए धनवंतरि की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान आज ही की तिथि को विष्णु के अँशावतार भगवान धनवंतरि का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे जिसे पी कर सभी देवता अमर हो गए। इसके अलावा आज ही के दिन धन के देवता कुबेर की भी उपासना की जाती है। कुबेर यक्षों के राजा हैं और अलकापुरी में वास करते हैं । उन्हें ही रावण का सौतेला भाई भी कहा जाता है। दक्षिण भारत में कथा है कि भगवान व्यंकटेश ने माता लक्ष्मी से विवाह करने के लिए कुबेर से धन उधार लिया था जिसे आज भी वो चुका रहे हैं। यही वजह है कि तिरुपति बाला जी में धन का दान किया जाता है जिस धन को लेकर भगवान व्यंकटेश कुबेर को लौटाते हैं और धन दान के बदले आशीर्वाद देते हैं।
06/09/2019
राधाष्टमी पर विशेष
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सीता और राधा - दो अधूरी प्रेम कहानियां
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आज श्री कृष्ण की आराधिका और आह्लादकारिणी शक्ति श्री राधा जी का जन्म दिवस है। कृष्ण और राधा जी की प्रेम कहानी को पूरे विश्व में एक आदर्श माना जाता है । लेकिन ये गज़ब का संयोग है कि न तो माता सीता और न ही माता राधा अपने आराध्य श्री राम और श्री कृष्ण के साथ आजीवन रह सकीं। दोनों की जिंदगियों में कितनी समानता है ये देख कर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे। जहां भगवान श्री राम का जन्म चैत्र नवमी के दिन हुआ था वहीं माता सीता का जन्म भी ठीक एक महीने बाद वैशाख नवमी को हुआ था। भगवान श्री कृष्ण का जन्म जहां भादो महीनें की कृष्णपक्ष अष्टमी को हुआ तो वहीं राधा जी का जन्म भादो महीनें में ही शुक्ल पक्ष अष्टमी को हुई। माता सीता को भूमिजा कहा जाता है , मतलब वो भूमि से प्रगट हुई थीं। पद्म पुराण के मुताबिक मां राधा भी भूमि पर ही प्रगट पाई गईं थी। कहानी के मुताबिक राधा जी के पिता वृषभानु जब यज्ञ भूमि को साफ कर रहे थे तो वहीं जमीन पर राधा जी दिखीं। माता सीता को जहां एक धोबी के आरोपों की वजह से और अयोध्या में उनकी बदनामी की वजह से श्री राम को उन्हें वन भेजना पड़ा वहीं राधा जी को भी सामाजिक बदनामी कृष्ण प्रेम की वजह से झेलनी पड़ी। राधा जी को कृष्ण जब 11 वर्ष 52 दिन की उम्र में छोड़ कर मथुरा और बाद में द्वारिका चले गए तब कृष्ण राधा जी के पास सिर्फ उनकी मृत्यु के ठीक पहले ही आ पाए। सीता जी को भी राम का दर्शन ठीक उसी वक्त हुआ जब वो भूमि में समाने वाली थी।दोनों की ही प्रेम कहानियों के अधूरेपन को आज भी कोई तर्कसंगत ठहरा नहीं पाया है।
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