Jaat from Rajasthan
16/01/2026
इस महंगाई में शुद्ध देसी घी के क्या भाव चल रहें हैं आपके इधर
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17/12/2025
क्या हम इतिहास से कुछ सीख रहे हैं? या सिर्फ उसे दोहरा रहे हैं?
आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ जानकारी का सैलाब है, लेकिन समझदारी की कमी दिखती है। इतिहास हमें बार-बार सिखाता है कि कैसे छोटे-छोटे फैसले बड़े बदलाव ला सकते हैं, और कैसे कुछ गलतियाँ सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी भुगतनी पड़ती हैं।
क्या हमने 1947 के विभाजन से कुछ सीखा?
क्या हमने 1984 के दंगों से सबक लिया?
या 1992 की घटनाओं से?
आज भी, जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि समाज में विभाजन की लकीरें गहरी हो रही हैं। भाषा, धर्म, जाति या क्षेत्र के नाम पर हम एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने इन दूरियों को कम करने के बजाय, कई बार और बढ़ा दिया है।
इतिहास सिर्फ बीता हुआ कल नहीं, वो एक गुरु है। यह हमें बताता है कि जब-जब समाज बंटा है, तब-तब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी है। एक मजबूत राष्ट्र तभी बनता है जब उसके लोग एक हों, उनके विचार भले ही अलग हों, लेकिन उनका लक्ष्य एक हो।
आइए, इतिहास को सिर्फ किताबों में न रहने दें, उसे अपने जीवन में उतारें। नफरत और बंटवारे की राजनीति को छोड़कर, संवाद और समझदारी का रास्ता चुनें।
#सुनो
2015 बिहार चुनाव
RJD को 18.4% वोट मिले और 80 सीटें मिलीं।
BJP को 24.4% वोट मिले, लेकिन सिर्फ 53 सीटें मिलीं।
यानी BJP को RJD से 6% ज़्यादा वोट मिले, फिर भी 27 सीटें कम मिलीं।
क्या BJP में किसी ने “वोट चोरी” या चुनाव आयोग पर उंगली उठाई?
नहीं।
क्योंकि RJD ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा था और BJP ने 157 सीटों पर।
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2016 बंगाल विधानसभा चुनाव
CPM – 19.6% वोट – 26 सीटें
कांग्रेस – 12.2% वोट – 44 सीटें
BJP – 10.2% वोट – सिर्फ 3 सीटें
कांग्रेस को कम वोट शेयर होने के बावजूद ज़्यादा सीटें मिलीं क्योंकि उसके वोट केंद्रित सीटों पर थे, जहाँ जीतना आसान था।
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2024 महाराष्ट्र लोकसभा चुनाव
BJP – 26.2% वोट, सिर्फ 9 सीटें
कांग्रेस – 16.9% वोट, लेकिन 13 सीटें
कांग्रेस को BJP से 9.3% कम वोट मिलने के बाद भी ज़्यादा सीटें मिलीं।
क्योंकि BJP ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही थी।
निष्कर्ष:
सीट-वोट अनुपात का खेल सीटें कितनी लड़ी गईं और वोट कहाँ केंद्रित थे, इस पर निर्भर करता है।
जिसे यह बुनियादी गणित समझ नहीं आता, उसे बहुत आसानी से बेवकूफ़ बनाया जा सकता है।
17/11/2025
11वीं शताब्दी में, भारत एक बड़े संकट का सामना कर रहा था जब महमूद गजनवी के लगातार हमलों ने उत्तरी क्षेत्रों को अस्थिर कर दिया था। ऐसे समय में, श्रावस्ती (वर्तमान उत्तर प्रदेश के बहराइच क्षेत्र) के स्थानीय हिंदू शासक, महाराजा सुहेलदेव, एक शक्तिशाली प्रतिरोध के रूप में सामने आए। उनका शासनकाल लगभग 1020 ईस्वी से 1050 ईस्वी के आसपास माना जाता है। इतिहास में उनका सबसे बड़ा और निर्णायक कार्य 1033 ईस्वी में बहराइच की लड़ाई में सामने आया। गजनवी के भांजे और एक प्रमुख सेनापति, सैयद सालार मसूद गाजी, ने एक बड़ी सेना के साथ इस क्षेत्र पर आक्रमण किया था। मसूद गाजी का उद्देश्य लूटपाट और सत्ता स्थापित करना था, और वह खुद को एक धार्मिक योद्धा के रूप में पेश करता था।
सुहेलदेव ने इस चुनौती का सामना अभूतपूर्व एकता और सैन्य कौशल के साथ किया। उन्होंने केवल अपनी शाही सेना पर भरोसा नहीं किया, बल्कि स्थानीय हिंदू समुदायों—जिनमें पासी, भर, थारू और अन्य थे—को एक साथ एकजुट किया। यह उनकी सबसे बड़ी खूबी थी कि उन्होंने जातिगत मतभेदों को भुलाकर एक मजबूत राष्ट्रीय मोर्चा तैयार किया। बहराइच के पास हुई इस भयंकर लड़ाई में, सुहेलदेव के नेतृत्व वाली संयुक्त सेना ने मसूद गाजी की सेना को पूरी तरह से पराजित कर दिया। लोक कथाओं के अनुसार, स्वयं मसूद गाजी इस युद्ध में मारा गया था। इस विजय का महत्व सिर्फ एक जीत से कहीं अधिक था; यह जीत इतनी निर्णायक थी कि इसने उत्तरी भारत में तुर्की आक्रमणकारियों के हौसलों को तोड़ दिया। इस घटना के बाद, डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय तक, किसी भी बाहरी मुस्लिम शक्ति को गंगा के मैदानी इलाकों में प्रभावी ढंग से आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। इस प्रकार, सुहेलदेव ने एक लंबी अवधि के लिए देश की सीमाओं और संस्कृति की रक्षा की, जिससे स्थानीय हिंदू राज्यों को अपनी शक्ति को फिर से संगठित करने का समय मिला। वह आज भी उस क्षेत्र के लोकगीतों और स्थानीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो उन्हें एकता, शौर्य और धर्मरक्षा के प्रतीक के रूप में पूजते हैं।
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