Solitude Wittyman

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07/07/2026

2 अप्रैल 2011... वानखेड़े स्टेडियम में 60 रन पर दो विकेट गिरने के बाद 17वें ओवर में माहेला जयवर्धने क्रीज पर आए और शाम तक खेल गए और अब हम सब जानते हैं कि कोई महान बल्लेबाज शाम तक खेल जाए तो क्या हो सकता है.. (पर इस दिन ऐसा नहीं हुआ) ... 2007 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार मैच जीताउ शतक लगाने के बाद वर्ल्ड कप के नॉक आउट स्टेज में ये उनका दूसरा शतक था। 88 गेंदों में नाबाद 103 रन, वर्ल्डकप फाइनल के इतिहास में उनसे पहले केवल केवल 5 शतक लगे थे। जयवर्धने की इस पारी ने श्रीलंका को 274 के एक मजबूत स्कोर तक पहुँचा दिया था। वर्ल्डकप फाइनल में कभी भी इतना बड़ा स्कोर चेज नहीं हुआ था।

275 का स्कोर चेज करते हुए छठे ओवर में नुवान कुलासेकरा की गेंदों पर सचिन तेंदुलकर के बल्ले से दो बहुत ही सुंदर चौके निकले। बिल्कुल स्वीट स्पॉट से। एक स्क्वेयर कट और एक स्ट्रेट ड्राइव। हर बल्लेबाज के कुछ शॉट ऐसे होते हैं जिन्हें देखकर आप कह सकते हैं कि ये आज रंग में हैं, सचिन की स्ट्रेट ड्राइव, रिकी पोंटिंग का पुल, ब्रायन लारा की कवर ड्राइव।

सचिन की ये स्ट्रेट ड्राइव बिल्कुल "ट्रेडमार्क तेंदुलकर स्ट्रेट ड्राइव" थी, सीधा बल्ला, शानदार संतुलन, स्वीट स्पॉट से गेंद लगने की आवाज़, अम्पायर के बगल से गेंद निकली, मिड ऑफ और मिड ऑन के पास कोई चांस नहीं। चार रन । ऐसा लगा कि जो एक उपलब्धि इतने शानदार करियर में अबतक प्राप्त नहीं की, वो आज प्राप्त कर लेंगे, लेकिन मुम्बई इंडियंस में सचिन के साथी लसिथ मलिंगा ने कुछ अलग ही सोच रखा था अगले ओवर की पहली गेंद ऑफ स्टम्प के बाहर, सचिन ने गेंद का पीछा किया, किनारा लगा और कुमार संगाकारा से गलती होने की कोई गुंजाइश थी नहीं। वानखेड़े में पिन ड्रॉप सायलेन्स। स्कोर 31/2, सचिन - सेहवाग दोनों वापस पवेलियन में। पौने तीन सौ अचानक से सवा तीन सौ जैसा लगने लगा था। सचिन तेंदुलकर वापस जा रहे थे और उनका उत्तराधिकारी मैदान में आ रहा था, देखना ये था कि क्या वो ऐसा प्रेशर झेल पाएगा ।

दिल्ली के दोनों लड़कों ने न केवल बैटिंग कोलैप्स की संभावना को समाप्त किया (जिसे देखने की हम लोगों को लंबे समय से आदत रही है) बल्कि रिक्वायर्ड रेट को भी नियंत्रण में रखा। दोनों छोर से चौके लग रहे थे, स्ट्राइक बदली जा रही थी। 114 के स्कोर पर 22वें ओवर में विराट कोहली तिलकरत्ने दिलशान को रिटर्न कैच दे बैठे और चिंता जो धीरे धीरे कम हो रही थी वो अचानक से बढ़ गई। अंग्रेजी कॉमेंट्री में एक लाइन कही जाती है "Against the run of play". कोहली का विकेट ऐसा ही था।

युवराज सिंह की बैटिंग फॉर्म शानदार रही थी इस वर्ल्ड कप में, उनका नम्बर 5 पर आना लगभग निश्चित माना जा रहा था। धोनी ने कोच गैरी से कहा कि मुरली गेंदबाजी कर रहे हैं और वो एक लेफ्टी बल्लेबाज को गेंद करना ज्यादा पसंद करेंगे, मैं मुरली को बेहतर खेलता हूँ। गैरी कर्स्टन ने बाद में बताया "I was waiting for him to ask that question".

अब महेन्द्र सिंह धोनी मैदान में थे। इस वर्ल्ड कप में अबतक बल्ले से बेहद औसत प्रदर्शन रहा था। दूसरी ओर गौतम गंभीर शानदार पारी खेल रहे थे। 2007 के T20 WC फाइनल के बाद ये दूसरी बार ऐसा हो रहा था कि वर्ल्ड कप फाइनल में गौतम गंभीर का बल्ला चला हो। "There are not many great players who can call upon their greatness on the biggest stage of the game when their team needs it the most" गौतम गंभीर और महेन्द्र सिंह धोनी दोनों ने अपने महान खिलाड़ी होने का एक और प्रमाण तब दिया जब क्रिकेट के सबसे बड़े मंच पर उनकी टीम को इसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता थी। अमेरिकन स्पोर्ट्स में ऐसे खिलाड़ियों को "Clutch Performers" कहा जाता है।

224/3.... 42वें ओवर की दूसरी गेंद को आगे निकलकर मारने के प्रयास में गौतम गंभीर गेंद से सम्पर्क नहीं कर पाए। स्कोर 224/4 ... गौतम की ये 97 रनों की पारी भारतीय क्रिकेट की सबसे महत्वपूर्ण पारियों में शामिल हो चुकी थी... रन आउट से बचने के लिए लगाई गई उनकी डाइव की एक फोटो यादगार रहेगी.... पर क्या एक और टर्निंग पॉइंट बाकी था मैच में ? आज हम कह सकते हैं नहीं यार 6 विकेट बाकी थे, पर उस समय थोड़ा सा डर तो लगा ही था क्योंकि अपनी टीम की बैटिंग कोलैप्स देखने का पुराना अनुभव था। अगले चार ओवरों में वर्ल्ड कप के हीरो युवराज सिंह और कप्तान ने ऐसी तमाम आशंकाओं को समाप्त कर दिया।

अब केवल औपचारिकता बाकी थी। स्कोर हो चुका था 271 पर 4. 11 गेंदों में 4 रनों की आवश्यकता, कुलासेकरा की लेंथ बॉल और MS धोनी का बैट स्विंग... मैच की एक तस्वीर है जिसमें एक चीज़ दिखती है कि शॉट का फॉलो थ्रू भी पूरा नहीं हुआ था, लेकिन दूसरे छोर पर युवराज को पता था कि गेंद कहाँ जा रही है, शॉट लगने के साथ ही उनके दोनों हाथ हवा में थे। 28 साल के बाद भारतीय टीम फिर से वर्ल्ड चैंपियन थी। ड्रेसिंग रूम में खुशी से उछलते गैरी कर्स्टन, मैदान में युवराज और धोनी को गले लगाते सचिन तेंदुलकर की वो तस्वीरें आज भी मूड फ्रेश कर देती हैं। सचिन को देखकर Film "The Pursuit Of Happiness" का एक डायलॉग याद आया, "This part of my life, this little part.... is called happiness"

1983 की जीत को दोहराने का इससे अच्छा अवसर हो भी नहीं सकता था। वर्ल्ड कप घर में था। वन डे टीम में इससे अच्छा ग्रुप कभी बना नहीं था। पूरी टीम मैच विनर्स से भरी थी। कई खिलाड़ी वही थे जिन्होंने 8 साल पहले जोहानेसबर्ग में सपना टूटते देखा था। 8 साल बाद वही लोग वर्ल्ड चैंपियन थे। 38 साल के सचिन तेंदुलकर अपना आखिरी वर्ल्ड कप खेल रहे थे और क्या जबरदस्त खेले वो... भारतीय टीम के लिए टूर्नामेंट में सर्वाधिक 482 रन 53.55 की औसत से.... ये 1996 (523 रन) और 2003 (673 रन) के बाद ये तीसरा वर्ल्ड कप ऐसा था जिसमें सचिन भारत की ओर से सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी थे। 8 साल पहले 2003 में उन्होंने गोल्डन बैट जीता था और मैन ऑफ द टूर्नामेंट थे पर उनके 673 रन बनाने के बावजूद टीम वर्ल्ड कप नहीं जीत सकी थी। जहीर खान जो 2003 फाइनल में गिलक्रिस्ट, पोंटिंग और मार्टिन के सामने एकदम लाचार से दिख रहे थे, 2011 में सबसे ज्यादा 21 विकेट लेने वाले गेंदबाज रहे। सुरेश रैना ने दो क्वार्टरफाइनल और सेमीफाइनल में दो बहुत ही अच्छी पारियां खेलीं। वीरेन्द्र सेहवाग ने वर्ल्ड कप की शुरुआत ही धमाकेदार 175 से की और उसके बाद सेमीफाइनल में उमर गुल का जो धागा खोला वो तो यादगार ही रहेगा। महान भारतीय बल्लेबाजों की परंपरा में सचिन के उत्तराधिकारी विराट कोहली का ये पहला वर्ल्ड कप था, शुरुआत उन्होंने भी शतक से की और फाइनल में बनाए गए उनके 35 रन बहुत महत्वपूर्ण थे। 362 रन और 15 विकेट के साथ युवराज सिंह मैन ऑफ द टूर्नामेंट हुए। गौतम गंभीर और MS धोनी तो खैर हीरो रहे ही फाइनल के। ये वर्ल्डकप की विजय सामूहिक प्रयास का उत्कृष्ट उदाहरण थी।

MS धोनी की बायोपिक में एक दृश्य है, जहाँ वो खड़गपुर में अपने दोस्तों के साथ रेलवे के क्वार्टर में 2003 का वर्ल्ड फाइनल देख रहे थे, सचिन के आउट होते ही चाय बनाने चले जाते हैं। एक दोस्त कहता है, "ई कैफ, मोंगिया, युवराज सब अपने महि के साथ के हैं न, सब वर्ल्ड कप खेल रहे हैं, पता नहीं महि का का होगा ?" वाकई किसी को पता नहीं रहा होगा कि महि अगले 8 साल में कहाँ पहुँचने वाला है...

2003 वाला फाइनल रविवार को हुआ था, मैच तो हारे ही, अगले दिन स्कूल भी जाना पड़ा था। लेकिन 2011 फाइनल शनिवार को हुआ, जीते भी और अगले दिन रविवार.. इसलिए कोचिंग की छुट्टी भी।

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