Aamod Healthcare Pvt. Ltd.
01/09/2019
खराब "नाभि" रोगों की जड़
आयुर्वेद के अनुसार "नाभि" सभी रोगों की जड़ है, हमारी नाभि ही हमारे शरीर का केंद्र है जहाँ से 72,000 नाड़ियाँ शुरू होती हैं
आज हमारी 80% बीमारियों की जड़ हमारी खराब और अव्यवस्थित नाभि है लकिन हमे इसका पता ही नही चलता
खराब नाभि होने के कुछ लक्षण निम्नलिखित हैं:
--> पेट मैं भारीपन रहना
--> काम में मन ना लगना
--> पेरो तथा कमर में दर्द रहना
--> थकावट और उर्जा मे कमी
--> बार बार अकारण बीमार होना
--> किसी भी प्रकार की एलर्जी होना
--> भूक ना लगना या अधिक लगना
--> चिड़चिड़ापन या अकारण तनाव
--> अकारण मोटा होना या वजन ना बड़ना
--> मासिक धर्म मे दर्द होना या असमय होना
--> ऐसा रोग जिसे डॉक्टर समझ नही पा रहे हो
--> योगिक व अध्यात्मिक किर्याओं में असफलता
आज ही अपनी ख़राब नाभि को ठीक करें.....
विश्व की सर्वप्रथम एवम् एकमात्र औषधि "नाभि चक्र"
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वह सभी चिकित्सक, जो अपने रोगियों को पूर्ण रूप से और तेज़ी से रोगमुक्त करना चाहते हैं उनका भी स्वागत है।
आमोद हेल्थकेअर
कॉल और व्हाट्सप्प: +91 9212443344
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26/08/2019
हमारे शरीर में ऊर्जा अंदर जाने के दो माध्यम हैं:
प्रथम है - भोजन एवं अन्य साधन
हमारे शरीर को ऊर्जा भोजन द्वारा मिलती है। जब हम भोजन द्वारा शरीर की पुष्टि करते हैं तो भोजन जैसे गुण वाला होता है वैसा ही शरीर पर प्रभाव डालता है। इसीलिये हमारे विद्वानों ने तीन प्रकार के भोजन की व्यवस्था की –
सात्विक:
जैसे यदि हम सात्विक भोजन करेंगे तो शरीर में बल कम पर मानसिक बल ज्यादा होगा। सात्विक भोजन हमारे यहाँ ऋषि मुनि, ब्राह्मण और ब्रह्मचारी करते थे।
राजसी:
राजसी भोजन करने से मनुष्य में शारीरिक बल ज्यादा होता था और मन की वृत्ति शासन करने वाली होती थी।
तामसी:
तामसी भोजन करने से मानव कैसे भी प्रदूषण वाले क्षेत्र में काम करने योग्य, सेवा चित्तवृत्ति वाला और ज्यादा मेहनती हो जाता था।
भोजन से मिलने वाली ऊर्जा हमारे शरीर को जैसा हम भोजन करते हैं वैसा ही मन बनाने में योगदान करती है। इसीलिए हम कह सकते हैं ऊर्जा का स्रोत कोई भी उस से शरीर को पुष्टि मिलती है और मन के विचारों को दिशा भी।
ऊर्जा शरीर को मिलने के और अन्य भी साधन हैं जैसे सूर्य, चन्द्र, आकाशीय ऊर्जा (कॉस्मिक एनर्जी)
द्वितीय है – मन
मन विचार को जैसे देंगे वैसे ही मन की ऊर्जा उत्पन्न होगी - सकारात्मक या नकारात्मक। जैसी ऊर्जा होगी हम शरीर को भी शुद्ध ऊर्जा या अशुद्ध ऊर्जा से स्वस्थ या अस्वस्थ कर सकते हैं। यदि हमारे मन से अच्छे सकारात्मक विचार ऊर्जा के रूप में शरीर को मिलेंगे तो हमारे शरीर के सभी चक्रों को सकारात्मक ऊर्जा मिलने से चक्र अपने से जुड़े हुए सभी अंगों को स्वस्थ रखेंगे।
यदि हमारा मन नकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ है तो सभी चक्र शरीर को रोग और अशांति देंगे। हमारे ऋषि मुनियों ने इसीलिए सत्संग, ईश्वर के प्रति आस्था, अच्छी पुस्तकों का पठन पाठन और अन्य सद्गुणों की वृद्धि के लिए प्रोत्साहित किया।
मन को जैसे हम विचार देंगे उस से शरीर पर भी वैसा ही प्रभाव दृष्टिगोचर होगा। इसका अर्थ है कि मन और शरीर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।
पर प्रश्न है कैसे?
उत्तर है नाभि द्वारा।
जब भी कभी नाभि अपने मूल प्राकृतिक स्थान से हट जाती है तो शरीर और मन दोनों अस्वस्थ हो जाते हैं। जब भी कभी मन के ऊपर कोई शक्तिशाली असंभावित सूचना का प्रहार होता है तो नाभि अपने मूल स्थान से हट जाती है। इसी प्रकार से शरीर की क्षमता से ज्यादा काम होने या नाड़ियों की कमजोरी की अवस्था में नाभि शरीर और मन दोनों को अपने असंतुलन से असंतुलित कर देती है।
माँ की नाभि से ही एक नव नाभि सृजन होता है और अद्भुत है कि हमारे अंतस शरीर और इस भौतिक शरीर के बीच में नाभि ही है। यह नाभि ही है जो मृत्यु को सामने देख कर सबसे पहले अस्त व्यस्त हो जाती है और अपने को केंद्र से बाहर कर लेती है। बाकी सभी चक्र नाभि के द्वारा ही नियंत्रित होते हैं क्योंकि जब नाभि केंद्र से हट जाती है बाकी के सभी चक्र भी विक्षोभ की अनुभूति कर कम या ज्यादा ऊर्जा उनसे जुड़े अंगों उपांगों को देना शुरू कर देते हैं। यह पूरी तरह हमारे ऋषि मुनियों ,जो कि प्राचीन वैज्ञानिक ही थे, ने सिद्ध किया कि कैसे यह चक्र काम करते हैं और इसको विस्तार से लिखा भी।
प्रकृति में विभिन्न रूप चक्रों के पेड़- पौधों, पत्थरों और जीवों में दिखाई देते हैं जो अपने में विशिष्ट हैं। जैसे कमल, गुलाब, मछलियों के सिर (star fish etc.)आदि में।
नाभि को पूर्ण स्वस्थ और व्यवस्थित रखना बहुत जरुरी है। शरीर में ऊर्जा के प्रवाह को सही रखने के लिए नाभि को संतुलित रखे जिसे आप किसी भी प्रचलित तरीका अपना सकते है, बस इस बात का विशेष ध्यान रखें की नाभि की सही जानकार से ही व्यवस्थित कराएं। नाभि विशेषज्ञ के आभाव में आप "नाभि चक्र" औषधि भी प्रयोग कर सकते है।
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नाभि विज्ञान, सर्वोच्च विज्ञान
धन्यवाद
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