Samman
19/04/2026
अर्श से फर्श तक आपने सुना होगा, लेकिन ये कहानी है फ़र्श से अर्श तक की.. एक ऐसी काबिल महिला जिसके अंदर इतनी सारी काबिलियत थी मगर परिवार ने इस महिला के साथ कम से कम इंसानी और मानवीय व्यवहार तक करना उचित नहीं समझा.
ये कहानी है एक ऐसी महिला का जो दर्द,तकलीफ़ और इम्तिहानों की क़ैद से बाहर निकल कर IAS तक का सफ़र तय किया, ये कहानी है उस महिला का जिसने मौत को गले लगाने का फैसला ले लिया था, लेकिन अगले ही पल इसे इस बात का समझ आया कि मौत किसी समस्या का समाधान नहीं है, आत्महत्या करने से, जिंदगी खत्म करने से चुनौतियां खत्म नहीं होती हैं बल्कि जुर्म और शोषण करने वाले लोगों के हौसले बुलंद होते हैं और यह प्रवृति एक ऐसी व्यवस्था को, एक ऐसी सामाजिक मान्यता को जन्म देती है जो आने वाले समय में किसी और को अपना शिकार बनाती है।
महज 16 साल की उम्र में इस महिला की शादी हो गई। उनकी शादीशुदा जिंदगी तब बहुत कलीफदेह हो गई जब पति ने इस महिला का साथ देने के बजाय, इस महिला के साथ खड़े होने के बजाय सबके सामने मारना पीटना धमकाना और बेइज्जती करना शुरू कर दिया।
जिस महिला को ससुराल से प्यार मिलना चाहिए था उसे ठीक से खाना मिलना भी मुश्किल हो गया।
जिसे दुनियां बहु समझ रही थी वह उस घर की एक नौकरानी से भी बदतर जिंदगी जीने लगी, घर की साफ सफाई करने के बाद खाना बनाने के लिए कहा जाना कोई ऐसी बुराई नहीं थी लेकिन घर का सारा काम सिर्फ वही करे और एक रोटी खाने के लिए इस तरह की पाबंदी जो उसे अंडरगार्मेंट में रोटी छुपा कर बाथरूम में ले जाकर खाना पड़े, यह वाकया उनके साथ जुर्म और शोषण की एक अलग ही लेवल की कहानी पेश करते हैं।
इस दौर से गुजरते हुए उस महिला को इस बात का अहसास नहीं हो रहा था कि आखिर उनके साथ हो क्या रहा है।
समय के साथ शोषण बढ़ता गया, उन्हें छोटी छोटी बातों पर पीटा जाता था। दिन रात शारीरिक हिंसा का शिकार बनाया जाता था, जब एक दिन उनके पिता उनसे मिलने आए, तो उन्होंने घर ले जाने और इस नर्क से बाहर निकालने की विनती की। पिता ने वापस आने और उसे घर ले जाने का वादा किया लेकिन वे वापस नहीं आए। उस दिन, इस महिला को समझ आया कि इस नरक से बाहर निकालने के लिए, इसे बचाने के लिए कोई भी नहीं आएगा, उसे इस संघर्ष को खुद ही लड़ना होगा।
वह महिला फांसी लगाने ही वाली थी... इस समय तक वह दो बच्चों की मां बन चुकी थीं, फिर भी उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ था।
वे बताती हैं 'मेरा माथा फटा हुआ है, हाथ पर कट के निशान हैं, पीठ जली हुई है। रोज रोज के अत्याचार अब सहन करना मुश्किल हो गया था। पता था कि खुद की जान लेना गलत है लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा था। एक दिन उन्होंने अपनी जान देने का फैसला किया।
उन्होंने बताया, मैंने अपने बेटे को सुला दिया। दूसरे बेटे को फीड कराया। माथा चूमा जैसे कि आखिरी बार सुला रही हूं। एक स्टूल खींचा और पंखें पर साड़ी लटका दी। मैं फांसी लगाने ही वाली थी कि खिड़की से मेरी सास का चेहरा दिखाई दिया। उन्होंने मुझे देखा, लेकिन उन्होंने रोका नहीं, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। वे वहां से ऐसे चली गईं जैसे उन्होंने कुछ देखा ही नहीं या उनके लिए इस महिला की आत्महत्या कोई मायने नहीं रखता।
यही पल उनके लिए एक निर्णायक पल था। उन्होंने कहा, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं ऐसे लोगों के लिए अपनी जान नहीं दे सकती। हिम्मत जुटाकर वे ससुराल से भाग निकलीं।
ससुराल से भागने के बाद इस महिला ने अपनी चचेरी बहन की भाभी के घर में रहने लगी थीं। पार्लर में काम किया, ट्यूशन पढ़ाया और संघर्ष करते करते आगे की पढ़ाई की। लेकिन अभी सब खत्म नहीं हुआ था। अलग होने के बाद भी पति कभी कभी आता था और मारपीट करता था।
उन्होंने बताया, वह बच्चों के सामने मुझे पीटता था। एक दिन एक बाल्टी में पेशाब किया और मुझ पर फेंक दिया। उस समय मैं एग्जाम देने जा रही थी। मैं फिर से नहाई, कपड़े बदले और अपना पेपर देने चली गई। मेरा दिल वाकई में कठोर हो गया था।
उस महिला का लक्ष्य अच्छी सरकारी नौकरी पाने का था। उन्होंने अकेले बच्चों की परवरिश करते हुए सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी की और बहुत जल्द उनकी मेहनत रंग लाई। कई सालों के संघर्ष और परेशानियों से जूझते हुए इस महिला ने अपने पहले ही प्रयास में मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली। वे एक सरकारी अधिकारी बन गईं। एक आदिवासी छात्रा के तौर पर उनकी इस उपलब्धि के लिए, सरकार ने उन्हें 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति भी दी।
इसके बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2017 का फॉर्म भरा। पहले ही अटेंप्ट में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू कर लिया था। आज, वह महिला एक IAS अधिकारी हैं। वे अपने पद का इस्तेमाल दूसरों की मदद करने के लिए करती हैं, खासकर गरीब समुदायों की महिलाओं और लड़कियों की। वे उनके शिक्षा के अधिकार और एक निडर जीवन के लिए संघर्ष करती हैं।
उस महिला का नाम है सविता प्रधान जो कि एक आईएएस अधिकारी हैं, मूल कहानी सोशल मीडिया से लिया है।
Sharma Amarendra
Women and Lockdown
I heard my mother and my sister-in-law whispering during these days of lockdown, that when this lockdown will be over. I asked them, what will you do after this lockdown, are you planning to go anywhere? They replied where we would go!! , we can't go anywhere, because we have lots of house chores to do. Suddenly their expressions changed and they took a deep breath and said, there is always lockdown for us, and we even never realized it.
Actually, they were absolutely correct. A woman is always busy in doing her house chores. After her birth, she stays at home for a long time. Right after her birth when she grows up a little bit, she gets trapped under the burden of responsibilities. In some rural areas of India, after secondary education, girls don't go for further studies as parents think that what they will do after higher studies, they have to go to their in-laws' house after marriage. When she gets married, she gets involved, looking after her husband, nourishing her children, and taking care of her in-laws and forgets about her goals and ambitions. She remains locked completely.
In the rural area of India maximum women stays at home. They are not allowed to go out for work. Maximum women are working as labor in MANREGA. A woman remains busy with her house chores all the time. She repeats the same routine every day with a massive burden of responsibilities.
During this lockdown, we were not able to go out of our home, offices, and were not able to meet friends. We have completely kept ourselves aside from social life. Now we are going out according to our work and need but with certain guidelines. Undoubtedly the Coronavirus will be over when the scientists will find the vaccine. What about this patriarchal conservative thought of this society, which is killing us every day as a social virus.
Think about it.
19/02/2020
On the date 15 to 16 of February 2020, samman had organized two day's workshop with adolescent girls. In this workshop, adolescent had understand about inequality, what is inequality actually?? They came to know more about basic menstruation hygiene, sanitation. In this workshop, they have understood the difference between gender and s*x. In this workshop, 24 adolescent girls had participated. The medium of the workshop was a group discussion, games, drama, storytelling, and movies.
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