Pawan Kumar Bhadu Roda-Nokha

Pawan Kumar Bhadu Roda-Nokha

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09/04/2024

एक समय था जब देशी घी गरम किया जाता था या बनाया जाता था तो आसपास के तीन चार घरों तक उसकी महक फैल जाती थी ।

इतनी सुंदर महक होती थी कि पूरा मन मस्तिष्क सब गमगमा जाते थे ।

जिस पात्र में घी रखा जाता था , मात्र वही खुल जाए तब भी आसपास के वातावरण में घी की सुंदर महक फैल जाती थी ।

लेकिन आज कितने भी अच्छे brand का घी लाओ , कोई महक नहीं । यहाँ तक कि उसमें नाक भी घुसा लो तब भी वह महक नहीं मिलती जो आज के 20 से 30 वर्ष पहले मिलती थी ।

कितना मिलावट हम खाते हैं , यह सोचने वाली बात है ।

गाँवों में भी कमोबेश यही स्थिति हो गयी है , शुद्ध घी बनाने पर भी वह महक नहीं मिल पाती जो पहले होती थी ।

कारण एकमात्र यही है कि पहले गायों को चराया जाता था जो विभिन्न प्रकार की वनस्पति ग्रहण करती थी , वह भी बिना insecticides, pesticides , chemical fertilizers से युक्त ।

जो भी था शुद्ध ग्रहण करती थी । जितना भी वनस्पति या औषधि खाती या चरती थी , वह सब दूध में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा बन कर व्याप्त हो जाती थी । पूरा दूध ही औषधि युक्त होता था ।

तब तो दूध भी Oxytocin injection घोंप कर जबरदस्ती नहीं निकाला जाता था ।

लेकिन आज ठीक इसके विपरीत है , अब तो दूध में कोई औषधीय गुण ही नहीं बचा । Oxytocin injection से जबरदस्ती निकाले हुए insecticide, pesticide, chemical fertilizer से पोषित वनस्पतियों से बने दूध का हश्र धीरे धीरे Slow Poison में बदलता जा रहा है ।

अरे आजकल तो दही तक chemical डालकर बनाया जाता है , जो पहले जामन से बनाया जाता था जो बिल्कुल organic और natural पद्धति से बनता था ।

धनिया , पुदीना अगर घर में आ बस जाता था तो पूरा घर महकता था । लेकिन आज .....
चने का साग इतना खट्टा होता था कि चटकारे लगा कर खाया जाता था लेकिन अब ......

बहुत दुख होता है कि हम कहाँ से कहाँ आ गए । और हैरानी की बात यह है कि इसी को हम क्रमिक विकास और आधुनिकता का नाम देते हैं।

हवा , पानी , जल , नदी , झरना , वनस्पति , आकाश, मिटी इत्यादि कोई एक भी ऐसा तत्व बता दे जिसको हमने ज़हर न बना दिया हो ।

हमने विनाश का दरवाजा स्वयं खोल दिया है ।
लेकिन यही तथाकथित विकास है और आधुनिकता की सीढ़ी है ।

पछतायेगा पछतायेगा , फिर गया समय नहीं आएगा ।

11/12/2023

किसने लिखा पता नहीं पर लिखने वाले ने बहुत ही गज़ब का लिखा है। बहुत बारीकी से observations किये हैं

👌👌👌👌👌
"मिडिल-क्लास" का होना भी
किसी वरदान से कम नहीं है.
कभी बोरियत नहीं होती.

जिंदगी भर कुछ ना कुछ आफत
लगी ही रहती है.

मिडिल क्लास वालों की स्थिति
सबसे दयनीय होती है,

न इन्हें तैमूर जैसा बचपन नसीब होता है
न अनूप जलोटा जैसा बुढ़ापा, फिर भी
अपने आप में उलझते हुए
व्यस्त रहते हैं.

मिडिल क्लास होने का भी
अपना फायदा है.
चाहे BMW का भाव बढ़े या AUDI का
या फिर नया i phone लाँच हो जाये,
कोई फर्क नहीं पड़ता.

मिडिल क्लास लोगों की
आधी जिंदगी तो ... झड़ते हुए बाल
और बढ़ते हुए पेट को रोकने में ही
चली जाती है.

इनके यहाँ फ्रूटी, कोल्ड ड्रिंक
एक साथ तभी आते हैं , जब घर में कोई
बढ़िया वाला रिश्तेदार आ रहा होता है.

मिडिल क्लास वालों के यहाँ
कपड़ों की तरह ही
खाने वाले चावल की भी
तीन वेराईटी होती है ~
डेली, कैजुवल और पार्टी वाला.

छानते समय चायपत्ती को दबा कर
लास्ट बून्द तक निचोड़ लेना ही
मिडिल क्लास वालों के लिए
परमसुख की अनुभुति होती है.

ये लोग रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल
नहीं करते, सीधे
अगरबत्ती जला लेते हैं.

मिडिल क्लास भारतीय परिवार के
घरों में Get together नहीं होता,
यहाँ 'सत्यनारायण भगवान की'
कथा होती है.

इनका फैमिली बजट इतना
सटीक होता है, कि सैलरी अगर
31 के बजाय 1 को आये, तो
गुल्लक फोड़ना पड़ जाता है.

मिडिल क्लास लोगों की
आधी ज़िन्दगी तो
"बहुत महँगा है" बोलने में ही
निकल जाती है.

इनकी "भूख" भी ...
होटल के रेट्स पर डिपेंड करती है.
दरअसल महंगे होटलों की मेन्यू-बुक में मिडिल क्लास इंसान
'फूड-आइटम्स' नहीं बल्कि
अपनी "औकात" ढूंढ रहा होता है.

इनके जीवन में कोई वैलेंटाइन नहीं होता.
"जिम्मेदारियाँ" जिंदगी भर
परछाईं की तरह पीछे लगी रहती हैं.

मध्यम वर्गीय दूल्हा-दुल्हन भी
मंच पर ऐसे बैठे रहते हैं मानो जैसे
किसी भारी सदमे में हों.

अमीर शादी के बाद
चलता बनते हैं , और
मिडिल क्लास लोगों की शादी के बाद
टेन्ट बर्तन वाले पीछे पड़ जाते हैं.

मिडिल क्लास बंदे को
पर्सनल बेड और रूम भी
शादी के बाद ही अलाॅट हो पाता है.

मिडिल क्लास ... बस ये समझ लो कि
जो तेल सर पे लगाते हैं , वही तेल
मुँह पर भी रगड़ लेते हैं.

एक सच्चा मिडिल क्लास आदमी
गीजर बंद करके
तब तक नहाता रहता है
जब तक कि नल से
ठंडा पानी आना शुरू ना हो जाए.

रूम ठंडा होते ही AC बंद करने वाला
मिडिल क्लास आदमी चंदा देने के वक्त
नास्तिक हो जाता है, और
प्रसाद खाने के वक्त आस्तिक.

दरअसल मिडिल-क्लास तो
चौराहे पर लगी घण्टी के समान है,
जिसे लूली-लगंड़ी, अंधी-बहरी,
अल्पमत-पूर्णमत
हर प्रकार की सरकार
पूरा दम से बजाती है.

मिडिल क्लास को आज तक बजट में
वही मिला है, जो अक्सर हम
🔔 मंदिर में बजाते हैं. 🔔

फिर भी हिम्मत करके
मिडिल क्लास आदमी
पैसा बचाने की
बहुत कोशिश करता है,
लेकिन
बचा कुछ भी नहीं पाता.

हकीकत में मिडिल मैन की हालत
पंगत के बीच बैठे हुए
उस आदमी की तरह होती है
जिसके पास पूड़ी-सब्जी
चाहे इधर से आये, चाहे उधर से
उस तक आते-आते
खत्म हो जाती है.

मिडिल क्लास के सपने भी
लिमिटेड होते हैं.
"टंकी भर गई है, मोटर बंद करना है"
गैस पर दूध उबल गया है,
चावल जल गया है,
इसी टाईप के सपने आते हैं.

दिल में अनगिनत सपने लिए
बस चलता ही जाता है ...
चलता ही जाता है.
और चला जाता है।
*ये मिडिल क्लास आदमी*
💐🌷💐🌷🙏🙏

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