Tarunkumar
12/12/2025
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पवन कल्याण ने बांटा अपने दिल का दर्द :
थिरुप्परनकुंद्रम भगवान मुरुगन के छह धामों में पहला माना जाता है। पहाड़ी पर दीप जलाने की परंपरा बहुत पुरानी है।
लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज हिंदुओं को अपनी ही परंपराओं के लिए कोर्ट की मदद लेनी पड़ रही है।
और दुख तो ये है कि कानूनी लड़ाई जीतने के बाद भी अगर हम अपनी ही जगह पर एक साधारण, शांत अनुष्ठान नहीं कर सकते, तो फिर अपने ही देश में हमें न्याय कहाँ मिलेगा?”
“सच्चाई ये है कि दीपदान का हमारा अधिकार हाईकोर्ट ने दो बार माना—पहले सिंगल जज ने, फिर डिविज़न बेंच ने। यानी क़ानून हमारी तरफ था।
फिर भी, प्रैक्टिकली हमें पीछे हटना पड़ा। ये सोचना ही अजीब है कि कोई धार्मिक उत्सव एक हफ्ते बाद मनाया जा सकता है। कुछ चीज़ों का अपना ही समय होता है—जिन्हें बदला नहीं जा सकता।”
“लेकिन इस बार कार्तिगाई दीपम का वो पवित्र पल हमसे छिन गया। क्यों?
क्योंकि हिंदुओं को आसानी से इग्नोर किया जा सकता है—कभी सरकारें, कभी प्रशासन, कभी एनजीओ, कभी ‘बौद्धिक’ गैंग।
हर बार हिंदू ही एडजस्ट करते हैं।
हक़ मिल गया, पर अनुष्ठान खो गया।”
“इसीलिए अब वक्त आ गया है कि हम सिर्फ कोर्ट की जीत से ज़्यादा की मांग करें—हमें एक सनातन धर्म रक्षा बोर्ड चाहिए, जहाँ भक्त मिलकर अपने मंदिरों और परंपराओं का प्रबंधन कर सकें।”
“कुछ लोग खुलेआम हिंदू रीति-रिवाजों का मज़ाक उड़ाते हैं। क्या वे ऐसा किसी और धर्म के त्योहार पर करने की हिम्मत करते हैं?
क्या हमारे अधिकार (अनुच्छेद 25) सिर्फ कागज़ पर रह गए हैं?
क्या कोई अधिकारी हाईकोर्ट के फैसले को अपनी मर्ज़ी से पलट सकता है?”
“जो बात सबसे ज़्यादा चुभती है, वो ये कि प्रशासन बार-बार हिंदू मंदिरों और श्रद्धालुओं के खिलाफ़ खड़ा दिखता है—और कोई जवाबदेही भी नहीं होती।”
“हिंदुओं को भी बाकी धर्मों की तरह एकजुट होना पड़ेगा।
जब तक हम जाति, भाषा, क्षेत्र में बँटे रहेंगे, हमारी परंपराएँ हमेशा टारगेट होती रहेंगी।
अगर हम एक न्यूनतम साझा मुद्दे पर भी नहीं जुड़ पाए, तो धीरे-धीरे ये भावना खत्म हो जाएगी।”
“मेरी बस यही इच्छा है कि कश्मीर से कन्याकुमारी और कामाख्या से द्वारका तक हर हिंदू अपनी ही भूमि पर हो रहे अपमान को महसूस करे और उसके खिलाफ़ उठ खड़ा हो।
— पवन कल्याण
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