Vimal Pathak
10/06/2025
*ये है कौशांबी के रामबाबू तिवारी के केस की सच्चाई।सुनेंगे तो मानवता के कंधे शर्म से झुक जाएंगे।*
*ज़मीन के विवाद में आठ साल की बच्ची का इस्तेमाल किया गया। उससे बलात्कार की झूठी कहानी कहलाई गई* ।
उस मासूम ने मजिस्ट्रेट के सामने सब कुछ बयां कर दिया कि जो उसकी मां ने सिखाया था, वही उसने पुलिस को बताया।
फिर क्या था। प्रधान के रसूख और पुलिसिया सांठ-गांठ से रामबाबू तिवारी के बेटे पर पोस्को लगाकर जेल भेज दिया गया।
रामबाबू तिवारी गुहार लगाते रहे। अपने सीने में निर्दोष बेटे के जेल जाने के दर्द का शूल लिए भटकते रहे। निरंकुशता, स्वार्थ और द्वेष के शापित तंत्र से गुहार करते रहे कि एक बार जांच तो कर लो मामले की।
मगर जोड़-तोड़ और अहमन्यता की ईंटों से सजी व्यवस्था के निर्जीव शरीर में ज़रा भी हलचल नहीं हुई। एक पिता और क्या करता!! उसने लाचारगी के हाथों से असहाय विकल्पहीनता का ज़हर लिया और पीकर मर गया।
अपने पेट पर सुसाइड नोट की शक्ल में कौशांबी पुलिस के लिए स्वर्ण पट्टिकाओं में फ्रेम कराने वाला एक प्रशस्ति पत्र छोड़ गया।
पुलिस इतने पर ही नहीं रुकी। वो तो अहंकार और निरंकुशता के दिग्विजय का अश्व बन चुकी थी। सो पिता के पोस्टमार्टम के बाद अंतिम संस्कार में जेल भेजे गए बेटे को बुलाए जाने की मांग कर रहे परिजनों पर लाठी चली, लात चली।
रामबाबू तिवारी के बेटे अक्षय तिवारी की पत्नी तक को चौकी पर बिठा लिया।
रामबाबू तिवारी के बेटे अक्षय ने टॉप सीक्रेट को बताया कि उनके परिवार पर पुलिसिया तंत्र का ऐसा कहर टूटा कि पिता की लाश को कंधा देने के लिए भी घर पर कोई शेष नहीं था।
जब शोर हुआ। आवाज़ें गूंजीं। मीडिया में तस्वीरें आना शुरू हुईं। उच्चाधिकारियों ने पूछना शुरू किया। तब जाकर बेपरवाही की कालीन पर अभयदान का पंखा चलाकर सो रही पुलिस की नींद टूटी।
मामले की जांच की गई। देखते ही देखते सच का अंखुआ झूठ की ज़मीन का माथा फोड़कर बाहर आ गया। रामबाबू तिवारी के बेटे से पोस्को हटा। उसकी जेल से जमानत हुई।
वो घर आया। मां से लिपटकर रोया। उसने बाप के कंधे पर भी सर रखकर रोना चाहा। मगर बाप तो तस्वीर में बदल चुके थे।
यूपी पुलिस को इस तस्वीर को अपने हेडक्ववार्टर में जगह देनी चाहिए और उत्तर प्रदेश के SC/ST के कोटे से बने प्रधान अपनी दबंगई, तानाशाही से ब्राह्मण समाज को SC/ST act की धमकी देकर परेशान करते रहते है। ज्यादातर ग्राम प्रधान अंगूठा छाप है!!!!
घर में घुसकर मारा है, कब्र तुम्हारी खोदी है,
भारत की गद्दी पर बैठा, बाप तुम्हारा मोदी है। 💪
हमारे देश के वीर सैनिक न केवल अपनी जान की आहुति देते हैं, बल्कि अपने परिवार को भी इस बलिदान की राह पर छोड़ जाते हैं। शहीद होने पर उनकी पत्नी गहरे दुःख से गुजरती हैं, लेकिन उन्हें "विधवा" कहकर पुकारना उनके गौरवशाली त्याग की भावना को कम कर देता है।
यदि उन्हें "वीरवधु" कहा जाए, तो यह न केवल उनका सम्मान बढ़ाएगा, बल्कि उन्हें एक सशक्त और प्रेरणादायक पहचान देगा। "वीरवधु" का अर्थ है वीर की पत्नी—जो न केवल बलिदान की साक्षी हैं, बल्कि स्वयं भी साहस और संघर्ष का प्रतीक हैं।
हमारे इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई से लेकर आज की शहीदों की पत्नियाँ तक, सभी ने समाज के लिए मिसाल कायम की है। ऐसे में "वीरवधु" शब्द उनके मनोबल को बढ़ाएगा और समाज को याद दिलाएगा कि वे असहाय नहीं, बल्कि सम्मान और प्रेरणा की मूर्ति हैं।
अब समय आ गया है कि हम अपनी भाषा और दृष्टिकोण बदलें—शहीदों की पत्नियाँ "विधवा" नहीं, "वीरवधु" हैं!
✍️विमल
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