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20/04/2023
#अमली, #अम्बली या खमीर वाला दलिया,,,,, भारत पौराणिक समय से खानपान को लेकर काफी समृद्ध देश रहा है। यहां पर पैदा होने वाले अनाज फल और सब्जियां ना सिर्फ सेहतमंद होती है बल्कि यह ऊर्जा का प्रमुख भंडार भी है। हरित क्रांति से पहले भारत में मोटे अनाज का ही प्रचलन था। मोटे अनाज में ज्वार, बाजरा, रागी, कुट्टु, चीना, सांवा, कोदो आदि शामिल हैं। भारत ही नहीं एशिया के लाखों छोटे किसान इन्हें आवश्यक मुख्य अनाज की फसलों के रूप में उगाते थे। मोटे अनाज को गरीबों का अनाज भी कहा जाता है। इसके कई कारण हैं जैसे कि इसका इस्तेमाल भोजन, चारा और जैव ईंधन बनाने के लिए होता है।
लेकिन हरित क्रांति के बाद देश जनसंख्या के हिसाब से खानपान की डिमांड बढ़ी और अधिक उपज वाले अनाज जैसे गेहूं और कई प्रकार के चावल की हाइब्रिड वैरायटी भारत में प्रमुखता से अपने पांव पसारे। इससे यह हुआ कि भारत के लाखों लोगों का पेट तो जरूर भर गया लेकिन पोषण अधूरा रह गया। सुंदर और अधिक उपज देने वाले अनाज के प्रति किसान आकर्षित होते चले गए नतीजा यह हुआ कि भारत ब्लड प्रेश, डायबिटीज, टीवी और अब कैंसर जैसी बीमारियों का देश बनते चला गया। अधिक उपज के लिए हाइब्रिड बीज और अत्यधिक कीटनाशक और उर्वरक के इस्तेमाल से अब मनुष्य के अलावा हमारी धरती भी बंजर और प्रदूषित हो गई है।
लेकिन भारत एक बार फिर से अपनी पुरानी सभ्यता की ओर लौटने को अग्रसर है। यही कारण है कि वर्ष 2023 को मिलेट वर्ष के रूप में पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी समेत देश के कई राज्यों में मिलेट यानी मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
#दरअसल मिलेट यानी मोटे अनाज कई मायने में हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है यह ना सिर्फ मिनरल विटामिंस और फाइबर से समृद्धा अनाज होता है। बल्कि यह खाने में भी काफी किफायती साबित होता है।
#मोटे अनाज की रेसिपी में आज हम अमली के बारे में चर्चा करेंगे। अमली, अम्बली या खमीर वाला दलिया अलग-अलग जगहों में यह अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसकी खासियत यह है कि इसके बनाने से पूर्व इसमें #प्रीबायोटिक #बैक्टीरिया जो हमारे पाचन तंत्र को मजबूत करता है की वृद्धि होती है। मिट्टी के बर्तन में बनाने के कारण इसमें ऑक्सीकरण की प्रक्रिया होती है जिससे इसमें कई लाभदायक बैक्टीरिया पैदा होते हैं।
दरअसल अमली बनाने के लिए हमें कोई भी एक मोटे अनाज को धोकर साफ करना होता है। फिर उसमें अनाज के तुलना में 10 गुना पानी में रात भर भिगोना होता है सुबह उसी पानी में उसे पकाना होता है फिर उसे 6 से 8 घंटे के लिए उसी तरह छोड़ दिया जाता है इस दौरान उसमें ऑक्सीकरण की प्रक्रिया के कारण उसमें प्रोबायोटिक बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं। बाद में से छाछ के साथ सेवन किया जाता है। अमली पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण या शक्तिवर्धक होता है वही कुछ लाभदायक बैक्टीरिया के कारण यह पचने में भी बहुत ही आसान होता है। 3 महीने तक सेवन करने से पाचन से संबंधित लगभग सभी प्रकार की समस्या का समाधान इससे संभव है।
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