Satynam Das
अद्भुत बाल-लीला: जब शिव-पार्वती ने दिया बाल स्वरूप समर्थ साहब को आशीष
यह अलौकिक प्रसंग उस समय का है, जब परम पूज्य समर्थ साहब जी मात्र छह माह के सुकोमल बालक थे। एक दिन, ममतामई माता कमला मैया ने वात्सल्य भाव से भरकर बालक को तेल-उबटन लगाया, उन्हें स्नान कराया और बड़े लाड-प्यार से पलंग पर सुला दिया। थकावट के कारण मैया भी बालक के समीप ही गहरी निद्रा में लीन हो गईं।
उसी शांत बेला में, अंतरीक्ष मार्ग से साक्षात् देवाधिदेव महादेव का आगमन हुआ। प्रभु शिव ने बड़े प्रेम से बाल स्वरूप साहब को अपनी गोदी में उठा लिया और उन्हें लेकर आदिशक्ति माता पार्वती के पास पहुंचे। जगज्जननी मां पार्वती ने जब उस परम दिव्य बालक को देखा, तो उनका हृदय अगाध वात्सल्य से भर उठा। उन्होंने अत्यंत प्रसन्न होकर बालक को निहारा और मंगल आशीष के रूप में उनके मस्तक पर एक दिव्य तिलक (टीका) लगा दिया। तत्पश्चात, भगवान शंकर ने बड़े जतन से बालक को वापस लाकर मैया के पास उसी पलंग पर लेटा दिया और अंतर्ध्यान हो गए।
कुछ समय बाद जब माता कमला की निद्रा खुली, तो बालक के मस्तक पर एक अपूर्व, देदीप्यमान तिलक देखकर वह चौंक उठीं। मैया भली-भांति जानती थीं कि यह टीका उन्होंने नहीं लगाया है। ममतामई मां का हृदय अनिष्ट की आशंका से घबरा उठा। उनके मन में विचार आया कि कहीं किसी ने उनके सुकुमार बालक पर कोई टोना-टोटका तो नहीं कर दिया?
व्याकुल होकर मैया ने तुरंत पड़ोस की महिलाओं को एकत्र किया और अपनी चिंता साझा की। मैया को अत्यंत दुखी देखकर पड़ोस की अनुभवी महिलाओं ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा—
"हे मैया! तुम तनिक भी चिंता न करो। बालक की नजर उतारने के लिए राई और नमक वार कर (उतारकर) फेंक दो। जगत के पालनहार पर भरोसा रखो, भगवान की कृपा से बालक का कोई बाल भी बांका नहीं कर पाएगा।"
संसार जिसे टोना-टोटका समझ रहा था, वह तो वास्तव में आदि-अनादि शक्ति का परम आशीर्वाद था। उसी दिव्य घटना के बाद से समर्थ साहब जी की महिमा और भक्ति दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ने लगी। वे एक अलौकिक, दिव्य पुरुष के रूप में अपनी अद्भुत लीलाएं रचने लगे।
परम पूज्य बड़े बाबा की असीम अनुकंपा और कृपा दृष्टि यदि बनी रही, तो समर्थ साहब जी की ऐसी ही अनेक पावन लीलाएं क्रमशः आपकी सेवा में आगे भी प्रस्तुत की जाती रहेंगी।
जय समर्थ स्वामी जगजीवन दास साहब जी!
जय हो श्री कोटवा धाम की!
कोटवा धाम जगत से न्यारा...
#कोटवाधाम
जय हो समर्थ स्वामी जगजीवन दास साहब की
श्री कोटवा धाम जगत से न्यारा
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