Vijay Kumar
जीवन में सफलता उसी को मिलती है जिसने मुसीबतों का सामना किया हैं। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है –
“जीवन एक संघर्ष है एंव इसका सामना प्रत्येक व्यक्ति को करना होता हैं।”
मुसीबतों से भागना, नयी मुसीबतों को निमंत्रण देने के समान है। जीवन में समय-समय पर चुनौतियों एंव मुसीबतों का सामना करना पड़ता है एंव यही जीवन का सत्य है।
अंग्रेजी में एक कहावत है –
“एक शांत समुन्द्र में नाविक कभी भी कुशल नहीं बन पाता” – “A smooth sea never made a skillful mariner”।
कोई भी एक ऐसा सफल व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसने सफलता से पहले असफलता एंव मुसीबतों का सामना न किया हो।
कभी हार मत मानो
बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है।
“अधिकतर लोग ठीक उसी समय हार मान लेते है, जब सफलता उन्हें मिलने वाली होती है। विजय रेखा बस एक कदम दूर होती है, तभी वे कोशिश करना बंद कर देते है। वे खेल के मैदान से अंतिम मिनट में हट जाते है, जबकि उस समय जीत का निशान उनसे केवल एक फुट के फासले पर होता है|” — एच रोस पेरोट
एक छोटे से कस्बे में शंभू शिल्पकार रहता था। वह पहाड़ों से बड़े-बड़े पत्थर तोड़कर लाता और उसे आकार देकर मूर्तियां बनाता। इस रोजगार में मेहनत बहुत ज्यादा थी , आमदनी कम।
दिन भर धूप पसीने में काम करते हुए शंभू पत्थर तोड़ता। यह काम उसके पूर्वज भी किया करते थे।
शंभू काम करते हुए सोचता है , यह छोटा-मोटा काम करने से क्या फायदा? ठीक से दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती। मैं बड़ा आदमी बन जाऊं तो काम भी ज्यादा नहीं करना होगा और बैठकर आराम से ऐस मौज करूंगा।
एक रोज वह ऐसे नेता को देखता है , जिसके आगे पीछे हमेशा भीड़ रहती है। उसको हाथ जोड़कर प्रणाम करने वाले सैकड़ों लोग खड़ी रहती हैं। शंभू ने नेता बनने की ठान ली , कुछ दिनों में वह नेता बन गया।
नेता बनने के बाद जब वह एक रैली कर रहा था , धूप काफी तीव्र थी। धूप की गर्मी वह सहन नहीं कर पाया और बेहोश होकर वहीं गिर गया।
होश आने पर उसने पाया वह बिस्तर पर लेटा हुआ है।
बिस्तर पर लेटे लेटे वह सोचने लगा कि नेता से बलवान वह सूर्य है जिसकी गर्मी कोई सहन नहीं कर पाता। मुझे अब सूर्य बनना है। कुछ दिनों बाद वह सूर्य भी बन गया।
शंभू अब गर्व से चमकता रहता और भीषण गर्मी उत्पन्न करता। तभी उसने देखा एक मजदूर खेत में आराम से काम कर रहा है। उसने गर्मी और बढ़ाई मगर मजदूर पर कोई फर्क नहीं पड़ा। विचार किया तो उसे मालूम हुआ। ठंडी-ठंडी हवा पृथ्वी पर बह रही है , तब शभु ने विचार किया। हवा बनकर मैं और शक्तिशाली बन जाऊंगा , कुछ दिनों बाद वह हवा बन गया।
हवा बनकर वह इतराता-इठलाता इधर-उधर घूमने लगा।
अचानक उसके सामने विकराल पर्वत आ गया , जिसके पार वह नहीं जा सका। तब उसने सोचा मैं इससे भी बड़ा पर्वत बनकर रहूंगा। कुछ समय बाद वह विशालकाय पर्वत बन गया।
अब उसे अपने आकार और शक्तिशाली होने का घमंड हो गया।
कुछ दिनों बाद उसे छेनी-हथौड़ी की आवाज परेशान करने लगी।
वह काफी परेशान हो गया , उसकी आवाज इतनी कर्कश थी जो उसके शरीर को तोड़े जा रही थी।
आंख खुली तो उसने देखा एक शिल्पकार उसके पर्वत को तोड़ रहा है।
लेकिन अब वह मजदूर नहीं बनना चाहता था। वह काफी परेशान था , नींद खुली तो उसने आईने में पाया – वह जो विशाल पर्वत को भी तोड़ने का साहस रखता है वह तो स्वयं वही है।
एक व्यक्ति रास्ते से गुजर रहा था कि तभी उसने देखा कि एक हाथी एक छोटे से लकड़ी के खूंटे से बंधा खड़ा था।व्यक्ति को देखकर बड़ी हैरानी हुई कि इतना विशाल हाथी एक पतली रस्सी के सहारे उस लकड़ी के खूंटे से बंधा हुआ है।
ये देखकर व्यक्ति को आश्चर्य भी हुआ और हंसी भी आयी। उस व्यक्ति ने हाथी के मालिक से कहा – अरे ये हाथी तो इतना विशाल है फिर इस पतली सी रस्सी और खूंटे से क्यों बंधा है ? ये चाहे तो एक झटके में इस रस्सी को तोड़ सकता है लेकिन ये फिर भी क्यों बंधा है ?
हाथी के मालिक ने व्यक्ति से कहा कि श्रीमान जब यह हाथी छोटा था मैंने उसी समय इसे रस्सी से बांधा था। उस समय इसने खूंटा उखाड़ने और रस्सी तोड़ने की पूरी कोशिश की लेकिन यह छोटा था इसलिए नाकाम रहा। इसने हजारों कोशिश कीं लेकिन जब इससे यह रस्सी नहीं टूटी तो हाथी को यह विश्वास हो गया कि यह रस्सी बहुत मजबूत है और यह उसे कभी नहीं तोड़ पायेगा इस तरह हाथी ने रस्सी तोड़ने की कोशिश ही खत्म कर दी।
आज यह हाथी इतना विशाल हो चुका है लेकिन इसके मन में आज भी यही विश्वास बना हुआ है कि यह रस्सी को नहीं तोड़ पायेगा इसलिए यह इसे तोड़ने की कभी कोशिश ही नहीं करता। इसलिए इतना विशाल होकर भी यह हाथी एक पतली सी रस्सी से बंधा है।
दोस्तों उस हाथी की तरह ही हम इंसानों में भी कई ऐसे विश्वास बन जाते हैं जिनसे हम कभी पार नहीं पा पाते। एकबार असफल होने के बाद हम ये मान लेते हैं कि अब हम सफल नहीं हो सकते और फिर हम कभी आगे बढ़ने की कोशिश ही नहीं करते और झूठे विश्वासों में बंधकर हाथी जैसी जिंदगी गुजार देते हैं।
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