8 PM INDIA
03/02/2026
नज़रिया
सूचना छुपाने की मंशा
केंद्र सरकार सूचना का अधिकार कानून यानी आरटीआई में कुछ नये प्रावधान करने की जरूरत बड़ी शिद्दत के साथ महसूस कर रही है। ये जानकारी बजट सेशन के दौरान संसद में पेश आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में दी गयी। रिपोर्ट में कहा गया कि सूचना का अधिकार कानून का अध्ययन किया जाना चाहिए। और इसमें कुछ ऐसे प्रावधान होने चाहिए जिससे गोपनीय रिपोर्ट और मसौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से छूट मिल सके। एक लंबे संघर्ष के बाद 2005 में आम आदमी को सूचना का अधिकार मिला था। सूचना के अधिकार कानून का मुख्य मकसद सरकारी काम-काज में पारदर्शिता लाना और जवाबदेही तय करना है। इस कानून से देश के लोगों को सरकारी कामकाज की जानकारी लेने का अधिकार मिला है। जिससे लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई है।
इस कानून के लागू होने के बाद सरकारी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों को कानून के कठघरे में खड़ा करने में अहम सफलता मिली है। सही मायने में देखा जाए तो सूचना के अधिकार कानून से जनता में सरकारी कामकाज को लेकर विश्वास बढ़ा है। अब सवाल ये उठता कि सरकार एक तरफ तो भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाने और कामकाज में पार्दर्शिता लाने के दावे करती है। दूसरी तरफ जिस कानून ने भ्रष्टाचार को रोकने और कम करने तथा पार्दर्शिता लाने में अहम भूमिका निभाई है, उसी को गोपनीयता के बहाने कमजोर करना चाहती है।
गौरतलब है कि सूचना का अधिकार कानून-2005 के तहत आम तौर पर गोपनीय या निजी रिपोर्ट साझा नहीं की जाती हैं। क्योंकि धारा 8(1) के तहत व्यक्तिगत निजता, सामरिक सुरक्षा, व्यापारिक गोपनीयता, या विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय जानकारी के बारे में पहले ही छूट है। हां, यदि सक्षम अधिकारी को लगता है कि वास्तव में जनहित निजी हित से बड़ा है, तो ऐसी जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है। कुछ मामलों में 20 साल से ज्यादा पुरानी गोपनीय फाइलें भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इतने सबके बावजूद सूचना का अधिकार कानून लागू होने के दो दशक बाद अब सरकार को एक बार फिर गोपनीय रिपोर्ट्स और मसौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से छूट पाने के लिए और प्रावधान किये जाने की जरूरत महसूस हो रही है। ये हैरान करने वाली बात है।
समीक्षा रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि सूचना का अधिकार कानून का मकसद फिजूल की जिज्ञासा का जरिया बनाने अथवा बाहर बैठ कर सरकारी कामकाज में दखल देने अथवा नियंत्रित करने का नहीं था। निसंदेह कुछेक ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जिनमें कानून की आड़ में सरकारी कामकाज में बाधा डालने की अनधिकार चेष्टा की गयी। लेकिन ये इतनी बड़ी संख्या में नहीं है कि इसके लिए कानून में अतिरिक्त प्रावधान करने की जरूरत पड़े। विगत कुछ सालों में देखा गया है कि आरटीआई कानून के तहत सूचना देने में सरकारी तंत्र अनावश्यक देरी करने और जानबूझकर जानकारी छुपाने के प्रयास करता रहा है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक बड़ी संख्या में आरटीआई कार्यकर्ताओं की अपील सूचना आयुक्तों के पास लंबे समय से अटकी हुई हैं। यहां तक कि सरकारी तंत्र जानकारी देने की बजाय छुपाने के लिए ज्यादा प्रयासरत रहता है। इससे सूचना का अधिकार कानून का प्रभाव कम हुआ है।
यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता चाहती है तो आरटीआई कानून को सख्ती से लागू करने के निर्देश सभी विभागों को देने चाहिए। कानून की आड़ में सरकारी कामकाज में अनावश्यक बाधा डालने वाले शरारती तत्वों पर रोक लगाने के लिए कुछ और प्रावधान जोड़े जाते हैं तो पहले से ही विभिन्न हथकंडे अपनाकर भोथरा किया जा चुका कानून बराय नाम रह जायेगा। सूचना को दबाने-छुपाने की प्रवृत्ति सरकार की मंशा पर भी संदेह पैदा करती है। सरकार को इस तरह के किसी भी प्रयास से बचना चाहिए।
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