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⚜️कटू सत्य ⚜️
🛕📿पंडित जी की सत्य घटना
पंडित जी गांव मे एक यजमान के यहॉ सत्यनारायण कथा करके घर आए , और पत्नी सावित्री से बोले जरा एक गिलास पानी पिलाना । तभी पंडित जी की छोटी बेटी व बेटा दौडते हुए आए और बोले पापा हमारे लिए क्या लेकर आए तो पंडित जी ने थैली मे रखी आटे की प्रसाद और कुछ फल बच्चो को देते हुए कहा बेटा ये लो प्रसाद तुम्हारे लिए , तो बेटी बोली पापा मिठाई नही लाए पंडित जी बोले बेटा मिठाई यजमान लाए तो थे पर इतनी की सिर्फ वो व उनके घरवाले खा सके हमारे लिए तो सिर्फ आटे की प्रसाद बची ये खाऔ अगली बार मिठाई ले आऊंगा । तभी बेटा बोला पापा हमारे मास्टर जी कह रहे थे जल्दी स्कूल की फिस ( शुल्क ) भर दो नही तो परिक्षा मे नही बैठने देंगे । दुखी मन से पंडित जी ने कहा बेटा मास्टरजी से कहना जल्दी भर देगे । तभी पंडिताईन ( पत्नी ) बोली सुनते हो दुर के रिश्तेदार के यहॉ शादी है हमे उनको कुछ तो देना चाहिए न यदि नही देगे तो कल को हमारे बच्चों की शादी मे नही आएगे वो ।
पंडित जी की आंखो मे आंसु आ गए और बोले पंडिताईन तुम जानती हो पुरोहित कर्म करके मे तुम सबकी इच्छाएँ पुरी नही कर पा रहा हुं । आज सत्यनारायण कथा करवाई बदले मे 101 रुपये दक्षिणा दि और पचास रुपये चढावे मे आए अब तुम ही बताऔ इन 150 रुपये बेटे की स्कूल फिस भरु या बेटी को कपडे दिलवाऊ या रिश्तेदार की शादी के लिए सामान खरिदू ?? आज पैसा होता तो बेटी को सरकारी स्कुल मे नही पढा रहा होता बल्कि बेटे के साथ प्राईवेट स्कुल मे पढाता । ब्राह्मण कुल मे पैदा हुआ हुं यदि अपना पुरोहित कर्म छोडु तो पुर्वजो की कीर्ति को ठेस पहुंचे और ये सब ही करता रहुं तो बच्चो के भविष्य को बिगाडु ।
पंडिताईन आज हमारा दुर्भाग्य ये है कि हम गरीब है⁉️
फिर भी लोग मुझसे कहते है जब मै पुजा करवाकर घर आता हुं तो कि यजमान को कितने का चुना लगाया । ये तो प्रभु जानते हे मैने चुना लगाया या नही लगाया । हम ब्राह्मण हैं तो हमे राशन नही मिलता , ब्राह्मण हैं तो मेरे बच्चौ को छात्रवत्ती ( स्कालरशिप ) नही मिलती , ब्राह्मण हैं तो मेरे बच्चो को निशुल्क किताबे नही मिलती , ब्राह्मण हैं इसलिए मेरे बच्चे की स्कुल फिस ज्यादा है । पंडिताईन हम ब्राह्मण कुल मे पैदा हुए क्या ये हमारा दोष है ??? ब्राह्मण गरिब नही हो सकता ??? पता नही हम ब्राह्मणो को सब लुटेरा क्यो समझते है ?? हमने किसका पैसा लुटा है ?? हे प्रभु हम कब तक ऐसे दयनिय स्थिती मे रहेगे ।
पंडिताईन बोली आप चिंता मत करिए ब्राह्मणो के हितैषी भगवान जानते है हमने कभी गलत नही किया एक न एक दिन हमारा भी भला होगा आप रोइए मत मेरे पायल गिरवी रखकर बेटे की फिस भर दीजिए और शादी का सामान ले आइए , इतना कहकर पंडिताईन रसोई मे भोजन बनाने चली गई व पंडित जी बच्चौ से बात करने लग गए.......।
ये अधिकांश ब्राह्मणो के घर की सच्ची कहानी है । हर ब्राह्मण अमिर नही होता ये बात समाज को समझ लेना चाहिए ।
आप सब का जवाब मित्रों मेरा विश्वास इन बातों में सच्चाई छुपी हुई है।
दोस्तों कुछ गलत लगा हो तो माफ करिए गा पर यही सच्चाई है एक सच्चा ब्राह्मण सच्चा पंडित आज भी एक पैसा शादी कराने का या पूजा कराने का नहीं मांगता है फिर हर चीज ब्राह्मणों से ही क्यों काटा जाता हैं ना तो उसे राशन मिलता है ना पढ़ने की कोई व्यवस्था हो पाती है हम तो कहते हैं गरीबों के लिए ही जो कुछ किया जाए किया जाए चाहे वह किसी जाति धर्म का हो।
⚜️ सनातन संस्कृति को बचाने के लिए आगे बढ़ो 💞
आपका दिन मंगलमय हो 🌹 ऊं नमः पार्वते पतेय शिव हर हर महादेव शम्भू 💞
🙏🕉️🙏🏻क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ?
यदि खाते हैं, तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती ?
और यदि नहीं खाते हैं, तो भोग लगाने का क्या लाभ ?
एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से यह प्रश्न किया।
गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया।
वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे
उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया:
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें।
एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं ? उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया।
फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया, तो शिष्य ने कहा कि" वे चाहें, तो पुस्तक देख लें; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है।”
गुरु ने पुस्तक देखते हुए कहा“ श्लोक तो पुस्तक में ही है, तो तुम्हारे दिमाग में कैसे चला गया? शिष्य कुछ भी उत्तर नहीं दे पाया।
तब गुरु ने कहा “ पुस्तक में जो श्लोक है, वह स्थूल रूप में है। तुमने जब श्लोक पढ़ा, तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे दिमाग में प्रवेश कर गया,
उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मस्तिष्क में रहता है। और जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया, तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई।
इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं,
और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती। उसी को हम *प्रसाद* के रूप में ग्रहण करते हैं।
शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया।
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