Waterman Rajendra Singh
15/05/2026
Tarun Bharat Sangh द्वारा के सहयोग से मरुभूमि जैसलमेर के ग्रामीण क्षेत्र में 'सोहड़ासर तालाब’ के पुनर्जीवन का निर्माण कार्य लगातार जारी है।
इस तालाब से पशुओं के लिए पीने के पानी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित होगी, भूजल स्तर में सुधार होगा (पुनर्भरण), स्थानीय जैव-विविधता को नया जीवन मिलेगा। मरुभूमि में जल का हर कण अमूल्य है, और ऐसे प्रयास हमें याद दिलाते हैं कि परंपरा, श्रमदान और सामुदायिक भागीदारी से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
14/05/2026
*अरावली का संरक्षण भारत के पर्वतों के लिए प्रेरक है।*
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न्यायालय ने अपने प्रारंभिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया था कि जिन क्षेत्रों को पहले से कानूनी संरक्षण प्राप्त है, उन्हें खनन या अन्य पर्यावरण-क्षतिकारक गतिविधियों के लिए नहीं खोला जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि प्रशासनिक अस्पष्टता या सरकारी लापरवाही को पर्यावरणीय सुरक्षा लागू न करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसी क्रम में पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के अंतर्गत एहतियाती सिद्धांत, पारिस्थितिक जोखिम, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत और विशेषज्ञ-सहायता प्राप्त न्यायिक निर्णयों की अवधारणाएँ भी विकसित हुईं।
अरावली संरक्षण को लेकर विभिन्न समितियों और विशेषज्ञ समूहों के बीच लंबे समय से मतभेद बने रहे हैं। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत अभिलेखों में असहमति वाले प्रतिवेदन भी शामिल रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अरावली की परिभाषा और उसके संरक्षण की सीमा को लेकर लगातार विवाद बना हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय ने 20 नवंबर 2025 के अपने निर्णय में “अरावली पर्वतमाला की परिभाषा तथा दिल्ली, हरियाणा, गुजरात और राजस्थान में उसके समुचित संरक्षण” को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और पर्यावरणीय प्रश्न माना।
न्यायालय ने इस उद्देश्य से गठित समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया, जिसमें अरावली पर्वतमाला की एक परिभाषा निर्धारित की गई थी। बाद में न्यायालय ने यह भी अभिलिखित किया कि यही परिभाषा उस अनुशंसा का मुख्य आधार बनी, जिसके अनुसार नव-निर्धारित अरावली क्षेत्र में नई खनन पट्टियाँ प्रदान न की जाएँ। किंतु इसके बाद 29 दिसंबर 2025 के आदेश में न्यायालय ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि परिभाषाओं का सावधानीपूर्वक परीक्षण न किया जाए, तो वे अस्पष्टता और अनपेक्षित परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं। न्यायालय ने यह माना कि किसी गलत या अधूरी परिभाषा के कारण ऐसे नियामकीय शून्य उत्पन्न हो सकते हैं, जो अरावली की पारिस्थितिक अखंडता को कमजोर कर दें।
इसी कारण न्यायालय ने यह आवश्यक माना कि समिति की रिपोर्ट लागू करने से पहले निष्पक्ष, स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय प्राप्त की जाए तथा सभी आवश्यक हितधारकों को इस प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाए। न्यायालय के अनुसार यह कदम केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उन महत्वपूर्ण अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए अनिवार्य है, जो भविष्य में बड़े पर्यावरणीय और संवैधानिक परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं।
इस संदर्भ में प्रस्तुत सिमुलेशन का उद्देश्य किसी खनन परियोजना, विशेष स्थल या वास्तविक मानचित्र का मूल्यांकन करना नहीं है। यह पर्यावरण प्रभाव आकलन भी नहीं है। इसका उद्देश्य केवल यह स्पष्ट करना है कि विभिन्न कानूनी परिभाषाएँ किस प्रकार भू-भागों को शामिल या बाहर कर सकती हैं, और इस प्रकार वे किस प्रकार भविष्य में उन क्षेत्रों को विघटन, हस्तक्षेप या विनाशकारी प्रक्रियाओं के जोखिम के सामने ला सकती हैं।
यह सिमुलेशन किसी भू-भाग को हानि पहुँचाने की संवैधानिक वैधता का निर्णय नहीं करता, बल्कि यह दिखाता है कि कानूनी परिभाषाएँ स्वयं किस प्रकार किसी क्षेत्र को संभावित खतरे के दायरे में ला सकती हैं। यही कारण है कि यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या किसी भू-भाग को पारिस्थितिक दृष्टि से “त्याज्य” माना जा सकता है। यह प्रश्न केवल पर्यावरणीय नीति का नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 48A, एहतियाती सिद्धांत, अंतरपीढ़ी समानता और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत से जुड़ा हुआ संवैधानिक प्रश्न है।
अरावली का प्रश्न केवल पहाड़ों या खनिजों का प्रश्न नहीं है। यह उस मूल दृष्टिकोण का प्रश्न है, जिसके आधार पर समाज यह तय करता है कि प्रकृति को केवल संसाधन मानकर उपयोग किया जाएगा या उसे जीवन, संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों के रूप में भी देखा जाएगा।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली पर्वतमाला को उत्तर-पश्चिम भारत की पारिस्थितिक एवं सामाजिक-आर्थिक जीवनरेखा माना है। न्यायालय के अनुसार अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि वह प्राकृतिक अवरोध है जो उत्तर-पश्चिम के शुष्क मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच संतुलन बनाए रखता है। इसे “उत्तर-पश्चिम भारत के हरित फेफड़े” के रूप में भी देखा गया है, जिसने सदियों से विविध पारिस्थितिक तंत्रों को संरक्षित रखा है और अनेक समुदायों की आजीविका का आधार बना हुआ है।
अरावली की प्राचीन भू - वैज्ञानिक संरचना इसे खनिज संपदा से समृद्ध बनाती है, किंतु यही विशेषता लंबे समय से इसे अनियंत्रित शोषण के खतरे के सामने भी खड़ा करती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में यह उल्लेख किया है कि अनियंत्रित शहरीकरण, निरंतर वनों की कटाई और संसाधनों के अत्यधिक शोषण ने इस स्वभावतः नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर दबाव डाला है। यही कारण है कि, वर्ष 1991 से न्यायालय अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों और पर्यावरणीय संरक्षण से जुड़े मामलों पर लगातार विचार करता रहा है।
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*लेखक - जलपुरुष राजेंद्र सिंह*
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*दिनांक - 14 मई 2026*
More Information call- 9009739338 (PARAS)
09/05/2026
ंकट से जूझ रहे करौली क्षेत्र में राहल वाली पोखर और ढाबाडे की पोखर का शुभ मुहूर्त ग्रामीणों और तभासं कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया।
इन पोखरों का निर्माण वर्षा जल संचयन हेतु Tarun Bharat Sangh द्वारा HCLFoundation के सहयोग से किया जा रहा है।
जल संरक्षण की दिशा में हमारे प्रयास सामुदायिक प्रयास लगातार जारी है।
06/05/2026
जल आंकाक्षी क्षेत्र धौलपुर में जल संरक्षण कार्य लगातार जारी है। अभी Tarun Bharat Sangh द्वारा LIC Housing Finance Limited के सहयोग से "घाट के तालाब" का निर्माण कार्य चल रहा है।
इस #तालाब के बन जाने से आस-पास की जैवविविधता संपन्न होगी और भूजल पुनर्भरण भी बड़ी मात्रा में होगा।
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