Humara Aligarh
Via Aligarh Diaries【अलीगढ़ डायरीज】
🛑 #सावधान- #पत्रकारिता या "डिजिटल लूट" का नया स्टार्टअप?
#अलीगढ़ और आस-पास की तहसीलों में पिछले 2-4 साल में कुकुरमुत्तों की तरह 'फलाना-ढिमका न्यूज़' चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। गली-कूचों से अचानक प्रकट होने वाले ये "स्वयंभू पत्रकार" हाथ में माइक और गले में आईडी कार्ड डालकर खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, बल्कि इलाके का 'छोटा डॉन' समझने लगे हैं।
इनकी योग्यता शून्य, तेवर फुल, जिनके पास न शब्दों की मर्यादा है और न ही #पत्रकारिता की नैतिकता, वे कैमरे का इस्तेमाल सच दिखाने के लिए नहीं, बल्कि किसी संपन्न #व्यापारी या दुकानदार की "कमियां" ढूंढकर उसे ब्लैकमेल करने के लिए कर रहे हैं। और थाने चौकियों में भी घुस रहे हैं खबर के नाम पर
#बेरोजगारी चरम पर है, यह सच है। लेकिन बेरोजगारी का मतलब यह कतई नहीं है कि आप ब्लैकमेलर बन जाएं। अपना पेट भरने के लिए दूसरों की मेहनत की कमाई पर डाका डालना पत्रकारिता नहीं, गिद्ध-वृत्ति है।
सुनो मेरे "फर्जी कैमराजीवी" भाइयों, गले में प्रेस का कार्ड और 100रु का माइक लटकाने से कोई पत्रकार नहीं बन जाता। अगर जेब खाली है, तो मेहनत का कोई काम ढूंढ लो। समाज में तुम्हारी हैसियत एक 'सफेदपोश भिखारी' से ज्यादा कभी नहीं होगी।
कैमरा सच का आईना होता है, उसे अपनी गंदगी और लालच का जरिया मत बनाओ। जिस दिन #कानून का डंडा और जनता का सब्र एक साथ टूटेगा, उस दिन न तुम्हारा 'माइक' काम आएगा और न ही यह 'फर्जी रसूख'।
सम्मान कमाया जाता है, छीनकर या डराकर नहीं लिया जाता।
व्यापारी भाइयों से निवेदन है ऐसे "फलाना-ढिमका" न्यूज वालों से डरने की जरूरत नहीं है। जैसे ही कोई फर्जी कार्ड दिखाकर डराने की कोशिश करे, सीधा स्थानीय थाने में सूचना दें या उनकी ही वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दें।
क्या आप भी ऐसे किसी न्यूज चैनल के बारे में जानते हैं, कमेंट करें🎤
07/04/2026
2 दिन पहले Dhurandhar 2 देखी और फिल्म का ये सीन सच में दिल को छू लेने वाला है — इतना रियल लगता है जैसे अपने ही घर का कोई पल हो। जो लोग 80s या 90s में lower ya middle-class परिवार में बड़े हुए हैं, खासकर जिनके पिता सख्त स्वभाव के थे, वो इस एहसास को तुरंत समझ जाएंगे। वो शांत सा बॉडी लैंग्वेज, हल्की सी मुस्कान को रोकने की कोशिश और हर हरकत में दिखता संयम बहुत कुछ कह जाता है। 16–21 साल के लड़के, जो दोस्तों के बीच बेहद शरारती और मस्तमौला होते हैं, वही अपने पिता के सामने अचानक संभल जाते थे, थोड़ा सिमट जाते थे और खुद पर एक अनकहा कंट्रोल लगा लेते थे। पिता के सामने बैठने का तरीका बदल जाता था, बेवजह हँसना या ज्यादा बोलना avoid करते थे, हर बात सोच-समझकर कहते थे ताकि डांट न पड़े। अंदर से चाहे जितनी मस्ती हो, बाहर से एकदम serious बन जाना और उस respect के साथ हल्का सा डर — ये सब उस दौर की खास पहचान थी। ये सिर्फ एक सीन नहीं है, बल्कि पूरी एक generation की feeling है, जहां discipline और डर के बीच भी एक गहरा प्यार छुपा होता था ❤️
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