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14/02/2026
स्टोरी हाइलाइट्स-
ज़िम्बाब्वे में एक डकैती के दौरान, चोर ने बैंक में मौजूद सभी लोगों से चिल्लाकर कहा:
🥺🥺🥺
“हिलो मत! पैसा सरकार का है – तुम्हारी जान तुम्हारी है।”
बैंक में मौजूद सभी लोग चुपचाप लेट गए।
इसे कहते हैं “सोचने का तरीका बदलना” – पारंपरिक मानसिकता को बदलना।
जब एक महिला मेज पर उत्तेजक मुद्रा में लेट गई, तो चोर चिल्लाया:😖😫
“कृपया सभ्य बनो! यह डकैती है, बलात्कार नहीं!”
इसे कहते हैं “पेशेवर होना।” केवल उसी काम पर ध्यान केंद्रित करो जिसके लिए तुम्हें प्रशिक्षित किया गया है!
जब लुटेरे घर लौटे, तो छोटे चोर (जिसके पास एमबीए की डिग्री थी) ने बड़े चोर (जिसने केवल छठी कक्षा तक पढ़ाई की थी) से कहा:
“बड़े भाई, चलो गिनते हैं कि हमें कितना मिला।”
बूढ़े चोर ने जवाब दिया:
“तुम कितने बेवकूफ हो! इतना सारा पैसा है—गिनने में तो बहुत समय लग जाएगा। आज रात टीवी पर खबर आ जाएगी कि हमने कितना चुराया है।”
इसे कहते हैं “अनुभव।” आजकल अनुभव शैक्षणिक योग्यताओं से कहीं अधिक मूल्यवान है!
लुटेरे के जाने के बाद, बैंक मैनेजर ने सुपरवाइजर को जल्दी से पुलिस को बुलाने को कहा। लेकिन सुपरवाइजर ने कहा:
“रुको! चलो बैंक से 10 मिलियन डॉलर खुद निकाल लेते हैं और इसे उन 70 मिलियन डॉलर में जोड़ देते हैं जो हम पहले ही गबन कर चुके हैं।”
😖😖😖😖😖😖
इसे कहते हैं “हालात के साथ चलना।” प्रतिकूल स्थिति को लाभ में बदलना!
फिर सुपरवाइजर ने कहा:
“कितना अच्छा होता अगर हर महीने एक डकैती होती।”
इसे कहते हैं “ऊब मिटाना।” व्यक्तिगत खुशी काम से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
अगले दिन खबर आई कि बैंक से 10 करोड़ डॉलर चोरी हो गए हैं।
लुटेरों ने खूब गिनती की, लेकिन उन्हें सिर्फ 2 करोड़ डॉलर ही मिले।
गुस्से में आकर उन्होंने शिकायत की:
“हमने अपनी जान जोखिम में डाली और हमें सिर्फ 2 करोड़ डॉलर मिले। बैंक मैनेजर ने तो पलक झपकते ही 8 करोड़ डॉलर ले लिए! लगता है चोर बनने से बेहतर है शिक्षित होना।”
इसे कहते हैं “ज्ञान सोने के बराबर कीमती है।”
इसी बीच, बैंक मैनेजर मुस्कुराया, राहत महसूस करते हुए कि शेयर बाजार में हुए उसके नुकसान की भरपाई अब चोरी से हो गई है।
इसे कहते हैं “मौके का फायदा उठाना।” जोखिम उठाने की हिम्मत रखनी चाहिए क्योंकि इसी में जीवन का आनंद है।
😄😄😄😄😄😅🤣😅😂😅🤣😂😂😂
04/02/2026
#एपिस्टीन फाइल्स से एक बात तो साफ़ हो जाती है — दौलत अगर इंसानियत से बड़ी हो जाए, तो इंसान हैवान बन जाता है।
शायद इसलिए कहा गया है
अमीर बनने की नहीं,
इंसान बने रहने की दुआ माँगो।
ये वो लोग हैं जो मासूम बच्चियों की तस्करी करते व उनके साथ लगातार बलात्कार करते थे तथा हैवानियत कि हद पार कर के उन मासूम बच्चियों को जानवरों की तरह मार कर उनके मांस को पका कर खाते थे।
अगर ये लोग इस दुनिया में बच भी गए,
तो याद रखो इंसाफ़ की एक अदालत कुदरत अभी बाकी है। ⚖️
04/02/2026
कुछ अनकहे किस्से -
मेजर सुधीर कुमार वालिया, जिन्हें भारतीय सेना में सम्मान और गर्व के साथ “भारतीय सेना का रैम्बो” कहा जाता है, एक ऐसे योद्धा थे जिनकी बहादुरी और बलिदान की कहानियां आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं।
वे 9 पैरा SF के अधिकारी थे और उनकी असाधारण वीरता ने उन्हें अशोक चक्र (मरणोपरांत) और सेना मेडल (2 बार) जैसे सर्वोच्च सैन्य सम्मान दिलाए।
वर्ष 1993 में जम्मू कश्मीर के राजौरी जिले के कांडी गांव में एक बेहद खतरनाक सैन्य अभियान के दौरान उन्होंने 3 आतं कियों को मार गिराया। यह इलाका घना और अत्यंत दुर्गम था, जहां हर कदम जानलेवा खतरे से भरा हुआ था। वहां उन्होंने अपनी मजबूत कमान, अद्भुत साहस और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण से इस अभियान को पूरी तरह सफल बनाया। इसी वीरता के लिए उन्हें सेना मेडल (वीरता) से सम्मानित (1994) किया गया।
इसी वर्ष सितंबर 1993 में उन्होंने किश्तवाड़ क्षेत्र की ब्रह्मा पर्वत श्रृंखला में स्थित ब्रह्मा द्वितीय चोटी के कठिन पर्वत अभियान में भाग लिया। अत्यधिक ऊंचाई, बर्फीली हवाएं, कड़ाके की ठंड और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद यह अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया गया। इस असाधारण साहसिक उपलब्धि के लिए उन्हें दूसरा सेना मेडल (1993, बार) प्रदान किया गया।
इसके बाद आया 1999 का कारगिल युद्ध। उस समय मेजर सुधीर कुमार वालिया, तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल वी. पी. मलिक के सहायक अधिकारी के रूप में तैनात थे। लेकिन जैसे ही विजय अभियान आरंभ हुआ, उन्होंने स्वेच्छा से यह पद छोड़कर अपनी मूल इकाई 9 पैरा SF में वापस जाने का निर्णय लिया। जब देश को जरूरत थी, उन्होंने आराम और सुरक्षा को ठुकरा दिया।
बटालिक क्षेत्र में उन्होंने कई अत्यंत जोखिम भरे अभियानों का नेतृत्व किया। दुश्मन की ऊंची चोटियों पर चढ़कर, सीधे टकराव में उन्होंने निर्णायक हमले किए। जुलू स्पर जैसी महत्वपूर्ण चौकियों पर उनकी टीम ने पीछे से घुसकर दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया।
उनकी टीम द्वारा 100 से अधिक दुश्मनों को मार गिराया।
कारगिल में विजय के ठीक 1 महीने बाद, 29 अगस्त 1999 को, वे कुपवाड़ा जिले के हाफरूडा जंगल में एक खोज और विनाश अभियान पर निकले। सुबह लगभग 8:30 बजे, केवल 5 कमांडो की एक छोटी टुकड़ी के साथ वे घने जंगल में आगे बढ़े। अचानक वहां 20 से अधिक भारी हथियारों से लैस आतंकियों की मौजूदगी सामने आई।
मेजर सुधीर ने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़ते हुए अकेले ही 2 से 4 मीटर की दूरी से 4 आतंकियों को मार गिराया। भीषण गोलीबारी के दौरान उनके चेहरे, छाती और हाथ में गंभीर गोलियां लगीं, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया।
घायल अवस्था में जमीन पर लेटे हुए भी वे लगातार अपनी टीम को आदेश देते रहे—
“जब तक सारे आतंकी खत्म न हो जाएं, रुकना मत!”
यह अभियान पूरी तरह सफल रहा। कुल 9 आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें से 4 आतंकियों को मेजर सुधीर कुमार वालिया ने स्वयं ढेर किया। अभियान समाप्त होने के बाद भी वे करीब 35 मिनट तक उपचार के लिए ले जाने को तैयार नहीं हुए। अंततः रास्ते में ही उन्होंने वीरगति प्राप्त की, लेकिन दुश्मन का पूरी तरह सफाया सुनिश्चित करके।
आज भी 9 पैरा SF और भारतीय सेना में घातक पलटन का नाम लेते ही मेजर सुधीर कुमार वालिया की छवि सामने आ जाती है। दुश्मन का अंत, बिना रुके, बिना डरे, आखिरी सांस तक लड़ते रहना यही उनकी पहचान थी। ऐसे योद्धा सच में सदियों में एक बार जन्म लेते हैं, जो केवल युद्ध नहीं लड़ते, बल्कि अपने बलिदान से इतिहास रचते हैं।
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04/01/2026
आजमगढ़ :- कॉन्स्टेबल रंजीत कुमार मौर्य दिन की ड्यूटी से हारे थके हुए आए और अंगीठी जलाकर सो गए।
सुबह जब ड्यूटी प्वाइंट पर समय से नहीं पहुंचे तो साथी ड्यूटीरत सिपाहियों ने रंजीत कुमार को फोन लगाया लेकिन कोई रेस्पॉन्स न मिलने के कारण उन्हें तलाश किया गया।
जब उनके किराए के कमरे पर पहुंचे तो कांस्टेबल रंजीत कुमार अपने बिस्तर पर मृत अवस्था में मिले और मुंह से झाग निकलते हुए दिखाई दिए ।
जांच में मालूम हुआ कि रात्रि में अंगीठी के इस्तेमाल से कांस्टेबल की मौत हुई हैं , कांस्टेबल रंजीत कुमार 2018 बैच के सिपाही थे ,जो मूल रूप से बलिया जिले के निवासी थे।
जरूरी चेतावनी 🚫🤚 घर में रूम हीटर या अंगीठी का इस्तेमाल केवल वेंटिलेशन वाले रूम में ही करे, क्योंकि अंगीठी से निकलने वाली जहरीली गैस कार्बन मोनो ऑक्साइड कमरे की ऑक्सीजन को खत्म कर देती हैं और सोने वाले व्यक्ति की मौत हो जाती हैं।
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