Azhar Sabri
हम कलम की धार में इक वार रखते हैं।
सामने दुश्मन हो तो तलवार रखते हैं।
मंज़िलों को आँख में दिन-रात रखते हैं,
हौसलों में इक नई रफ़्तार रखते हैं।
मुल्क की ख़ातिर जिएँगे, ये यक़ीं कर लो,
अपने सीने में वतन का प्यार रखते हैं।
झुक के जीना तो हमें आता नहीं हरगिज़,
सामने ज़ुल्मत के हम इंकार रखते हैं।
भीड़ में भी अपनी राहों का हुनर रखते हैं,
अपनी आँखों में नया संसार रखते हैं।
तल्ख़ियों से डर के हम पीछे नहीं हटते,
लब पे हंसी दिल में हम अँगार रखते हैं।
हार की आहट से हम घबराए ही कब हैं,
ज़ख़्म खाकर भी नया किरदार रखते हैं।
वक़्त के तूफ़ाँ से हम डरते नहीं हरगिज़,
जीतने का हौसला हर बार रखते हैं।
~ Azhar Sabri ~
ज़मीं पर चाँद का टुकड़ा सजा कर देख लेते हैं।
अँधेरी रात में ख़ुद को जला कर देख लेते हैं।
मुसाफ़िर हैं सितारे भी, सफ़र जारी है सदियों से,
किसी के नूर में ख़ुद को मिला कर देख लेते हैं।
दिखाई जो न दे आँखों को, वो मंज़र मुकम्मल है,
उसी की रौशनी दिल में बसा कर देख लेते हैं।
हवाएँ ज़िक्र करती हैं कभी जो उसकी महफ़िल का,
वहाँ की धूल को माथे लगा कर देख लेते हैं।
कभी तो साज़िशें होंगी, कभी तो रौशनी होगी,
किसी दिन चाँद को घर में बुला कर देख लेते हैं।
भटकना ही अगर क़िस्मत है इस वीरान दुनिया में,
किसी दीवार को दर सा बना कर देख लेते हैं।
मोहब्बत में ज़रूरी तो नहीं हर बात हो पूरी,
चलो कुछ ख़्वाब आँखों में सजा कर देख लेते हैं।
लिखी क्या है हथेली पर, ये किसने ठीक से जाना,
चलो तक़दीर से आगे भी जा कर देख लेते हैं।
मुकद्दर का लिखा क्या है, किसे मालूम है आखिर,
कि अब हर एक लम्हा मुस्कुरा कर देख लेते हैं।
बहुत रो लीं ये आँखें अब, अँधेरा और क्या देगा,
कोई बुझता हुआ सपना बचा कर देख लेते हैं।
वो अपने फ़ैसलों में है, हम अपनी ज़िद पे क़ायम हैं,
चलो ख़ामोश रह कर भी मना कर देख लेते हैं।
जो दरिया डूबने वालों को साहिल तक नहीं लाया,
उसी दरिया में इक कश्ती बहा कर देख लेते हैं।
सभी ने आईनों में अपनी सूरत ढूँढ़ रखी है,
किसी टूटे हुए दिल में समा कर देख लेते हैं।
हमें मालूम है मिलना नहीं आसान अब 'अज़हर',
मगर हर मोड़ पर आँखें बिछा कर देख लेते हैं।
~ Azhar Sabri ~
हुकूमत ने वफ़ा की हर निशानी बेच डाली है।
नए दौर-ए-सियासत ने कहानी बेच डाली है।
कभी जो घर की छत थी, आसमाँ तक जो सहारा थी,
उसी ने अब तो हर इक मेहरबानी बेच डाली है।
नज़र कुर्सी पे इतनी थी कि चेहरा खो दिया उसने,
हक़ीक़त के उजालों की रवानी बेच डाली है।
उम्मीदों के नगर में अब उजाला भी थका सा है,
सियासत के बाज़ारों ने जवानी बेच डाली है।
न डर बाकी रहा है अब, ना ही अंजाम की परवाह,
मोहब्बत तक सियासत ने निशानी बेच डाली है।
तमाशा हम बने बैठे, वो किरदारों के मालिक हैं,
सियासत के इशारों में ज़ुबानी बेच डाली है।
जो वादे थे, जो सपने थे, हवाओं में बिखरते थे,
हक़ीक़त के बदन की हर रवानी बेच डाली है।
भरोसा टूटता जाता है अब हर एक साये से,
कि इस बाज़ार ने हर शय फ़ानी बेच डाली है।
वो कुर्सी के नशे में इस कदर से चूर बैठे हैं,
कि बेबस मुफ़्लिसों की भी कहानी बेच डाली है।
~ Azhar Sabri ~
Click here to claim your Sponsored Listing.
Contact the business
Address
Gaya