Sushil Shekhar
06/22/2026
लखनऊ अग्निकांड एक बार फिर कई सवाल खड़े कर गया है।
चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, आम लोगों की जान शायद सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह गई है। हर बड़ी दुर्घटना के बाद जांच, बयान और आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन क्या वास्तव में कोई सबक लिया जाता है?
हर बार वही लापरवाही, वही व्यवस्थागत खामियां, और फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। आखिर कब तक निर्दोष लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे? कब तक हादसों के बाद सिर्फ संवेदनाएं और मुआवज़े बांटे जाते रहेंगे?
जरूरत सिर्फ दोषियों को ढूंढने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस और जवाबदेह व्यवस्था बनाने की है। पता नहीं यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा, लेकिन हर खोई हुई जान हम सबकी सामूहिक विफलता की याद दिलाती है।
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