Shayerii

Shayerii

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11/25/2023

अपने एहसास से छू कर मुझे संदल कर दो
मैं कि सदियों से अधूरा हूँ मुकम्मल कर दो..

न तुम्हें होश रहे और न मुझे होश रहे
इस क़दर टूट के चाहो मुझे पागल कर दो..

तुम हथेली को मिरे प्यार की मेहंदी से रंगो
अपनी आँखों में मिरे नाम का काजल कर दो..

इस के साए में मिरे ख़्वाब दहक उट्ठेंगे
मेरे चेहरे पे चमकता हुआ आँचल कर दो..

धूप ही धूप हूँ मैं टूट के बरसो मुझ पर
इस क़दर बरसो मिरी रूह में जल-थल कर दो..!!

"वसी शाह"

06/25/2023

ठुकराओ अब कि प्यार करो मैं नशे में हूँ,
जो चाहो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ.

अब भी दिला रहा हूँ यक़ीन-ए-वफ़ा मगर,
मेरा न ए'तिबार करो मैं नशे में हूँ.

अब तुम को इख़्तियार है ऐ अहल-ए-कारवाँ,
जो राह इख़्तियार करो मैं नशे में हूँ.

गिरने दो तुम मुझे मिरा साग़र संभाल लो,
इतना तो मेरे यार करो मैं नशे में हूँ.

अपनी जिसे नहीं उसे 'शाहिद' की क्या ख़बर,
तुम उस का इंतिज़ार करो मैं नशे में हूँ.

Shahid Kabir

10/19/2022

उर्दू शायरी की तारीख़(इतिहास) में बहुत से ऐसे अशआर हैं कि जिन का एक मिसरा(पंक्ती) इतना मशहूर हुआ कि उनका दूसरा मिसरा जानने की कभी ज़रूरत
ही महसूस ही नहीं हुई।
लीजिए अब मुकम्मल शेर आपकी ख़िदमत में पेश हैं।

हम तालिबे शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम
"बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा"
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ख़त उनका बहुत ख़ूब इबारत बहुत अच्छी
"अल्लाह करे ज़ोरे क़लम और ज़्यादा"
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नज़ाकत बन नहीं सकती हसीनों के बनाने से
"ख़ुदा जब हुस्न देता है नज़ाकत आ ही जाती है"
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ये राज़ तो कोई राज़ नहीं,सब ऐहले गुलिस्तां जानते हैं
"हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा"
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"मैं किस के हाथ पे अपना लहू तलाश करूं"
तमाम शहर ने पहने हुए हैं दस्ताने
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हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
"दिल को ख़ुश रखने को'ग़ालिब' ये ख़्याल अच्छा है"
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क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो
"ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो"
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ग़म व ग़ुस्सा,रंज व अंदोह व हिरमां
"हमारे भी हैं मेहरबां कैसे कैसे"
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मरीज़े इश्क पे रहमत ख़ुदा की
"मर्ज़ बढ़ता गया जूं जूं दवा की"
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आख़िरे गिल अपनी सरफे मैकदा हुई
"पहुंची वहीं पे ख़ाक जहां का ख़मीर था"
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बहुत जी ख़ुश हुआ 'हाली' से मिल कर
"अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जहां में"
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ना जाना कि दुनिया से जाता है कोई
"बड़ी देर की मेहरबां आते आते"
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ना गोरे सिकंदर ना है क़ब्रे दारा
"मिटे नामियों के निशां कैसे कैसे"
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ग़ैरों से कहा तुमने,ग़ैरों से सुना तुमने
"कुछ हमसे कहा होता कुछ हमसे सुना होता"
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ज़़ज्बे शौक सलामत है तो इंशाअल्लाह
"कच्चे धागे में चले आयेंगे सरकार बंधे"
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क़रीब है यारो रोज़े महशर,छुपेगा कुश़तों का ख़ून क्यों कर
"जो चुप रहेगी ज़बाने ख़ंजर लहू पुकारे गा आस्तीं का"
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फूल तो दो दिन बहारे जां फिज़ां दिखला गये
"हसरत उन ग़ुचों पे है जो बिन खिले मुरझा गए"
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की मेरे क़त्ल के बाद उसने जफा से तौबा
"हाय उस ज़ूदे पशेमां का पशेमां होना"
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ख़ूब पर्दा है चिलमन से लगे बैठें हैं
"साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं"
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"इस सादगी पे कौन ना मर जाए ऐ ख़ुदा"
लड़ते भी हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
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चल साथ कि हसरत दिले मरहूम से निकले
"आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले"
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पेशकश:- अहसन क़िदवाई

10/05/2022

ग़म इस कदर बढे कि मैं घबरा के पी गया,
इस दिल की बेबसी पे तरस खा के पी गया.

ठुकरा रहा था मुझ को बड़ी देर से जहाँ,
मैं आज इस जहाँ को ठुकरा के पी गया.

-साहिर लुध्यानवी

08/21/2022

कुछ इतना ख़ौफ़ का मारा हुआ भी प्यार न हो ,
वो ए'तिबार दिलाए और ए'तिबार न हो .

हवा ख़िलाफ़ हो मौजों पे इख़्तियार न हो ,
ये कैसी ज़िद है कि दरिया किसी से पार न हो .

वसीम साहेब

08/19/2022

शहर क्या देखें कि हर मंजर में जाले पड़ गए,
ऐसी गर्मी है कि पीले फूल काले पड़ गए.

मैं अंधेरों से बचा लाया था अपने आप को ,
मेरा दुख ये है कि मेरे पीछे उजाले पड़ गए.

जिन जमीनों के कबीले हैं मेरे पुरखों के नाम,
उन जमीनों पर मेरे जीने के लाले पड़ गए.

ताक़ में बैठा हुआ बूढ़ा कबूतर रो दिया,
जिस में डेरा था उसी मस्जिद में ताले पड़ गए.

कोई वारिस हो तो आए और आकर देख ले,
जिल्ले-सुब्हानी की ऊंची छत में जाले पड़ गए.

राहत इंदौरी साहेब

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