Parindey Wo Pyar Ke

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09/05/2026

=== भाग 9 ===
खिडकी के रेशमी परदों के बारीक छेदों से छनकर आती सुबह की वह कोमल और सुनहरी धूप सीधे डाक्टर कबीर शेखावत की थकी हुई आखों पर पड रही थी। कबीर ने अपनी भारी पलकें झपकाईं और अनजाने में ही करवट बदल ली। वह नींद और जागने के बीच के उस धुंधले दायरे में था, जहा हकीकत और सपने एक दूसरे में समा जाते हैं। कमरे की हवा में मद्धम सी खुशबू थी—शायद वह चमेली के इत्र और रात की बची हुई नमी का एक मिला-जुला अहसास था। उसने अपने बगल में देखा, जहा आरव मलहोत्रा अभी भी गहरी और स्वप्नहीन नींद की आगोश में समाया हुआ था। आरव का चेहरा इस वक्त अविश्वसनीय रूप से शातं और मासूम लग रहा था। कबीर की नजरें आरव के चेहरे की बनावट पर टिक गईं। आरव की मजबूत जालाइन, उसकी लंबी पलकें जो गालों पर साया बना रही थीं, और उसके गले का वह आदम्स एप्पल जो उसकी धीमी सासों के साथ बहुत ही कोमलता से ऊपर-नीचे हो रहा था। कबीर को महसूस हुआ कि उसके अपने हाथ अनजाने में आरव की ओर बढ रहे हैं। उसने अपनी उंगलियों से आरव के माथे पर बिखरे हुए उन काले रेशमी बालों को धीरे से पीछे हटाया। यह स्पर्श केवल शारीरिक नहीं था, इसमें एक रूहानी जुडाव था। कबीर, जो बरसों तक जज्बातों को एक डाक्टरी फाइल की तरह बंद करके रखता था, आज खुद को इस नए अहसास के सामने पूरी तरह नंगा और कमजोर महसूस कर रहा था। उसकी सासों की वह बहुत ही धीमी, लयबद्ध धडकन... कबीर उसे अब बिना किसी आधुनिक मशीन, बिना किसी सिंक-हार्ट डिवाइस के अपनी बंद आखों से भी महसूस कर सकता था। यह वही सुकून था जिसकी तलाश में कबीर ने अपनी आधी जिदगी जयपुर की उन सख््त गलियों और मबंई के इन ठंडे अस्पताल के कमरों में गुजार दी थी। जयपुर में उसके पिता का वह आलीशान और सख््त घर, जहा हर काम अनुशासन और खानदानी मान-मर्यादा के तराजू पर तोला जाता था, वहा कबीर ने कभी भी अपनी इस पहचान को जाहिर नहीं होने दिया था। वह हमेशा खुद से झूठ बोलता रहा कि वह सिर्फ एक डाक्टर है, एक मशीन है जिसका काम केवल दिल की मरम्मत करना है। लेकिन आज, आरव के इस शांत चेहरे को देखते हुए, वह पहचान का द्वंद्व पूरी तरह खत्म हो चुका था। वह जानता था कि वह एक पुरुष से प्यार करता है, और यह सच अब उसके अस्तित्व का हिस्सा बन चुका था। यह एक ऐसा रूहानी सुकून था जो उसे सालों की अपार कामयाबी, दौलत और शोहरत हासिल करने के बाद भी कभी नसीब नहीं हुआ था। लेकिन इस मखमली शाति के पीछे एक बहुत ही भयानक तूफान का शोर छिपा था, जिसे कबीर अपने मन के किसी गहरे और अधेरे कोने में बिल्कुल साफ सुन सकता था। कबीर ने बहुत ही कोमलता से अपना हाथ आरव के गोरे गाल के पास रखा, लेकिन उसे वास्तव में छूने से ठीक पहले ही अपने हाथ को हवा में रोक लिया। डर। एक अनुभवी कार्डियोलाजिस्ट होने के नाते वह बहुत अच्छी तरह जानता था कि डर भी इंसान के दिल की धडकनों को किस कदर बेतरतीब और हिंसक तरीके से बदल देता है। और आज, कबीर का अपना दिल बुरी तरह डर रहा था। भारतीय समाज में जहां दो पुरुषों के बीच के इस खिचाव को आज भी एक बीमारी या गुनाह की नजर से देखा जाता है, वहा कबीर का यह सच उसे तबाह कर सकता था। उन्होंने पिछली रात यह दृढ फैसला तो कर लिया था कि वे इस अनकहे रिश्ते को, इस रूहानी अहसास को एक सामाजिक नाम देंगे, एक वास्तविक मौका देंगे। लेकिन इस आलीशान बंद कमरे की सुरक्षित दीवारों के बाहर कडुवी हकीकत खडी थी, जो बाहें फैलाए उनके धैर्य और उनके प्यार का सबसे कठिन इम्तिहान लेने के लिए तैयार थी। कबीर ने बहुत ही अनिच्छा से अपना बिस्तर छोड दिया। उसने अपनी कलाई की नसों को देखा, जो थकान और तनाव से उभरी हुई थीं। जब वह नहा-धोकर और पूरी तरह तैयार होकर अस्पताल जाने के लिए कमरे से बाहर निकल रहा था, तब आरव की नींद खुल चुकी थी। आरव ने अपनी आधी खुली नींद भरी आखों से कबीर को देखा। आरव के चेहरे पर वह मासूमियत और कबीर के प्रति वह गहरा आकर्षण साफ झलक रहा था। आरव के होठों पर एक बहुत ही हल्की सी, कोमल मुस्कान तैर गई। उस मुस्कान में एक ऐसा अटूट भरोसा और मासूमियत थी, जो कबीर के जकडे हुए कधों पर रखे हुए भारी मानसिक बोझ को कुछ पलों के लिए बहुत हल्का कर गई। कबीर ने आगे झुककर आरव के ठंडे माथे को बहुत प्यार से चूमा। आरव की त्वचा की वह ठंडक कबीर के होठों को छू गई और एक बार फिर उस 'मेल गेज' का अहसास गहरा हो गया। कबीर ने आरव के चौडे कधों और उसकी नाजुक बनावट को महसूस किया। बिना एक भी शब्द कहे कबीर वहा से निकल गया। उस वक्त उन्हें किसी भी तरह के शब्दों या वाक्यों की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही थी, क्योंकि अब उनकी खामोशियां भी एक-दूसरे की रूह से बातें करने लगी थीं। लेकिन सिटी अस्पताल का माहौल आज रोज की तरह सामान्य और पेशेवर बिल्कुल नहीं था। जैसे ही कबीर ने अपनी ओपीडी की तरफ अपने सधे हुए कदम बढाए, उसे तुरंत महसूस हुआ कि अस्पताल की ठंडी हवा में एक अजीब सा तनाव और रहस्यमयी भारीपन व्याप्त है। रिसेप्शन पर बैठी हुई वे नर्सें, जो अक्सर कबीर को देखते ही मुस्कुराती थीं और सम्मान में सिर झुकाती थीं, आज उन्होंने कबीर को देखते ही अपनी नजरें चुरा लीं और कंप्यूटर की स्क्रीन में खोने का नाटक करने लगीं। अस्पताल के वार्ड बायज और अन्य कर्मचारी, जो कबीर को देखते ही 'गुड माॅर्निंग सर' कहते थे, आज छोटे-छोटे समूहों में खडे होकर आपस में कुछ खुसुर-फुसुर कर रहे थे। उनकी नजरों में एक अजीब सा शक और अपमान का भाव था। कबीर ने अपनी चाल की गति में कोई बदलाव नहीं किया। उसके मजबूत कधे और उसका ऊंचा सिर आज भी वही आत्मविश्वास दिखा रहे थे, लेकिन उसके अंदर का अनुभवी मन अब यह पूरी तरह अंदाजा हो गया था कि कोई बहुत बडा संकट खडा होने वाला है। गलियारे में चलते हुए उसे मशीनों की बीप भी आज किसी चेतावनी की तरह सुनाई दे रही थी। अपने व्यक्तिगत केबिन का भारी ओक का दरवाजा खोलते ही उसे अपनी साफ-सुथरी मेज पर एक धूल भरी पीली फाइल रखी हुई मिली। और उस फाइल के ठीक पीछे वाली घूमने वाली कुर्सी पर बडा ही इत्मीनान से बैठा था समीर। समीर के चेहरे पर आज वही पुरानी, जानी-पहचानी ईर्ष्या और नफरत की चमक थी। समीर और कबीर की दुश्मनी उस दिन से और भी ज्यादा गहरी हो गई थी जब समीर की बहन मीरा को कबीर नहीं बचा पाया था। लेकिन आज समीर के पास बदला लेने का एक ऐसा हथियार था जो कबीर के पेशेवर जीवन और उसकी निजी गरिमा दोनों को एक साथ काट सकता था। समीर ने उस पीली फाइल पर अपनी उंगली से एक लयबद्ध थपकी दी। वह आवाज पूरे शातं केबिन में किसी बम के धमाके की तरह गूंजती हुई महसूस हुई। कबीर ने अपना भारी कोट उतारा और उसे पास के हैंगर पर टांग दिया, फिर वह अपनी मेज की ओर बहुत ही शातं कदमों से बढा। कबीर ने समीर की आखों में सीधे और दृढता से झाका। समीर ने एक बहुत ही चुभते हुए व्यंग्य के साथ कहा कि डाक्टर शेखावत, मुझे तो सच में लगा था कि तुम आज की छुट्टी पर रहोगे और घर पर ही आराम करोगे। आखिरकार, आजकल तुम्हारी रातें बहुत ज्यादा रंगीन और रोमांचक जो हो रही हैं। समीर की आखों में वह चमक थी जो किसी शिकारी की आखों में अपने शिकार को जाल में फसा देखकर होती है। कबीर ने बिना अपना आपा खोए, बहुत ही सपाट और ठंडे लहजे में जवाब दिया कि समीर, मेरे निजी जीवन का इस अस्पताल की ड्यूटी या मेरे काम से कोई लेना-देना नहीं है। अगर तुम्हारे पास किसी मरीज की मेडिकल रिपोर्ट या किसी जरूरी केस के बारे में बात करने के लिए कुछ है तो ही यहा रुको, वरना बिना वक्त जाया किए मेरे केबिन से बाहर चले जाओ। समीर जोर से हसा। वह एक बहुत ही रूखी, सूखी और कडुवाहट से भरी हुई हंसी थी। वह अपनी जगह से खडा हुआ और उस पीली फाइल को बहुत ही धीरे से कबीर की तरफ मेज पर सरका दिया। समीर ने कहा कि कबीर, यह अब सिर्फ तुम्हारा निजी मामला नहीं रह गया है। यह डाक्टरी नैतिकता और प्रोफेशनल एथिक्स का एक बहुत ही गंभीर मामला बन चुका है। सिंक-हार्ट प्रोजेक्ट के उन गोपनीय प्रोटोकाल के उल्लंघन की यह एक आधिकारिक शिकायत है। कबीर ने फाइल खोली। उसके भीतर डिजिटल डेटा के ढेरों प्रिंटआउट्स थे। कबीर हैरान रह गया। उसने तो अपनी स्मार्टवाच और आरव ने अपना डिवाइस तोड दिया था, फिर यह डेटा कहा से आया? समीर ने कबीर के चेहरे के भावों को पढ लिया और कुटिलता से कहा कि कबीर, तुम्हें क्या लगा था कि सिर्फ हार्डवेयर तोड देने से सब खत्म हो जाएगा? तुम शायद यह भूल गए कि सिंक-हार्ट का सारा डेटा क्लाउड बैकअप और कैश फाइलों में भी स्टोर होता है। मैंने उन रिकवर्ड डेटा पैकेट्स को फिर से निकाला है। इसमें तुम्हारे और आरव के बीच हुए हर वॉयस नोट, हर धडकन के ग्राफ और हर लोकेशन का टाइमस्टैम्प है। समीर ने बहुत ही जहरीले अंदाज में कहा कि मैंने कल रात ही अस्पताल के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स को लिखित में सूचित कर दिया है कि तुमने एक मरीज के साथ, जो असल में तुम्हारा ही एक विशेष क्लाइंट था, पूरी तरह से अनैतिक और अनुचित संबंध बनाए हैं। कबीर ने देखा कि समीर झूठ बोल रहा है। समीर ने कहा कि तुम्हारे पास चौबीस घंटे हैं फैसला करने के लिए, लेकिन कबीर को महसूस हुआ कि समीर ने बोर्ड मीटिंग पहले ही बुला ली है और यह सिर्फ उसे मानसिक रूप से प्रताडित करने का एक तरीका है। समीर ने आगे कहा कि कबीर, तुम अपनी वरिष्ठ स्थिति और पद का गलत फायदा उठा रहे हो। तुमने हमारे प्रतिष्ठित समाज और इस विश्वस्तरीय अस्पताल की साख और प्रतिष्ठा को बहुत बडे खतरे में डाल दिया है। कबीर ने उस फाइल के पन्नों को पलटा। वहा आरव की धडकनों का वह ग्राफ था जो उस रात का था जब उसे कार्डियक अरेस्ट आया था। समीर ने उसे एक 'रोमांटिक एविडेंस' की तरह पेश किया था। कबीर ने समीर की ओर देखते हुए बहुत ही शाति से अपना तर्क रखा कि समीर, आरव मलहोत्रा तकनीकी रूप से मेरा वर्तमान मरीज नहीं है। वह सिंक-हार्ट ऐप का सिर्फ एक अनाम यूजर था। समीर ने कबीर की मेज पर दोनों हाथों से झुकते हुए बहुत ही जहरीले स्वर में कहा कि कबीर, तुम यह सफाई दुनिया को दे सकते हो, लेकिन अस्पताल बोर्ड को नहीं। और सबसे जरूरी बात, क्या तुमने अपने परिवार के बारे में सोचा है? तुम्हारे पिता जो जयपुर के इतने बडे ठाकुर और रूढिवादी मुखिया हैं, क्या वे यह अपमान बर्दाश्त कर पाएंगे? समीर की इस बात ने कबीर के सीने में एक गहरी चुभन पैदा कर दी। कबीर को अपने पिता की वह भारी आवाज याद आई जो कहती थी कि 'शेखावत खानदान का नाम कभी मिट्टी में नहीं मिलना चाहिए'। कबीर ने अपनी मुट्ठियां मेज के नीचे कसकर भींच लीं। कबीर ने पूछा कि समीर, तुम आखिर चाहते क्या हो? समीर ने मुडकर बहुत ही धीमे स्वर में कहा कि इस्तीफा, कबीर। मुझे तुम्हारा इस्तीफा चाहिए। या तो तुम खुद इस अस्पताल के सीएमओ बनने की दौड से बाहर हो जाओ और अपना ट्रांसफर किसी दूरदराज के क्लिनिक में ले लो, या फिर मैं तुम्हारी यह शिकायत और वे सारे सबूत बोर्ड की मीटिंग में पेश कर दूंगा। कबीर, तुम्हारे पास सिर्फ चौबीस घंटे का समय है। समीर वहा से चला गया, लेकिन उसका वह जहरीला प्रभाव कमरे में ही रह गया। कबीर को पता था कि समीर झूठ बोल रहा है, बोर्ड को शायद पहले ही खबर दी जा चुकी है। समीर सिर्फ उसे तडपाना चाहता था। कबीर अपनी कुर्सी पर बेजान सा ढह गया। उसने अपनी आखों को अपनी हथेलियों से ढक लिया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे केबिन की दीवारें उसे कुचल देंगी। उसे आरव की चिंता सताने लगी। आरव जो पहले से ही भीड और समाज से डरता है, वह इस अपमान को कैसे सहेगा? कबीर को अहसास हुआ कि प्यार करना आसान था, लेकिन उसे निभाना किसी ओपन हार्ट सर्जरी से भी ज्यादा मुश्किल था। पूरे दिन भर कबीर एक बेजान मशीन की तरह काम करता रहा। अस्पताल के हर कोने में उसे फुसफुसाहटें सुनाई दे रही थीं। शाम होते-होते कबीर का मानसिक बोझ इतना बढ गया कि वह सडकों पर पैदल ही निकल पडा। मबंई की बारिश फिर से शुरू हो गई थी। वह भारी बारिश कबीर के कोट को भिगो रही थी, लेकिन उसके अंदर की आग नहीं बुझ रही थी। जब वह आरव के अपार्टमेंट पहुचा, तो वह पूरी तरह भीग चुका था। कमरे के अंदर दाखिल होते ही उसे पियानो की एक बहुत ही उदास धुन सुनाई दी। आरव वहां बैठा था। कबीर की हालत देखकर आरव तुरंत उठा और उसके पास आया। आरव ने कबीर का भीगा कोट उतारा और उसे सोफे पर बिठाया। आरव ने कबीर के बालों को पोंछना शुरू किया। कबीर ने अचानक आरव का हाथ इतनी जोर से पकडा कि आरव सहम गया। कबीर ने कापते हुए कहा कि आरव, हमें यह सब खत्म करना होगा। समीर ने बोर्ड में शिकायत कर दी है। वह मेरे परिवार तक पहुच जाएगा। सब कुछ बर्बाद हो जाएगा आरव। मैं तुम्हें इस दलदल में नहीं घसीटना चाहता। तुम बहुत नाजुक हो, तुम यह अपमान नहीं सह पाओगे। कबीर की आखों में आसू थे। आरव ने कबीर के हाथों को अपने हाथों में लिया। आरव के हाथों में आज एक अजीब सी स्थिरता थी। आरव ने कबीर की आखों में झाका और कहा कि कबीर, तुम्हें क्यों लगता है कि मैं इतना कमजोर हूं? सिर्फ इसलिए कि मैं संगीत में अपनी भावनाओं को छिपाता हूं? आरव ने पियानो की तरफ इशारा करते हुए कहा कि कबीर, संगीत में जब एक तार बहुत ज्यादा खिचा होता है, तभी वह सबसे मधुर धुन पैदा करता है। आज हमारी जिदगी का तार भी बहुत खिचा हुआ है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उसे तोड दें। आरव ने कबीर के चेहरे को सहलाया और कहा कि तुमने मुझे उस अधेरे से निकाला था, अब मैं तुम्हें इस डर से निकालूंगा। अगर समाज हमें गलत कहता है, तो कहने दो। हम अपनी एक अलग धुन बनाएंगे। कबीर को आरव की बातों में वह स्थिरता मिली जो उसे अपनी दवाओं में भी नहीं मिलती थी। कबीर ने अपना सिर आरव के कधे पर टिका दिया। आरव ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। यह वह 'सेफ हेवन' था जहा दुनिया का कोई भी समीर या कोई भी बोर्ड प्रवेश नहीं कर सकता था। कबीर ने महसूस किया कि आरव के सुडौल कधों में आज एक ऐसी ताकत थी जिसने कबीर के सारे डर को सोख लिया था। कबीर ने आरव से पूछा कि क्या तुम वाकई इस लडाई के लिए तैयार हो? आरव ने कबीर की आखों में देखते हुए कहा कि मैं तैयार हूं, कबीर। हम कल बोर्ड मीटिंग में साथ जाएंगे। हम अपना सच बताएंगे। कबीर को अहसास हुआ कि प्यार ही वह सबसे बडी सर्जरी है जो टूटे हुए इंसानों को फिर से जोड देती है। रात भर वे दोनों बालकनी के पास खडे रहे। बाहर बारिश थम चुकी थी और शहर की रोशनियां टिमटिमा रही थीं। कबीर ने आरव का हाथ मजबूती से थाम लिया। उसे पता था कि कल सुबह की धूप उनके करियर के लिए काली हो सकती है, लेकिन उनकी रूह के लिए वह सबसे सुनहरी सुबह होगी। समीर की चाल और बोर्ड का डर अब भी वहा था, लेकिन कबीर के मन में अब कोई द्वंद्व नहीं था। उसने अपनी पहचान को स्वीकार कर लिया था और आरव के साथ खडे होने का फैसला कर लिया था। कहानी अब उस निर्णायक मोड पर थी जहा समाज और प्यार के बीच का टकराव अपने चरम पर होने वाला था।

08/05/2026

=== भाग 8 ===
मुंबई सेंट्रल रेलवे स्टेशन की वह विशाल और ऐतिहासिक इमारत आज किसी पुरानी, जर्जर और डरावनी गुफा की तरह लग रही थी। बाहर मूसलाधार बारिश का ताडव जारी था, जिसकी आवाज स्टेशन की टीन की छतों पर किसी युद्ध के नगाडों की तरह गूंज रही थी। प्लेटफार्म नंबर चार पर पसरा हुआ वह सन्नाटा बाहर के शोर से कहीं ज्यादा भयानक और दम घोंटने वाला महसूस हो रहा था। वहां लगी मद्धम पीली और नीली रोशनियां गीले कंक्रीट के फर्श पर एक धुंधला और रहस्यमयी अक्स बना रही थीं, जैसे कोई अधूरी कहानी पानी की उन बूंदों में तैर रही हो। हवा में भीगे हुए लोहे की जंग, पुराने कपडों की नमी और हजारों गुमनाम मुसाफिरों की छोडी हुई एक भारी गंध घुली हुई थी। डाक्टर कबीर शेखावत अपनी कार को सडक के बीचोबीच एक लावारिस मलबे की तरह छोडकर पागलों की तरह स्टेशन के भीतर दौड रहे थे। उनके फेफडे अब किसी सुलगती हुई आग की भट्टी की तरह जल रहे थे। हर सांस के साथ उनके सीने में एक तीखा और असहनीय दर्द उठता था, जो उनकी पसलियों को अंदर से चीर रहा था। कबीर का वह महंगा और आलीशान सूट अब बारिश के पानी से पूरी तरह भीग चुका था और उनके शरीर से चिपक गया था। उनके इटालियन चमडे के जूते स्टेशन की कीचड और गंदगी में पूरी तरह सन चुके थे। कबीर के मन में रह-रहकर भाग सात का वह आखिरी दृश्य कौंध रहा था—वह चलती हुई ट्रेन, खिडकी के पीछे आरव का वह उदास चेहरा और वह कांच की दीवार। कबीर को अचानक अहसास हुआ कि वह शायद उनकी अपनी मानसिक थकावट और अपराधी बोध से उपजा हुआ एक भयानक भ्रम था। वह सच नहीं था। वह केवल एक डरावना सपना था जिसे उनके डर ने हकीकत मान लिया था। कबीर ने लडखडाते हुए अपने मोबाइल की स्क्रीन देखी। सिंक-हार्ट ऐप का इंटरफेस अब लाल रंग के चेतावनी संकेतों से भरा पडा था। कबीर का दिमाग तेजी से काम कर रहा था। तानिया ने उसे बताया था कि आरव इसी स्टेशन की इसी ट्रेन से जाने वाला है। कबीर को उस तकनीक या मास्टर एक्सेस की अब कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनके दिल का अपना जीपीएस उन्हें सही दिशा दिखा रहा था। जैसे ही वे प्लेटफार्म के उस सबसे वीरान और अंधेरे कोने में पहुंचे, उनके कदम अचानक पत्थर की तरह वहीं जम गए। वहां, प्लेटफार्म की आखिरी बेंच के पास, आरव मल्होत्रा खडा था। वह ट्रेन में नहीं चढा था। शायद आखिरी पल में उसके कांपते हुए पैरों ने उसका साथ छोड दिया था, या शायद उसकी रूह ने उसे उस शहर से भागने की इजाजत नहीं दी थी जहां उसकी धडकनों का आधा हिस्सा अब भी धडक रहा था। आरव का वह पतला और नाजुक शरीर बारिश की ठंडी फुहारों से बुरी तरह कांप रहा था। उसने अपना वही पुराना और प्रिय पियानो बैग अपने दाहिने कंधे पर बहुत मजबूती से टांग रखा था, जैसे वह इस पूरी दुनिया की एकमात्र चीज हो जिसे वह अपना कह सकता था। आरव का सिर बुरी तरह नीचे झुका हुआ था और उसके काले रेशमी बाल पसीने और बारिश के पानी की वजह से उसके माथे पर चिपक गए थे। कबीर को अपनी आंखों पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने कई बार अपनी लंबी डाक्टरी जिदगी में मरते हुए मरीजों को वापस लौटते देखा था, लेकिन आज उन्हें खुद ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उनकी अपनी उखडती हुई सांसें फिर से बहाल हो रही हों। कबीर ने बहुत ही दबी हुई, भारी और कांपती हुई आवाज में पुकारा, आरव! वह आवाज बारिश के शोर और दूर कहीं लाउडस्पीकर पर हो रही घोषणाओं के बीच बहुत धीमी थी, लेकिन आरव ने उसे सुन लिया। आरव का पूरा शरीर उस एक पुकार को सुनते ही जैसे बिजली के झटके से अकड गया हो। उसने बहुत ही धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी उन बडी और गहरी आंखों में आज अथाह दर्द, बेइंतहा थकान और एक ऐसी वीरानी पसरी थी जिसे देखकर कबीर का कलेजा मुंह को आ गया। आरव ने अपनी नंगी कलाई को देखा, जहां कभी वह काली सिलिकॉन की पट्टी बंधी रहती थी, लेकिन अब वहां सिर्फ एक गहरा लाल निशान और पट्टी के खिंचाव के कुछ सूखे हुए घाव बचे थे। जैसे ही आरव ने कबीर को अपनी ओर तेज कदमों से बढते देखा, उसके चेहरे पर डर, हताशा और नफरत के कई मिले-जुले भाव एक साथ आए। उसने लगभग चीखते हुए और अपनी फटी हुई आवाज में कहा, पास मत आना कबीर! वहीं रुक जाओ जहां तुम खडे हो! कबीर के कदम वहीं के वहीं जम गए। उनके बीच महज कुछ ही मीटर का फासला बचा था, लेकिन वह फासला उन दोनों को सदियों जैसा लंबा और दर्दनाक लग रहा था। कबीर ने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए, जैसे वह किसी बहुत ज्यादा डरे हुए और घायल पक्षी को यकीन दिलाना चाह रहे हों कि वह उसे अब और चोट नहीं पहुंचाएंगे। कबीर की नजरें आरव की सुडौल जालाइन और उसकी गर्दन पर उभरी हुई नसों पर टिक गईं। आरव का आदम्स एप्पल घबराहट की वजह से ऊपर-नीचे हो रहा था, जो कबीर की आंखों के लिए एक बहुत ही व्याकुल कर देने वाला दृश्य था। कबीर ने कहा, आरव, प्लीज मेरी बात एक बार सुन लो। समीर ने जो कुछ भी तुमसे कहा, वह एक बहुत बडी और सुनियोजित साजिश थी। वह सिर्फ तुम्हें और मुझे पूरी तरह से तबाह करना चाहता था। आरव की आंखों से आंसुओं की एक निरंतर धार बह निकली जो बारिश के पानी के साथ मिलकर उसके गालों पर एक नया रास्ता बना रही थी। समीर ने वही कहा जो कडुवा सच था डाक्टर साहब! आरव की आवाज में एक ऐसी कडुवाहट थी जो किसी भी घातक जहर से भी ज्यादा तीखी महसूस हो रही थी। उसने आगे कहा, आपने मुझे एक ऐसी प्रयोगशाला में खडा कर दिया जहां मेरी पवित्र भावनाओं को सिर्फ डिजिटल आकडों के तराजू पर तोला जा रहा था। मैं आपके लिए कोई जीता-जागता इंसान नहीं था कबीर, मैं आपके लिए सिर्फ एक अनोखा केस स्टडी था। एक ऐसा लाचार मरीज जिस पर आप अपनी नई और आधुनिक तकनीक का परीक्षण कर रहे थे। आपको मेरी इन धडकनों की जरूरत सिर्फ इसलिए थी ताकि आप अपनी इनसोम्निया की बीमारी का इलाज कर सकें और रात को चैन की नींद सो सकें। क्या आपको कभी एक पल के लिए भी यह अहसास हुआ कि उन धडकनों के पीछे एक सांस लेता हुआ इंसान भी है जो आपसे रूहानी तौर पर जुड रहा था? कबीर के चेहरे पर एक ऐसी खामोशी छा गई जिसे दुनिया का कोई भी शब्द बयान नहीं कर सकता था। आरव के द्वारा कहा गया एक-एक शब्द कबीर के दिल पर किसी भारी हथौडे की तरह चोट कर रहा था। क्या वाकई वह इतने ज्यादा निष्ठुर और मशीनी हो चुके थे? क्या उनका विज्ञान उनकी मानवीय संवेदनाओं पर इतना ज्यादा हावी हो गया था? कबीर ने एक बहुत ही गहरी और ठंडी सांस ली और आरव की उन डरी हुई आंखों में सीधे झांका। कबीर ने बहुत ही शातं स्वर में कहा, आरव, समीर ने तुम्हें यह नहीं बताया कि वह केस स्टडी तो बहुत पहले ही खत्म हो चुकी थी। उसने तुम्हें यह कभी नहीं बताया कि जब मैं उस रात तुम्हारे उस गुप्त स्टूडियो में तुम्हें बचाने आया था, तब मेरा कोई प्रोफेशनल लालच या डाक्टरी फायदा नहीं था। मैं वहां सिर्फ इसलिए दौडा चला आया था क्योंकि उस रात जब तुम्हारी धडकनें ऐप पर बंद हुई थीं, तो मुझे अपनी छाती में ऐसा लगा था जैसे मेरा अपना वजूद ही खत्म हो रहा है। लेकिन आरव अब कुछ भी सुनने या समझने की स्थिति में नहीं था। उसने अपनी कलाई पर बंधी हुई उस साधारण सी घडी की ओर इशारा किया और बहुत ही हिकारत के साथ कहा, हम दोनों एक दूसरे से कभी भी सच्चा प्यार नहीं कर सकते कबीर। हमारा यह तथाकथित और बनावटी रिश्ता सिर्फ एक एल्गोरिदम की देन है। अगर यह सिंक-हार्ट तकनीक न होती, तो आप जैसे रसूखदार, प्रतिष्ठित और नामी डाक्टर मुझ जैसे एक अकेले, टूटे हुए और मानसिक रूप से बीमार कलाकार की तरफ मुडकर देखते भी नहीं। हम सिर्फ इस डिजिटल डेटा के गुलाम हैं कबीर। जिस दिन यह इंटरनेट का सिग्नल बंद होगा, हमारा यह काल्पनिक रिश्ता भी उसी पल खत्म हो जाएगा। बारिश अब एक भयानक और हिंसक तूफान में बदल चुकी थी। स्टेशन की छत से गिरता हुआ पानी अब किसी झरने की तरह बह रहा था। कबीर को पूरी तरह अहसास हो गया था कि आज अगर उन्होंने कुछ बहुत बडा और क्रांतिकारी नहीं किया, तो वह आरव को अपनी जिदगी से हमेशा के लिए खो देंगे। उन्होंने अपनी बाईं कलाई पर बंधी हुई उस महगी सिंक-हार्ट स्मार्टवाच को देखा, जो अभी भी अपनी नीली रोशनी में टिमटिमा रही थी और उन्हें आरव के बढते हुए तनाव के आकडों की जानकारी दे रही थी। कबीर ने एक बहुत ही शांत लेकिन वज्र जैसा दृढ संकल्प किया। उन्होंने अपनी उस स्मार्टवाच का पट्टा बहुत ही धीरे से खोला। आरव उन्हें बहुत ही ज्यादा हैरानी और अचरज से देख रहा था। कबीर ने उस बेशकीमती और अत्याधुनिक तकनीक को अपनी हथेली में लिया और एक पल के लिए उसे गहरी नफरत के साथ देखा। यह वही बेजान चीज थी जिसने उन्हें पहली बार मिलाया था, लेकिन आज यही चीज उनके बीच की सबसे बडी और अभेद्य दीवार बन गई थी। कबीर ने अपनी पूरी शारीरिक ताकत लगाकर उस घडी को दूर रेलवे ट्रैक की उन ठंडी लोहे की पटरियों की ओर फेंक दिया। वह कीमती यंत्र हवा में कई बार घूमता हुआ गया और एक तीखी चटकने की आवाज के साथ पटरियों के बीच पडे नुकीले पत्थरों से टकराकर पूरी तरह से चकनाचूर हो गया। उसकी छोटी सी स्क्रीन एक आखिरी बार नीली रोशनी में चमकी और फिर हमेशा-हमेशा के लिए काली और मृत हो गई। आरव यह देखकर पूरी तरह सन्न रह गया। उसकी सांसें जैसे उसके गले में ही अटक गई थीं। उसने ट्रैक की ओर देखा और फिर वापस कबीर की उन जलती हुई आंखों की तरफ। आरव ने हकबकाते हुए पूछा, आपने... आपने यह क्या किया कबीर? वह डिवाइस... वह तकनीक तो आपकी पूरी जिदगी की मेहनत थी। भाड में जाए वह डिवाइस और भाड में जाए वह झूठी तकनीक आरव! कबीर ने बहुत ही जोर से गरजते हुए कहा और तीन लंबे डग भरकर आरव के बिल्कुल करीब पहुंच गए। कबीर के शरीर की गर्मी और उनके महगे कोलोन की महक अब आरव को बहुत करीब से महसूस हो रही थी। इस बार जब कबीर ने आरव का भीगा हुआ हाथ अपने हाथ में पकडा, तो आरव में अब विरोध करने की रत्ती भर भी शारीरिक ताकत नहीं बची थी। आरव का हाथ बर्फ की तरह ठंडा था और वह किसी सूखे पत्ते की तरह बुरी तरह थरथरा रहा था। कबीर ने आरव के उस ठंडे और कांपते हुए हाथ को अपनी भीगी हुई कमीज के ऊपर, ठीक अपने दिल के स्थान पर बहुत ही ज्यादा मजबूती के साथ रख दिया। आरव की लंबी और कोमल उंगलियां कबीर की छाती के उस गर्म मांस और मजबूत हड्डियों के नीचे हो रही एक बहुत ही हिंसक हलचल को साफ महसूस कर सकती थीं। वहां कोई सेंसर नहीं था, कोई तार नहीं जुडा था, और वहां कोई डिजिटल ग्राफ नहीं चल रहा था। वहां सिर्फ एक कच्चा, आदिम, भयानक और प्रचंड मानवीय स्पंदन था। कबीर का अपना दिल किसी घायल और पिंजरे में बंद जंगली जानवर की तरह अपनी पसलियों को तोडकर बाहर आने की नाकाम कोशिश कर रहा था। महसूस करो इसे आरव, कबीर ने बहुत ही धीमी, गहरी और भारी आवाज में कहा। उनकी आवाज में एक ऐसी तडप और रूहानी खिचाव था जो आरव ने आज तक पहले कभी नहीं सुना था। कबीर ने आगे कहा, यह किसी ऐप का बेजान डेटा नहीं है आरव। यह किसी साफ्टवेयर की कोडिंग या एल्गोरिदम नहीं है। यह मेरा अपना असली दिल है, जो तुम्हारे पास न होने के डर से इस तरह पागलों की तरह धडक रहा है। अगर यह सिर्फ एक केस स्टडी होती, तो मेरी धडकनें आज इतनी ज्यादा बेकाबू और पागल कभी नहीं होतीं। आरव की आंखों से अब आंसुओं का एक और सैलाब उमड पडा। उसकी उंगलियां कबीर की भीगी हुई शर्ट के कपडे में बुरी तरह धंस गईं। वह उस धडकन की एक-एक थाप को अपनी हथेली की गहराई में समाते हुए महसूस कर रहा था। वह लय जो उसे महीनों से एक कृत्रिम डिजिटल आवाज के रूप में सुनाई देती थी, आज वह कितनी वास्तविक, कितनी डरावनी और कितनी ज्यादा रूहानी हद तक सच्ची थी। आरव का सिर धीरे से कबीर के भीगे हुए मजबूत कंधे पर टिक गया। वह अब बहुत बुरी तरह से सिसक रहा था, उसका पूरा शरीर भावनाओं के उस प्रचंड वेग से डगमगा रहा था। आसपास की भीड, गुजरती हुई ट्रेनों का शोर, बारिश की कडकडाहट... सब कुछ जैसे एक पल में धुंधला और बेमानी हो गया। उस विशाल और धीरे-धीरे खाली होते हुए प्लेटफार्म पर सिर्फ वे दो लोग बचे थे, जो अपनी सामाजिक पहचान, अपनी प्रतिष्ठा और अपने डर की परतों को उतारकर एक दूसरे के सामने बिल्कुल नंगे, मासूम और सच्चे खडे थे। कबीर ने महसूस किया कि आरव का आदम्स एप्पल उनके कंधे के पास ऊपर-नीचे हो रहा है, और आरव की सांसें अब उनके गले को छू रही थीं। यह एक ऐसा सुरक्षित कोना था जिसे वे दोनों कभी खोना नहीं चाहते थे। आरव ने अपनी सिसकियों के बीच बहुत ही कमजोर आवाज में कहा, मुझे बहुत ज्यादा डर लगता है कबीर। मुझे हर पल यह डर सताता है कि कहीं मैं फिर से उसी अंधेरे में अकेला न हो जाऊं। मुझे डर लगता है कि यह सब फिर से एक बहुत ही सुंदर लेकिन डरावना सपना साबित होगा। कबीर ने आरव का वह कोमल चेहरा अपने दोनों हाथों के प्याले में भर लिया। उनकी उंगलियों का वह स्पर्श आरव के ठंडे पड चुके गालों पर किसी दिव्य मरहम की तरह काम कर रहा था। कबीर ने आरव की आंखों में बहुत ही गहराई से देखते हुए कहा, तुम अब कभी भी अकेले नहीं होगे आरव। वह घडी तो अब पूरी तरह टूट चुकी है, लेकिन मेरे सीने की यह धडकन अब भी तुम्हारे लिए जारी है। तुमने ही मुझे उस मशीनों की बेजान दुनिया से बाहर निकाला है। तुमने ही मुझे यह सिखाया है कि एक धडकते हुए दिल का असली मतलब सिर्फ शरीर में खून पंप करना नहीं होता, बल्कि उसका असली मतलब तो किसी की रूहानी मौजूदगी को अपने भीतर महसूस करना होता है। आरव ने अपनी आंखें मूंद लीं। उसे अचानक महसूस हुआ कि उसके भीतर का वह भयानक शोर और वह संगीत का शोर, जो उसे बरसों से सुकून से सोने नहीं देता था, अब धीरे-धीरे शांत हो रहा था। उसे अब किसी बाहरी संगीत की जरूरत नहीं थी, उसे अब किसी वायलिन या पियानो की मीठी धुनों की कोई आवश्यकता नहीं थी। कबीर की वह बेतरतीब और हिंसक धडकन ही उसके लिए दुनिया का सबसे मुकम्मल, सबसे पवित्र और सबसे खूबसूरत संगीत बन गई थी। प्लेटफार्म पर खडी वह आखिरी ट्रेन अब पूरी तरह खाली हो चुकी थी और उसके भारी लोहे के पहिये एक लंबी, उदास और रूह को वेधने वाली सीटी के साथ फिर से घूमने लगे थे। आरव ने उस जाती हुई ट्रेन को अपनी नम नजरों से ओझल होते हुए देखा। वह ट्रेन उसे उस अतीत की ओर ले जा सकती थी जहां सिर्फ अंतहीन अकेलापन और खामोशी थी, लेकिन आरव ने आज यहीं, कबीर के पास रुकने का अंतिम फैसला कर लिया था। उसने कबीर के उस भीगे हुए और मजबूत हाथ को अपने हाथों में थाम लिया और उसे बहुत ही सम्मान के साथ चूम लिया। बारिश अब एक हल्की फुहार में बदल गई थी, जैसे कुदरत ने भी अपनी नाराजगी छोडकर उन दोनों को आशीर्वाद दे दिया हो। कबीर ने आरव के दुबले कंधे पर अपना मजबूत हाथ रखा और उसे सहारा देते हुए उस वीरान प्लेटफार्म से बाहर की ओर ले जाने लगे। उनके कदमों में अब एक नई तरह की दृढता और एक नया उद्देश्य था। वे दोनों पूरी तरह से भीगे हुए थे, थके हुए थे, और शायद इस कट्टर समाज की नजरों में वे दोनों पूरी तरह से गलत भी थे। लेकिन उस अंधेरी और तूफानी रात में, मुंबई की सडकों पर पसरी हुई उस नमी के बीच, उन्हें अपना असली रास्ता मिल गया था। कबीर ने चलते हुए बहुत ही कोमल और धीमी आवाज में पूछा, आरव, क्या तुम अभी भी उस धडकन को सुन पा रहे हो? आरव ने कबीर की ओर अपनी नजरें घुमाईं और उसके चेहरे पर एक ऐसी मासूम मुस्कान आई जिसने कबीर के जीवन के सारे संचित अंधेरे को एक ही पल में खत्म कर दिया। आरव ने बहुत ही धीरे से और दृढता से कहा, मैं उसे सिर्फ सुन नहीं रहा हूं कबीर, मैं अब उसे हर पल जी रहा हूं। अब मुझे किसी सिंक-हार्ट या किसी बाहरी मशीन की रत्ती भर भी जरूरत नहीं है, क्योंकि मेरा यह दिल अब हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारी उस लय में पूरी तरह समा चुका है। वे स्टेशन की उस पुरानी और ऐतिहासिक इमारत से बाहर निकले। सडकों पर अब भी घुटनों तक पानी भरा हुआ था, लेकिन अब वह पानी किसी डरावनी नदी जैसा नहीं लग रहा था। अब वह पानी शहर की सारी गंदगी और पुरानी यादों को धोकर उसे फिर से नया और स्वच्छ बनाने की कोशिश कर रहा था। कबीर ने अपनी कार का दरवाजा खोला और आरव को बहुत ही सावधानी से अंदर बिठाया। आरव ने अपनी सीट से टिक कर अपनी आंखें पूरी तरह मूंद लीं। वह आज पहली बार बिना किसी अनजाने डर के, बिना किसी पैनिक अटैक की चिंता के चैन से सो सकता था। कबीर ने गाडी स्टार्ट की और उसे उस दिशा में मोड दिया जहां से सुबह की पहली सुनहरी किरण निकलने वाली थी। समीर की धमकियां, अस्पताल का वह कठोर बोर्ड, समाज के वे कडुवे ताने... यह सब अब बहुत पीछे स्टेशन की उस गंदगी में छूट चुके थे। उनके सामने अब एक पूरी नई जिदगी पडी थी, जिसे वे अपनी मर्जी की धुन पर और अपनी शर्तों पर सजाने वाले थे। उस रात मुंबई ने शायद एक बहुत ही महान पियानोवादक को खो दिया था, लेकिन उसने दो ऐसी अधूरी रूहों को हमेशा के लिए मिला दिया था जिन्होंने धडकनों की एक नई और अनोखी भाषा इजाद की थी। एक ऐसी भाषा जिसे समझने के लिए किसी आधुनिक ऐप, किसी डिवाइस या किसी सेंसर की नहीं, बल्कि सिर्फ एक सच्चे, कोमल और निस्वार्थ दिल की जरूरत थी। कबीर ने आरव का हाथ फिर से अपने हाथ में बहुत ही मजबूती से ले लिया और गाडी की रफतार धीरे-धीरे बढा दी। बाहर की वह भयानक बारिश अब पूरी तरह से थम चुकी थी और बादलों के बीच से चांद की एक बहुत ही पतली और कोमल सी लकीर दिखाई देने लगी थी। वह लकीर एक नई उम्मीद की थी, वह लकीर सच्चे प्यार की थी, और वह लकीर उस नई धुन की थी जो अब इस कायनात में कभी भी खत्म नहीं होने वाली थी। कबीर और आरव, अब सिर्फ दो अलग-अलग नाम नहीं थे, वे अब एक ही लय के दो अटूट हिस्से बन चुके थे, जो इस शोर भरी और मतलबी दुनिया में अपना एक छोटा सा, निजी और खामोश स्वर्ग ढूंढ चुके थे। लेकिन कबीर के मन में एक हल्का सा संशय अभी भी बाकी था। जैसे ही उन्होंने कार की खिडकी से बाहर देखा, उन्हें अहसास हुआ कि स्टेशन की यह जीत तो सिर्फ एक छोटी सी शुरुआत थी। असली लडाई तो अब शुरू होने वाली थी। समीर और अस्पताल का बोर्ड चुप बैठने वाले नहीं थे। कबीर ने मन ही मन खुद को तैयार किया। उसने आरव की शांत सूरत को देखा और तय किया कि वह अब कभी पीछे मुडकर नहीं देखेगा। आने वाला कल चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, आज की यह रात उन दोनों की थी। कबीर ने अपनी गाडी को मुख्य सडक पर डाला और उस रोशनी की तरफ बढने लगे जो अंधेरे को चीरने के लिए बेताब थी। समीर की वह जहरीली योजना और समाज के वे रूढिवादी नियम अब उनके रास्ते का पत्थर नहीं बन सकते थे, क्योंकि अब वे दोनों एक ही धडकन के साथ सिंक हो चुके थे। यह भाग 9 की उस भयानक चुनौती की एक चेतावनी थी, लेकिन कबीर के चेहरे पर अब केवल विजय का भाव था।

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