Naveen Pandey
23/12/2025
एक लेखक जिसे मन ही मन प्यार करता रहा। जिसका लिखा पसंद करता रहा। जिसकी बनाई कमीज नौकरी के हर दिन बदन पर टंगी दिखती रही। जिन्हे मैने जयपुर में सजी धजी भीड़ के बीच पेड़ से गिरे एक पत्ते की तरह इधर-उधर उड़ते देखा था। लोकप्रियता के अंदाज़ से भरी भीड़ की धक्का मुक्की में वह लेखक अपना झोला संभाले चला जा रहा था। अच्छा लगा था देर तक देखते रहना। सेल्फी लेने वालों से कहा था कि तुम्हारे फ्रेम में जिसे होना चाहिए वो वहाँ अकेले चला जा रहा है। विनोद कुमार शुक्ल को मेरी श्रद्धांजलि। अब से हमारे मन की दीवारों में खिड़की की तरह रहा करेंगे। कभी हम भूल जाएँगे, कभी वे झांका करेंगे।
तस्वीर- राजकुमार सोनी जी के पेज से,
05/11/2025
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