Soch se Shabd Roop tak
यूँ खिड़की से झाँके है चाँद,
जैसे तुम ही मुझे देख मुस्काए हो,
फिर दिल ने कोई गीत छेड़ा है,
फिर जाने-अनजाने तुम याद आए हो।
कभी तलाश थी मुझे खुद की
अब खुद से ही मुलाक़ात हुई,
जो खालीपन सीने में पलता था
वहीं से एक नई शुरुआत हुई।
लफ्ज़ नहीं निकलते, पर दिल भरा हुआ है,
चेहरे पे सुकून है, पर भीतर से थका हुआ है।
जब शब्द बिकने लगते हैं, तो वे सिर्फ पढ़े जाते हैं....
लेकिन जब शब्द जिए जाते हैं तो वे हमेशा जिंदा रहते हैं।
पानी की लहरों पे सपनों का मेला है,
कागज़ की नावों में बचपन का रेला है।
धड़कनें तो अब भी हैं, पर दिल का सुकून खो गया,
वो हँसी जो साथ थी, अब बस तन्हाई में गूँज गया।
वो छोटा सा झोला भी जैसे दुनिया समेटे है,
थोड़ी सी रोटी, और ढेरों उम्मीदें बटोरें है।
वो मंज़िलें भी अब जुदा हो गईं,
लगता है वो दुआएं भी जैसे हवा हो गईं।
किस्मत की लकीरें नहीं, हौसलों से राह बनती है,
जो कर्मों में सच्चा हो, उसकी जीत पक्की होती है।
तेरी खामोशियाँ भी मुझसे बातें किया करती थीं,
मेरी हर धड़कन में तेरी आहट जिया करती थीं।
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