Dr.Gunshekhar

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09/06/2023
07/06/2023

कितना सुखद होता है अपनी वंश बेलि का ऊर्ध्वमुखी फैलाव।ऐसे में कल मीरा बहुत याद आईं ''अंसुवन जल सींचि- सींचि प्रेम बेलि बोई।
अब तो बेलि फैलि गई कहा करै कोई।"
इनको विदा करते समय आंसू थम नहीं रहे थे। कैसे कहूं कि वे आंसू दुःख के थे।कुछ गर्व के थे। कुछ खुशी के थे पर सबसे ज्यादा दुःख के थे। दुःख बिछोह का। दुःख आंखों के सामने से हटने का।
ये शायद भौतिक सुख वहां अधिक पाएंगे। लेकिन यहां भी घर- द्वार, गाड़ी - घोड़ा और देज्योर्ग(Deseorg) जैसी बढ़िया सी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी सब कुछ तो था।पहले बहुत दुधारू थी यह कंपनी।कोरोना के बाद दूध कम देने लगी थी।अब उसे संभालने का दायित्व मुझ पर है।आज पहला ही दिन भारी गया जब कविता कहानी की जगह किसी की वीज़ा का फ़ाइल खोजनी पड़ी। किसी को यूरोप में रोज़गार के अवसर के बारे में बताना पड़ा।
शायद शुकून वहां ज्यादा मिलेगा और शांति भी। वहां किचकिच भी कुछ नहीं होगा।यहां यह सब बहुत है।उसका कारण हमारा नैतिक होना है। यहां बिना हमारी आर्थिक स्थिति जाने हमारे रिश्तेदार हमसे कभी न चुकाने की नीयत के साथ अधिकार पूर्वक उधार मांगेंगे। वहां ऐसा नहीं है। वहां इसके लिए झूठ बोलने की भी ज़रूरत नहीं है।इस दृष्टि से इनका वहां जाना सुखद है। आंसुओं का क्या है ये तो जल्दी सूखते हैं। अपने आत्मीयों के सुख के लिए इन्हें अलगनी पर टांग कर भी सुखाया जा सकता है। अपने हृदयांश के उज्ज्वल भविष्य हेतु हमारी अनंत अशेष शुभकामनाएं!


यूरोप यात्रा के पूर्व छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर बहू(प्रीति), बेटा (अभिषेक),भांजा(विवेक) और बहू का भाई निशांत

04/04/2023
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