Point View
01/07/2026
आग्रह करता हूँ कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के माननीय चीफ जस्टिस विदेश में होने वाले सम्मेलनों में क्या बोलते हैं?क्या नहीं बोलते हैं? इससे कुछ ज्यादा असर भारतवासियों के जीवन पर नहीं पड़ता है! हाँ! अगर भारत वासियों के जीवन पर फर्क पड़ता है तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय, माननीय उच्च न्यायालय, माननीय जिला न्यायालयों के सब कुछ जानते हुए भी मूक रहने से बहुत बड़ा फर्क पड़ता है! देश के अंदर बहुत सारे मामले ऐसे हैं जिनकी सूचना समाचार पत्रों, न्यूज़ चैनलों एवं सोशल मीडिया के माध्यम से आप तक समय पर पहुंच जाती है! भारत में आम जनमानस का एक बड़ा सहारा माननीय न्यायालय ही है! वह भी अगर इस तरीके से दबाव महसूस करेंगे तो फिर आम जनता का क्या होगा?🙏त्राहिमाम,त्राहिमाम, त्राहिमाम!
🇸🇪⚖️ 🇮🇳 स्वीडन में आयोजित International IDEA के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लोकतंत्र, संविधान और न्यायपालिका की भूमिका पर बेहद महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि न्यायालय केवल मूक दर्शक नहीं बन सकते, बल्कि उन्हें संविधान की सर्वोच्चता के सतर्क संरक्षक बने रहना होगा। उनका स्पष्ट संदेश था कि लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती केवल चुनावों से नहीं, बल्कि संविधान के प्रति निष्ठा, कानून के शासन (Rule of Law) और एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका से सुनिश्चित होती है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) न्यायपालिका की कोई विशेष शक्ति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा सौंपा गया एक पवित्र दायित्व है। जब भी कोई कानून, नीति या सरकारी निर्णय संविधान की मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, तब न्यायालय का कर्तव्य है कि वह हस्तक्षेप कर संविधान की रक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि शासन का प्रत्येक निर्णय कानून और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हो। उन्होंने कहा कि संविधान से ऊपर कोई भी संस्था या व्यक्ति नहीं है और सार्वजनिक शक्ति का प्रत्येक प्रयोग संविधान के दायरे में ही होना चाहिए।
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने यह भी कहा कि कानून का शासन केवल कानूनों के अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को मनमानी से सुरक्षा प्रदान करता है, शासन को जवाबदेह बनाता है और प्रत्येक व्यक्ति को समान न्याय दिलाने की आधारशिला है। उन्होंने भारतीय न्यायपालिका की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि समय-समय पर संवैधानिक न्यायालयों ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की है, लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाया है और यह सुनिश्चित किया है कि संविधान केवल एक दस्तावेज़ न रहकर प्रत्येक नागरिक के जीवन में प्रभावी रूप से लागू हो।
उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका की शक्ति केवल साहसपूर्वक निर्णय देने में ही नहीं, बल्कि आवश्यक अवसरों पर न्यायिक संयम बनाए रखने में भी निहित है। संविधान की रक्षा तभी प्रभावी हो सकती है जब शासन के सभी अंग अपनी-अपनी संवैधानिक सीमाओं का सम्मान करें और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन एवं जवाबदेही बनी रहे।
मुख्य न्यायाधीश का यह संबोधन केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी लोकतांत्रिक देशों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि संविधान किसी भी लोकतंत्र की आत्मा है और उसकी सर्वोच्चता बनाए रखना न्यायपालिका सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।
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01/07/2026
सिर्फ मैरिज रजिस्ट्रेशन से हिंदू विवाह वैध नहीं होता, सप्तपदी समेत आवश्यक रस्में अनिवार्य! गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत केवल विवाह का रजिस्ट्रेशन हो जाने से शादी वैध नहीं हो जाती। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह तभी कानूनी रूप से मान्य होगा, जब कानून के अनुसार आवश्यक वैवाहिक रस्में, विशेष रूप से जहां लागू हो वहां सप्तपदी (सात फेरे/सात कदम), विधिवत संपन्न की गई हों। जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कथित विवाह को शुरुआत से ही शून्य (Null and Void Ab Initio) घोषित कर दिया। गुजरात हाईकोर्ट ने जमानत से किया इनकार मामले में पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र के आधार पर वैध विवाह की प्रथम दृष्टया धारणा मानते हुए मामले की पूर्ण सुनवाई का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि कथित पत्नी ने स्वयं लिखित जवाब में स्वीकार किया था कि दोनों के बीच कोई वैवाहिक रस्म या समारोह आयोजित नहीं हुआ था और न ही कोई विधिसम्मत विवाह संपन्न हुआ था। उसने यह भी माना था कि दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ नहीं रहते। गुजरात हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया अदालत ने कहा कि जब आवश्यक वैवाहिक रस्में संपन्न ही नहीं हुईं, तो विवाह पंजीकरण से उत्पन्न वैध विवाह की धारणा स्वतः समाप्त हो जाती है। धारा 8 के तहत रजिस्ट्रेशन केवल पहले से विधिवत संपन्न विवाह का प्रमाण होता है, वह अपने आप किसी विवाह को वैध नहीं बना सकता। फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह एक 'संस्कार' है, केवल "गीत-संगीत, दावत या व्यावसायिक लेन-देन" नहीं। युवाओं को विवाह की पवित्रता और जिम्मेदारियों को समझकर ही इस संस्था में प्रवेश करना चाहिए।👣💞
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