Ankit Seth
14/07/2026
सावन की अंधियारी रात है। कमरे में लेटी मीनू बिना पल्लों वाली खिड़की से बाहर आसमान को निहार रही है। तभी घने बादलों की ओट से बारिश का झोंका उसके चेहरे को भिगोते हुए गुजर जाता है।
अभी थोड़ी देर पहले उसने नमक, मिर्च और लहसुन की चटनी गोंइठे में सेंकी लिट्टी के साथ खायी है, जिसकी तीखी तासीर अब तक जब़ान महसूस कर रही है।
तभी मोबाइल की घंटी बजती है।
दो महीने पहले कमाने के लिए दिल्ली गये उसके पति का फोन है।
"हैलो!"
दूसरी तरफ से पति की भारी आवाज सुनकर उसका मन बैठ गया!
"क्या बात है जी?"
प्रत्युत्तर में दूसरी तरफ से रुलाई फूट पड़ी!
"ये क्या! आप हम औरतों की तरह रो रहे हैं! अभी घर से गये दो महीने ही तो हुए हैं!"
"वो बात नहीं है रे!"
"फिर रो क्यों रहे हैं! जानते हैं ना, कितनी मुश्किल से आपकी नौकरी पाहुन ने लगवायी है! अब हमारे दिन भी फिर जायेंगे इस नौकरी से! रोइये मत, मन लगाकर काम कीजिये!"
"तुम बात नहीं समझ रही!"
"क्या नहीं समझ रही! बाइस हजार की नौकरी मिलेगी कहीं!"
"पर बाइस मिल कहाँ रहे हैं!"
"क्या!"--मीनू को सहसा विश्वास नहीं हुआ--"पाहुन ने तो बाइस ही कहा था!"
"पाहुन ने गलत नहीं कहा था!"
"फिर...!"
"तुम्हें तो पता है कि हमारी कंपनी एक सरकारी उपक्रम के पार्ट्स ठेके पे बनाती है!"
"हाँ, तो...!"
"उसके हेड ने हमारे सुपरवाइजर से मैसेज भिजवाया है! महीने के पाँच हजार उसको चाहिए!"
मीनू का पारा चढ़ा--"ऐसे कैसे भला! मेहनत आपकी और बाइस में पाँच उसके!"
"यहाँ का यही रिवाज है!"
"भांड़ में गया ऐसा रिवाज! वो हेड कौन जात का है मुँहझौंसा?"
"जात तो नहीं पता, पर हमारे प्रदेश को लेकर बड़ा उल्टा-सीधा बोल रहा था!"
"आपको?"
"नहीं! मेरे सुपरवाइजर को। कह रहा था, ऐसे काम के लिए दिल्ली में पंद्रह-सोलह हजार बहुत हैं, और तुम बाइस पर ठीक किये हो! वो एक्स्ट्रा पाँच हजार मुझे चाहिए!"
"सुपरवाइजर ने क्या कहा!"
"वो बिचारा क्या कहेगा! उसने तो खुद मन बनाया था कि महीने के एक हजार लेगा मुझसे! पर अब कह रहा है कि जब हेड ने ही इतना बड़ा मुँह खोल दिया तो मैं क्या कहूँ!"
"तो आप हेड की शिकायत ऊपर कीजिए! उससे भी बड़े पद पर तो लोग होंगे ना!"
"कोई फायदा नहीं! वो भी नीचे वाले सिक्योरिटी गार्ड, रसोइये और माली वगैरह से रुपये बाँधे हैं महीने के! मैं शिकायत करुंगा तो हेड मेरे काम में जानबूझकर मीनमेख निकालेगा और नौकरी खा जायेगा!"
"तनख्वाह कितनी है उस पापी की?"
"डेढ़ लाख!"
"फिर भी पेट नहीं भरता उस मुँहझौंसे का! आप उससे अपनी परिस्थिति तो बताइये, शायद तरस खा जाये!"
"सुपरवाइजर ने कहा था कि गरीब बंदा है। गाँव में बीवी-बच्चे किसी तरह गुजर-बसर कर रहे हैं, छोड़ दीजिए इसे!"
"तो क्या कहा उसने?"
"कहता है, नहीं छोड़ सकता! सबसे जो लेता है!"
"तो क्या करेंगे? छोड़ देंगे नौकरी?"
"दूसरी इतनी आसानी से कहाँ मिलेगी रे! मान कर चलो कि मुझे सत्रह ही मिल रहे हैं!"
"कैसे मान लूं जी! साल के साठ हजार होते हैं खून-पसीने की कमाई के! मैं तो समझती थी कि ये घूस-फूस का चक्कर बस सरकारी नौकरी में ही चलता है, पर प्राइवेट में भी...!"
"आदमी, बस आदमी होता है रे! सरकारी या प्राइवेट होने से उसकी नीयत थोड़े बदलती है!"
"अब क्या करेंगे आप? इससे अच्छा तो कोई धंधा ही कर लेते!"
"नौकरी करुंगा, और क्या! बाकी धंधा करने की सलाह तो सभी देते हैं, मानो इसमें कुछ लगता ही नहीं!"
"क्या हो गया है इस समाज को!"
जहाँ डेथ सर्टिफिकेट तक बनवाने के लिए पैसे देने पड़ते हों, जहाँ किसी का पति मरा हो, उसकी पत्नी को पेंशन चालू करवाने के लिए चढ़ावा चढ़ाना पड़ता हो, उस सिस्टम और समाज से क्या ही आस करें हम नैतिकता की! ये अच्छा फल मिल रहा है मन लगाकर काम करने का!"
कुछ देर तक मीनू के मुँह से बोल ना फूटे! फिर उसने एक गहरी साँस ली....
"ठीक है, देते रहिये उसे हर महीने पाँच हजार! किसी दूसरे की मेहनत का हक मारने वाला! कीड़े पड़ेंगे उस मुँहझौंसे को! एक दिन भगवान उसका भी न्याय करेंगे...!"*
13/07/2026
मोक्ष की तलाश
मैं अपने बीमार और वृद्ध पिता को काशी के मुक्ति भवन ले जा रहा था। मन में एक ही उम्मीद थी—शायद वहाँ जाकर उनका जल्दी देहांत हो जाए।
ऐसा नहीं था कि मैं वहाँ जाना चाहता था। लेकिन पिता की लगातार बीमारी, उनकी बढ़ती कमजोरी और दवाइयों तथा इलाज का अंतहीन खर्च मुझे भीतर तक तोड़ चुका था।
उनकी देखभाल में मैं अपनी सामर्थ्य से कहीं अधिक खर्च कर चुका था, और अब मुझे लगने लगा था कि मैं यह सब और नहीं कर पाऊँगा।
उसी समय मेरे एक घनिष्ठ मित्र ने मुझे काशी के मुक्ति भवन के बारे में बताया।
उसने कहा, “हिंदू मान्यता के अनुसार काशी में मृत्यु होने से मोक्ष प्राप्त होता है। मुक्ति भवन उन सबसे प्रसिद्ध स्थानों में से एक है, जहाँ लोग अपने जीवन के अंतिम दिन बिताने आते हैं। अगर तुम अपने पिता को वहाँ ले जाओगे, तो तुम्हें भी शांति मिलेगी और तुम्हारे पिता को भी मोक्ष प्राप्त होगा।”
और एक दिन मैं अपने पिता को लेकर ट्रेन में बैठ गया।
पिता खिड़की के पास बैठे बाहर देख रहे थे। उनके चेहरे पर थकान साफ़ झलक रही थी, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब-सी शांति थी।
उन्होंने मुस्कुराकर पूछा,
“बेटा, हम कहाँ जा रहे हैं?”
मैंने उत्तर दिया,
“काशी।”
“काशी? अरे, मेरे महादेव! इस यात्रा की इच्छा तो मुझे न जाने कितने वर्षों से थी।”
उनके चेहरे पर फैलती खुशी ने मेरे हृदय को चीर दिया। लेकिन मैंने अपने मन को कठोर बनाए रखा।
पूरे सफ़र में पिता बीते दिनों की बातें करते रहे।
उन्होंने बताया कि बचपन में जब मुझे तेज़ बुखार आया था,
तो वे कई रातें अस्पताल में मेरे सिरहाने बैठे रहे थे।
उन्होंने याद दिलाया कि मेरी माँ ने मेरी स्कूल की फीस भरने के लिए अपने कंगन बेच दिए थे।
उन्होंने यह भी बताया कि मुझे साइकिल दिलाने के लिए वे रात-रात भर ऑटो-रिक्शा चलाते रहे थे।
मैं सब सुनता रहा।
लेकिन मेरे पास कहने के लिए बहुत कम शब्द थे।
लंबी यात्रा के बाद हम वाराणसी पहुँचे और मुक्ति भवन पहुँचे।
मैंने सोचा था कि वहाँ मौत जैसी भयावह खामोशी होगी।
लेकिन वहाँ जो देखा, वह बिल्कुल अलग था।
छोटे-छोटे कमरे।
सफेद दीवारें।
धीरे-धीरे घूमते पुराने पंखे।
गलियारों में साधु-संत उन लोगों के लिए मंत्रोच्चार कर रहे थे, जो अपनी अंतिम घड़ियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मैंने पिता को उनके कमरे में आराम से लिटा दिया।
उन्होंने कहा,
“मैं बहुत थक गया हूँ, बेटा। थोड़ी देर सोने दो।”
मैंने सिर हिला दिया।
जैसे ही वे सो गए, मैंने अपना बैग उठाया और चुपचाप बाहर निकल पड़ा।
बिना पीछे मुड़े तेज़ी से चलते हुए मेरी नज़र एक आधे खुले कमरे पर पड़ी।
अंदर एक वृद्ध व्यक्ति खिड़की के पास बैठा था। उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—शायद उसकी पत्नी या बच्चों की। वह बार-बार तस्वीर को देखता और हल्की मुस्कान बिखेर देता।
दूसरे कमरे में एक बुज़ुर्ग महिला आँखें बंद किए हाथ में माला लिए भगवान का नाम जप रही थी।
उसके पास कोई नहीं था।
लेकिन वह अकेली भी नहीं थी।
उसकी यादें उसके साथ थीं।
गलियारे के अंत में एक वृद्ध पिता बिस्तर पर लेटे थे।
उनके पास एक युवक उनका हाथ पकड़े बैठा था।
वह बार-बार कह रहा था,
“पिताजी… मैं यहीं हूँ। डरिए मत।”
मुझे नहीं पता कि वृद्ध पिता उसकी आवाज़ सुन पा रहे थे या नहीं।
लेकिन बेटे की आवाज़ में प्रेम साफ़ महसूस हो रहा था।
वहाँ मौजूद हर व्यक्ति मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।
लेकिन मुझे लगा, उनमें से अधिकांश किसी और चीज़ की प्रतीक्षा कर रहे थे।
एक फ़ोन कॉल की।
किसी अपने के आने की।
बेटे के दो सांत्वना भरे शब्दों की।
या बेटी की उस पुकार की—
“पिताजी…”
असल में वे उसी का इंतज़ार कर रहे थे।
तभी वहाँ काम करने वाले एक कर्मचारी ने मुझसे कहा,
“साहब, यहाँ आने वाले ज़्यादातर लोग मौत से नहीं डरते। उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की होती है कि उनके अपने उन्हें भूल चुके हैं। लोग कहते हैं कि यहाँ मरने से मोक्ष मिलता है, लेकिन अपने बच्चों के बीच प्रेम और सम्मान के साथ मृत्यु पाने और यहाँ अकेले मरने में बहुत बड़ा अंतर है।”
वह आगे बोला,
“यहाँ आने वाले कई लोग बीमारी से कम, और इस एहसास से ज़्यादा मर जाते हैं कि उनके बच्चों ने उन्हें छोड़ दिया है।”
उसकी बातें सुनकर मैं भीतर तक हिल गया।
मैंने चारों ओर देखा।
कुछ आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं—
मानो किसी के आने का इंतज़ार हो।
कुछ आँखें आसमान की ओर थीं—
मानो कोई पुकार ले।
और कुछ आँखों में अब कोई उम्मीद नहीं बची थी।
सिर्फ़ इंतज़ार।
अचानक मुझे अपने पिता का ख़याल आया।
मैं दौड़ता हुआ वापस उनके कमरे में पहुँचा।
वे पसीने से भीगे हुए बिस्तर पर बैठे थे।
बहुत कमज़ोर दिखाई दे रहे थे।
और वे भी उसी खुले दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे।
जैसे ही उन्होंने मुझे देखा, उन्होंने राहत की लंबी साँस ली।
उसी क्षण मेरे मन में विचार आया—
अगर मैं अभी चला जाता, तो क्या कल मेरे पिता भी उसी दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए किसी का इंतज़ार करने वाले एक और चेहरे में बदल नहीं जाते?
उस पल मुक्ति भवन मुझे केवल एक इमारत नहीं लगा।
वह उन लोगों की मौन दुनिया लगी, जिन्होंने पूरी ज़िंदगी दूसरों के लिए जी, और अंत में केवल एक अंतिम स्पर्श, थोड़ा-सा प्रेम और अपनेपन का इंतज़ार करते रह गए।
मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि पिता ने पुकारा—
“बेटा…”
“जी, पिताजी?”
“तुम… गए नहीं?”
“मैं कहाँ जाता?”
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“मुझे पता है… तुम मुझे यहाँ छोड़ने ही लाए थे।”
कुछ पल रुककर बोले,
“लेकिन मैं तुम्हें दोष नहीं देता। जब माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, तो कभी-कभी अपने बच्चों पर बोझ बन जाते हैं। शायद मैं भी तुम्हारे लिए बोझ बन गया हूँ।”
फिर उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
“लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, बेटा…”
“माता-पिता का सबसे बड़ा मोक्ष काशी में मरना नहीं है…”
“उनके बच्चों के दिल से कभी न निकलना ही उनका सच्चा मोक्ष है।”
“मुझसे नफ़रत मत करना, बेटा। मेरे जाने के बाद मेरे अंतिम संस्कार और सारे कर्मकांड कर देना।”
उनकी बातें मेरे हृदय को चीर गईं।
फिर उन्होंने कहा,
“ज़्यादा देर मत रुकना, बेटा। अगर जाना हो तो चले जाना… लेकिन जाने से पहले अपने पिता को एक बार गले लगा लेना… और एक प्यार दे देना। तुम्हें एक बार फिर बाँहों में भर लेने का मन कर रहा है।”
उनकी यह अंतिम इच्छा थी।
“पिताजी…”
मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।
मेरी वर्षों की स्वार्थपरता, मेरे सारे हिसाब-किताब, मेरे आँसुओं में बह गए।
उस रात मैं मुक्ति भवन के उसी कमरे में अपने पिता के पास सोया।
उनके सोते हुए चेहरे की झुर्रियों को देखते-देखते मुझे एक सच्चाई समझ में आई—
मेरे जीवन की सबसे सुरक्षित जगह कभी इन्हीं के कंधे थे।
डर लगता था तो यही मुझे अपनी बाँहों में उठा लेते थे।
गिर जाता था तो यही संभालते थे।
हार जाता था तो यही मेरा हाथ पकड़कर खड़े हो जाते थे।
फिर मैं इन्हें इनके जीवन की अंतिम घड़ियों में अकेला कैसे छोड़ सकता था?
अगली सुबह मैंने घर लौटने के टिकट बुक कर लिए।
जब हम जाने लगे, तो मुक्ति भवन के कर्मचारियों ने पिता की शांतिपूर्ण मृत्यु के लिए साधुओं को बुलाया।
मैंने उन्हें रोक दिया।
मैंने कहा,
“अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।”
“मोक्ष मेरे पिता को नहीं मिला है…”
“मोक्ष तो मुझे मिला है।”
पिता ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।
“क्या मतलब है तुम्हारा, बेटा?”
मैंने उनका हाथ थाम लिया।
“चलिए, पिताजी… घर चलते हैं। लेकिन पहले गंगा स्नान करेंगे और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करेंगे।”
उन्होंने मासूमियत से पूछा,
“तो… मुझे यहाँ नहीं रहना पड़ेगा?”
मैं मुस्कुरा दिया।
“आप क्यों रहेंगे?”
“जिसे मुक्ति की ज़रूरत थी, वह आप नहीं थे…”
“वह मेरा मन था… जिसने अपने ही पिता को बोझ समझ लिया था।”
पिता की आँखों से आँसू बह निकले।
उस क्षण काशी के मंदिरों की घंटियों से भी अधिक पवित्र वह मौन आँसू था, जो उस वृद्ध पिता के चेहरे पर लुढ़क आया।
— “मोक्ष की तलाश”
सभी बच्चों और सभी पिताओं को समर्पित।
13/07/2026
मुख्य सड़क पर सैकड़ों एकड़ में बना सरकारी प्लांट। सुबह-शाम काम करने वालों की इतनी भीड़ जमा होती है कि देखकर मेले का भ्रम होता है।
सिर पे पीली टोपी लगाये, हाथ में साधारण सा झोला लटकाये जिसमें टिफिन होता है, लोग ड्यूटी पकड़ने के लिए भागते नजर आते हैं!
देर शाम उस रास्ते से गुजर रहा था।
सामने रेलवे क्रासिंग पर गेट बंद था सो रुकना पड़ा। तभी पीछे से एक तेज आवाज गूँजी....
"गाँव जा रहे हैं क्या?"
मैंने पलटकर देखा! वो मेरे पड़ोसी गाँव का एक युवा था, मजदूर के वेष में!
"हाँ, जा तो रहा हूँ!"
"मुझे भी लेते चलेंगे?"--उसकी आवाज में कातरता थी।
तो मैं बोला "बैठ जाओ भई!"
उसका चेहरा खिल उठा।
क्रासिंग के कुछ आगे ही बस स्टैंड था। उसने धीरे से कहा...
"बस दो मिनट के लिए रुकियेगा?"
"कुछ काम है?"
"घर के लिए पेड़े लेने हैं!"
मैंने मोटरसाइकिल रोक दी!
वो तेजी से सामने की दुकान में गया और जल्दी ही लौट आया!
"पेड़े ले लिए?"--मेरी नजर उसके खाली हाथ पर थी।
"हाँ!"--वो जेब को थपथपाते हुए मुस्कराया।
मैंने कहा कुछ नहीं, बस उसे देखता रहा!
उसने मेरी मन की बात पकड़ ली....
"बस चार ही लेने थे। दुकानदार ने कागज में लपेटकर दे दिए तो जेब में रख लिया!"
मैने कहा "बस चार....!"
"बहुत हैं जी!"
मैं फिर चुप लगा गया!
वो समझ गया.... और बोला
"दो बच्चों के लिए, एक माँ और एक बीवी के लिए!"
"और तुम...?"
"मेरा क्या! कह दूँगा कि मैंने दुकान पर खा लिए!"
फिर मैने पूछा "यहाँ कब से काम कर रहे हो?"
"चार साल हो गए जी! पंद्रह-सोलह हजार बन जाते हैं महीने के! दिल्ली-बंबई जा के इससे ज्यादे थोड़े कमा लूँगा!"
"बात तो सही कह रहे हो! डेली आते हो या रुकते हो यहीं!"
"रोज बस से आ जाता हूँ जी, पच्चीस रुपये एक तरफ का भाड़ा लगता है!"
"हम्म!"
"आज आपने बैठा लिया तो पच्चीस रुपये बच गये मेरे! जिस दिन आप जैसा कोई मिल जाता है, उस दिन बचे पैसों से पेड़े खरीद लेता हूँ! माँ भी खुश और बीवी-बच्चे भी! आखिर उनको भी तो आसरा लगा होता होगा कि शाम को मैं उनके लिए कुछ लाऊँगा!"
"हूँ...!"
फिर उसने बोला "पर रोज ये कहाँ संभव है जी! घर भी तो चलाना होता है!"
मैने कहा "कोई बात नहीं भाई....जैसे भी हालात हों, खुश रहना चाहिए!"
"खुश हूँ जी, बहुत खुश! पैसा भले कम है, पर अपने मेहनत की कमाई है, किसी के आगे हाथ तो नहीं फैलाना पड़ता!"
मैने कहा "चलो, अगले बस स्टैंड पर हम इकट्ठे मिठाई खायेंगे!"
"ना जी ना! आदत बिगड़ जायेगी मेरी! वैसे भी मेरी उमर अब बच्चों वाली तो रही नहीं! दो दो पीढ़ियों को देखना है! वो खुश रहें, तो मैं ऐसे ही खुश हूँ! आज आपकी वजह से घर पर पेड़े ले जा रहा हूँ, यही बहुत है!"
मेरे पास कहने को कुछ नहीं बचा था, पर सीखने को बहुत कुछ ।
Ankit Seth
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11/07/2026
13 जुलाई 2002 का दिन। लॉर्ड्स का ऐतिहासिक मैदान। और उस दिन इस मैदान पर जो हुआ, वो किसी चमत्कार से कम नहीं।
यह त्रिकोणीय सीरीज नेटवेस्ट ट्रॉफी का फाइनल था। इंग्लैंड ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी चुनी। जहीर खान ने निक नाइट के रूप में पहली सफलता जल्दी दिला दी। लेकिन, इसके बाद मार्कस ट्रेस्कोथिक और कप्तान नासिर हुसैन ने भारतीय गेंदबाजों की जमकर धुनाई कर दी। दोनों ने धुआंधार शतक ठोक दिए। फ्लिंटॉफ ने भी 40 रनों की छोटी मगर, तेज पारी खेली।
50 ओवर खत्म हुए। स्कोरबोर्ड पर 325 रन चमक रहे थे। आज चेज करने के लिए ये स्कोर हलुआ लगता था। लेकिन, 1990 और 2000 के शुरुआती दशक में 300 प्लस का कोई भी स्कोर जीत की गारंटी होता था। पिचें गेंदबाजों की मददगार रहती थीं। और एक ही गेंद से पूरे 50 ओवर फेंके जाते थे। यानी रिवर्स स्विंग की संभावना भी भरपूर रहती, शॉट लगाना मुश्किल हो जाता।
ऐसे में लॉर्ड्स की पिच पर 326 रन का पीछा करने का मतलब हार तकरीबन तय थी। टीवी स्टूडियो में बैठे एक्सर्ट इंग्लैंड को लगभग विजेता मान चुके थे। भारतीय फैंस भी निराश हो चुके थे। बस किसी चमत्कार की उम्मीद सी थी। इसीलिए लाखों लोग टीवी और रेडियो खोल कर बैठे थे। भारत की तरफ से सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग बल्लेबाजी करने उतरे।
दोनों ने शुरुआत से ही तूफानी इरादे जाहिर कर दिए। सहवाग आदत के मुताबिक बेखौफ थे। लेकिन, उस दिन सौरव गांगुली ज्यादा तूफानी खेल रहे थे। पहला विकेट दादा के रूप में ही गिरा। लेकिन, वो 43 गेंदों पर 60 रन ठोक चुके थे। फिर भी स्कोर इतना बड़ा था कि आउट होने की हताशा उन्होंने अपने एक्सप्रेशन से जाहिर कर दी।
गांगुली का विकेट 15वें ओवर में गिरा। स्कोर बोर्ड पर 106 रन टंग गए थे। अगले 9 ओवर में भारत ने 40 रन जोड़े। लेकिन, विकेट 4 गंवा दिए। सहवाग, मोंगिया, द्रविड़ और खुद मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर पवेलियन में थे। इंग्लैंड के खिलाड़ियों के चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। भारतीय प्रशंसकों की जीत की उम्मीदें खत्म थीं। टीवी और रेडियो बंद हो रहे थे। शायद अब चमत्कार की उम्मीद का दीया भी बुझ गया था।
अब बल्लेबाजों के नाम पर बस आखिरी जोड़ी थी, नौजवान युवराज सिंह और मोहम्मद कैफ। दोनों ने इससे पहले गिनती के मैच खेले थे। ऐसे में फैंस को भी पता था कि उनसे अब 326 तक ले जाने की उम्मीद करना नाइंसाफी ही होगी। बहरहाल, युवी और कैफ ने सिंगल डबल करके खेलना शुरू किया।
विकेट गिरने के बावजूद एक अच्छी बात थी कि रन रेट 6 से ऊपर था। इसका मतलब युवी और कैफ पर ये दबाव नहीं था कि उन्हें बहुत तूफानी खेलना है। उन्होंने अच्छी गेंदों को सम्मान दिया और कमजोर गेंदों को बाउंड्री पार भेजा। दोनों स्कोर को 267 तक ले गए। लॉर्ड्स में हंगामा सा मच गया। रेडियो और टीवी फिर से ऑन होने लगे। दुआओं का सिलसिला शुरू हो गया।
विपक्षी कप्तान नासिर हुसैन के चेहरे पर शिकन दिखने लगी। तड़ा-तड़ा फील्डिंग और गेंदबाजी में बदलाव होने लगे। कामयाबी 41वें ओवर की चौथी गेंद पर कॉलिंगवुड ने दिलाई, युवराज सिंह को आउट करके। युवी के 63 गेंदों पर 69 रन ने भारत को जीत के काफी करीब पहुंचा दिया। अब 50 गेंद पर सिर्फ 59 रनों की दरकार थी। लेकिन, समस्या थी कि अब टेलेंडर का आना शुरू हो गया।
हरभजन ने एक छक्के समेत 15 रन बनाए और कैफ के साथ मिलकर टीम को जीत की दहलीज पर पहुंचा दिया। उनका विकेट जब गिरा, तो भारत को 15 गेंद पर सिर्फ 11 रन चाहिए थे। लेकिन, भारतीय फैंस की दिल धड़कनें अनिल कुंबले के विकेट ने बढ़ा दी, जो फ्लिंटॉफ के उसी ओवर में जीरो पर आउट हो गए। एक बार फिर लगा कि अब शायद मैच हाथ से निकल जाएगा।
बहरहाल, ऐसा हुआ नहीं। आखिरी ओवर की तीसरी गेंद पर जहीर ने कवर की तरफ पुश किया और तेजी से सिंगल के लिए भागे। ओवर थ्रो हुआ और दूसरा रन लेकर भी मैच जीत लिया। गेंदबाजी कर रहे एंड्रयू फ्लिटॉफ पिच पर बैठ गए।
उधर गांगुली ने लॉर्ड्स की बालकनी में टी-उतारकर हवा में लहरा दी।
ये फ्लिंटॉफ को ही जवाब था, जिन्होंने उससे पहले वानखेड़े के मैच में भारत की हार पर मैदान में टीशर्ट उतारकर जश्न मनाया था।
गांगुली की बायोपिक के पोस्टर में उसी लॉर्ड्स का टीशर्ट उतारने वाला सीन है। लेकिन, वो मोमेंट कितना अद्भुत था, उसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि राजकुमार राव जैसा अभिनेता भी उस भाव को अपने चेहरे पर नहीं ला सके। राजकुमार के चेहरे पर गुस्से वाला भाव लग रहा है। जबकि गांगुली का एक्सप्रेशन बदला लेने के बाद कलेजे को मिलने वाले सुकून जैसा था।
मुझे लगता है कि उस मैच को दोहराना जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल दादा के उस एक्सप्रेशन की नकल करना है। शायद अब खुद दादा भी अपने उस कालजयी एक्सप्रेशन को कॉपी न कर पाए। उसके बाद से बहुत बड़े-बड़े स्कोर चेज हो गए और आगे भी होंगे। लेकिन, लॉर्ड्स की बालकनी में जर्सी लहराने का वो इकलौता ही लम्हा रहेगा।
#हाल_ए_दिल
चैत का महीना खत्म होने को है, गांव-जवार से लेकर खेत-खलिहानों तक आग बरस रही है! ऐसी ही एक दुपहरी कस्बे के छोटे से बाजार में अपने पिता की अंगुली पकड़े 11-12 साल का एक लड़का कोल्डड्रिंक की दुकान के सामने रुकता है...
"पापा, वो हरे रंग वाली बोतल! पिला दो ना, प्यास लगी है!"
"एकदम आशिक है कोल्डड्रिंक का तू! बहुत पसंद है ना तुझे?"--पिता ने बेटे को छेड़ा!
"बहुत पापा! पर क्या करुं, तुम घर नहीं होते तो माँ इसे नहीं खरीदती!"
"ओह! कल तो मैं कलकत्ते चला जाऊंगा, फिर कौन पिलायेगा तुझे!"--पिता की आँखें गीली हुई!
"तब मैं मन को मना लूंगा ना!"--बेटे का भोला स्वर!
फिर बाप-बेटे ने एक एक बोतल स्प्राइट पी!
"ये सौ रुपये रख ले, माँ को मत बताना! जब मन करे, गाँव के बाजार में जाकर पी लेना!
*******
आषाढ़ का महीना!
पिता कलकत्ते आकर फैक्ट्री के काम में मशगूल हो चुका है!
शाम के समय काम से छुट्टी भी मिली और महीने की पगार भी! अपने मजदूर साथियों के संग वो डेरे पर जाने को निकला!
"ओफ्फ! बड़ी उमस है आज तो, चल ना, ठंडा पीते हैं!"--एक साथी ने प्रस्ताव रखा! बाकियों ने समर्थन किया!
पिता ने दृढ़ता से इंकार में सर हिलाया--"ना ना, मैं नहीं पीता, गला बैठ जाता है मेरा!"
बाकियों ने चुहल की--"पैसा सर पर लाद कर उपर नहीं ले जायेगा यार! हम ये हाड़तोड़ मेहनत इसीलिए करते हैं ताकि कभी-कभार ही सही, जीवन का आनंद ले सकें!"
पर पिता को इन बातों से फर्क ना पड़ा! वो जल्दी से हाथ छुड़ाकर अपने डेरे पर पहुंचा और बेटे को फोन मिलाया--
"और सुनाओ बेटे, जो पैसा दिया है तुमको, उसका कोल्डड्रिंक पी रहे हो कि नहीं!"
"बस सौ रुपये ही तो हैं पापा, ऐसे पीऊंगा तो कितने दिन चलेंगे...!"
पिता ने फोन काट दिया--"ना ना, वहाँ मेरा बेटा नहीं पी रहा तो फिर मैं बड़ा होकर यहाँ कैसे पी सकता हूँ! पिछली बार उसी के साथ पी थी, अबकी दशहरे में घर जाऊंगा तो बड़ी बोतल ले चलूंगा, फिर बाप-बेटे दोनों एक साथ...!"
******
क्वार का महीना!
इधर कस्बे के टेसन पर उतरकर उत्साह से भरे पिता ने स्प्राइट की बड़ी बोतल ली और उधर बेटा स्कूल से छूटते ही भागकर गाँव के बाजार में गंगा साह की दुकान पर पहुंचा! पिता के दिये सौ रुपये, जिसे उसने महीनों से जतन से संभाल रखा था, आज उसे खर्चने का टाइम आ गया था!
शाम के समय दोनों ने अपने अपने पास से बोतल निकालते हुए एक-दूसरे को सरप्राइज दिया!
"क्यों रे! इतनी बड़ी बोतल के लिए पैसे कहाँ से आये तुम्हारे पास! माँ ने पैसे दिये थे!"--बाप की आँखों में हैरत थी।
"शशश धीरे बोलो पापा, वो सुन लेगी! आपने पिछली बार जाते समय जो सौ का नोट दिया था, उसी से लिया है!"--बेटे ने सरगोशी की।
"पागल, वो पैसे तुम्हें ठंडा पीने को दिये थे ना, अब तक क्यों बचाकर रखा?"
"अकेले कैसे पीता पापा!"
"क्यों, वो तो तुम्हें बहुत पसंद है!"
"पर आपसे ज्यादा थोड़े पापा! आप तो आठ आठ-नौ नौ महीनों के लिए कलकत्ते चले जाते हैं, ऐसे में आपका दिया पैसा ही तो निशानी होती है आपकी! जब जब आपकी याद आती है, उसे चुपके से एक नजर देख लेता हूँ! ऐसे कैसे खर्च देता उसे! "--बेटे की आँखें भी पनीली हो गयीं!
"बहुत सयाना हो गया है रे तू! कहाँ से सीखा है ये सब?"
"आप पिता हैं ना! अगर मेरी जगह आप होते, तब समझते ये बात! वैसे आप तो कलकत्ते में खूब पीते होंगे ये?"
बाप चुप!
"बोलिये ना पापा!"
"क्या बोलूं, तू बेटा है ना, इसलिए नहीं समझेगा! अगर मेरी जगह तू होता, तब समझता कि मेरे दिल पर क्या गुजरती है वहाँ!"
फिर दोनों मौन हो गये!
हाल-ए-दिल...
जो ना किसी से कहते बनता है और ना ही छुपाते, पर जीना पड़ता है खुद की ही सुनते, खुद को ही सुनाते! जिंदगी की कुछ विचित्रतायें और कुछ भावनायें कभी शब्दों की आँच पर नहीं सींझती, अधपकी रहना उनकी नियति होती है!*
बहुत दिन बाद बारिश में भीगने का मौका मिला ☺️😍 ।
10/07/2026
नकचढ़ी....
पिछले महीने जब भयंकर गर्मी पड़ रही थी, एक जरुरी कार्यवश सरकारी कार्यालय जाना हुआ!
गेट पर बंदूकधारी दरवान सोचों में गुम ऐसी मुखमुद्रा बनाये बैठा था, कि उसे देखकर शायर होने का भ्रम हो रहा था! जिसका मन अंदर आये, जिसका मन बाहर जाये! बंदूक भी ऐसी, मानो सन् सत्तावन की क्रांति में जब्त हुई हो!
खैर, अंदर पहुँचा!
कर्मी अपने अपने काउंटर पर काम में मशगूल थे! सीलिंग फैन इतनी नजाकत से चल रहे थे कि आप उनके डैने आराम से गिन सकते थे!
अब काम करवाने के लिए किसी ना किसी से तो संपर्क करना ही था! सो मैंने हॉल में नजरें दौड़ायीं!
खुदा का करम! मजाल कि एक भी बंदे के चेहरे पे रौनक हो! अब आदमी कुछ पूछे तो किससे पूछे! क्या पता कहीं मुँह खोले, और सामने वाला उसमें सुर्ती झोंक दे!
मैंने हॉल में चारों तरफ नजरें दौड़ायीं!
अचानक मेरा चेहरा खिल उठा!
कार्यालय अधीक्षक के केबिन से ठीक सटा हुआ एक टेबल था, जिस पर एक निहायत ही खूबसूरत मोहतरमा विराजमान थीं!
मन तो कर रहा कि उनकी खूबसूरती का नख-शिख वर्णन करुं, पर जाने देता हूँ! आप मेरे बारे में गलत धारणा बनायेंगे!
तो मैंने भी अपने चेहरे पर मंद मंद मुस्कान बिखेरी और उनके सामने जा खड़ा हुआ...
"मैडम जी!"
"........!"--मैडमजी ने बोलना तो दूर, मुंडी तक ऊपर ना की।
"मैडमजी! एक काम है!"
"तो मैं क्या यहाँ कुर्सी तोड़ रही हूँ!"--पहला ही वाक्य इतना कर्कश था कि मेरी सारी उम्मीदें सरकारी पुल की तरह भरभराकर गिर पड़ीं।
"माफ कीजिए मैडम, मेरा ये मतलब नहीं था!"
"देखो, मैं यहाँ काम करने बैठी हूँ, मतलब निकालने नहीं!"
"मैं भी तो वही काम करवाने आया हूँ मैडम!"
"काउंटर नंबर तीन पर जाइये!"
"पर आपने अभी ये तो पूछा ही नहीं कि मुझे क्या काम है!"
"पूछने को तो मैं अच्छे-अच्छों को नहीं पूछती, तुम क्या चीज हो!"
"मैं चीज नहीं, आदमी हूँ मैडम!"
"तो मुझे जानवर समझे हो क्या! काउंटर नंबर तीन पर जाओ!"
अपमान के मारे मेरा चेहरा लाल हो गया! तभी बगल में खड़े तीन-चार लोगों को आपदा में अवसर सूझा! उन्हें मैडम की तवज्जो हासिल करने का अच्छा अवसर हाथ आया था...
"क्या मैडम! कैसे कैसे लोग चले आते हैं आपको परेशान करने!"
फिर सबकी सम्मिलित हँसी गूँजी!
मैंने मैडम के पैरों पर निगाह मारी! नया नकोर सैंडिल चमचमा रहा था! अब आगे कुछ कहने की हिम्मतनहीं पड़ी, सो चुपचाप काउंटर नंबर तीन की ओर बढ़ चला!
संभवत: वहाँ का कर्मी मुझे पहले से ही देख रहा था! पास पहुँचा तो वो धूर्तता से मुस्कराया...
"सर, एक काम है!"
"ऐसा करिये, मैं तो अभी बिजी हूँ! आप उन मैडम के पास चले जाइये!"
"प्रभो! मैं वहीं से आ रहा हूँ! उन्होंने ही आपके पास भेजा है!"
"मतलब काम नहीं हुआ?"
"काम! अरे प्रभो, बस यूँ समझिये कि कयामत झेलकर आ पाया हूँ आपके पास!"
खैर! उसने मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनी और मिनटों में समस्या का निवारण कर दिया!
मेरा काम हो चुका था! पर निकलते निकलते जाने क्या सूझा कि दुबारा मैडम के पास चला गया...
"तुम फिर आ गये?"
"वो क्या है ना मैडम, कि उन्होंने एक बार फिर से मुझे आपके पास ही भेज दिया है! कह रहे हैं कि जाकर उस नकचढ़ी से एक बार फिर रिक्वेस्ट कीजिए!"
"नकचढ़ी!"--मैडम का पारा हाई हुआ! तत्क्षण उन्होंने अधीक्षक की खिड़की में झांका--"सर! मना कर दीजिए उस बंदरमुंहे को कि मुझे तंग ना किया करे, नहीं तो किसी दिन मैं उसके थोबड़े को ट्रक का हुड बना दूँगी!"
"पर हुआ क्या!"--अंदर से कार्यालय अधीक्षक की मरियल आवाज गूँजी।
"अपना सारा वर्कलोड मुझ पर डाल रहा है!"
"अच्छा, कोई बात नहीं! थोड़ा मैनेज कर लीजिए!"
इतना सुनने भर की देर थी! मैडम अगियाबैताल हो गयीं! फौरन दोनों हाथों से टेबल पर बिखरे सारे कागज पत्तर समेटे और उठ खड़ी हुईं...
"अब मैं अपने काउंटर पर ही काम निपटाऊंगी! देखती हूँ कौन रोकता है मुझे!"
पास खड़े वही तीन-चार लोग हड़बड़ाये--"अरे अरे मैडम! पर हमारा काम तो करते जाइये प्लीज!"
"कत्तई नहीं! मैं अब अपने काउंटर पर ही मिलूंगी!"
मैंने फिर सरगोशी की--"आपका गुस्सा जायज है मैडम! काम नहीं करना, मत करे, पर किसी सुंदर और सुशील महिला को ये तो मत कहे कि उसके पास बस खूबसूरती भर ही है, अक्ल में भैंस से थोड़ी तेज है बस!
सच में बहुत बुरा लगा मुझे आपके लिए!"
फिर वो भनभनाते हुए काउंटर नंबर तीन की ओर बढ़ चलीं! पास खड़े लोगों के चेहरे देखने लायक थे!
"अब निंबुआ चाटो निंबुआ!"--मैंने मन ही मन कहा।
अगले ही पल कार्यालय में हंगामा मच गया!! अधीक्षक को जाना पड़ा बीच-बचाव करने!
मैं फौरन भीड़ में जाकर छुप गया!
कानों म़े तेज तेज आवाज आ रही थी...
"तुम फालतू में बखेड़ा कर रही हो! चुप रहो!"
"तुम चुप रहो, मैं नहीं रहूँगी! कहो तो अभी मैं उस कस्टमर को तुम्हारे सामने लाकर खड़ा कर दूँ!"
"हाँ हाँ, बुलाओ! वो शरीफ लड़का था, झूठ नहीं बोलेगा! तुम्हीं खुन्नस निकाल रही हो उसकी आड़ लेकर!"
म़ै धीरे से बाहर सरक लिया! वैसे भी मैं सज्जन आदमी हूँ, किसी के आपसी वाद-विवाद से मुझे क्या लेना-देना!
उधर गेट पर गार्ड साहब इतना कुछ होने के बावजूद निर्विकार बैठे रहे! मुझे पक्का यकीन हो गया कि हो ना हो, ये गार्ड नहीं, कोई शायर साहब हैं जो बहुत देर से अपना काफिया दुरुस्त करने में मशगूल हैं!*
ये कहानी मुझे फेसबुक पर ही मिली है, यह कहानी बैंक
वर्तमान में हो रहे काम काज को दर्शाता है । थोड़ा फनी 😅
अंदाज में है जो मुझे बहुत अच्छी लगी ।
सोचा आप सभी के साथ शेयर कर दु ।
संध्या आरती जानकी मंदिर सीतामढ़ी ।
09/07/2026
बोर्ड परीक्षा चल रही थी.... नकल रोकने को लेकर कालेज प्रशासन बहुत सजग और सख्त था और उपर से जिले के टॉप कालेज के 12वीं के बच्चों का सेंटर आया था...सो अपनी धाक जमाने के लिए दू-चार शिक्षक दीवार फांद रहे थे!
इन्हीं में से एक गुरुजी कक्ष निरीक्षक बने थे...आज गणित का अंतिम पेपर था... छेदीलाल का पेट सुबहे से उसके कहे में नही था... सो परीक्षा कक्ष में शुरु से ही टसर-मसर कर रहा था और इधर गुरुजी समझ रहे थे कि बच्चा चिट लिए बैठा है...'कुछ भी करने नही देंगे बच्चा! गनीमत इसी में है कि जो लिए हो वो हमें दे दो!'
-'अरे गुरुजी! लिए-दिए कुछ नही है...बस जोर का मैदान लगा है, तनिका दू मिनट के लिये बाहर जाने दीजिए ना हमें!'
...'हें हें हें हें...कत्तई नही! तुम बाहर जाकर चिट फेंकोगे!'
छेदी कुछ देर तक तो शांत बैठा पर जब लगा कि पैंट में फालूदा बन जायेगा तो सरपट भागा फील्ड में झाड़ियों के पीछे...इधर पीछे से गुरुजी ने भी चपरासी को दौड़ाया...'अरे सारे फलनवा! हउ चिट फेंके जात हौ... भाग ओकरे पीछे!'
जब तक चपरासी वहां पहुंचता....छेदी छेर चुका था!
गुरुजी कमरे में से ही चिल्लाये...'अरे का हुआ रे फलनवा?'
-'बताय नाइ सकत साहेब!'
-'समेट के लाओ सब...हम कापी के साथ नत्थी करेंगे!'
-'समेटे लायक नाही है साहेब!'
-धत् सरउ! चाहे जैसे भी हो बटोर के लाओ...हमको इसे रेस्टीकेट करना है!' 'एकदम्मै सनक गये हो का बुढ़ऊ....लायें तो लायें कइसे...चाट कर कि काट कर!'
-'कुछ बोला का रे!'
'ना रे तोर मुंह झौंसो.....!'
-'ना...हमें तो कुछ सुनायी दिया...रुक जा वहीं...हम आवत हैं!'
आवा सारे....तुहुं सूंघ ला.....!'
-"हम पक्कै रेस्टीकेट करेंगे...मानेंगे नै.....चाहे कुच्छौ हो जाय...
कसम संविधान की!"*
08/07/2026
एक्स्ट्रा....
साहब जिला स्तर के पदाधिकारी थे। अच्छी-खासी तनख्वाह होने के बावजूद उनके बारे में ये मशहूर था कि वो पगार को छूते तक नहीं थे! ऐसी कृपा बरस रही थी कि गृहस्थी का खर्च मजे में निकल जा रहा था!
साहब की एक और खूबी थी! पैसा लेकर काम करते थे तो वो भी ऐसे, जैसे अहसान कर रहे हों, ऊपर से धाराप्रवाह नैतिकता का भाषण ऐसा, जिसे सुनकर कान से खून निकलना पक्का था!
एक दिन शाम के समय उसी विभाग की संविदा पर कार्यरत दो महिला कर्मचारी अपने काम से उनके ऑफिस गयीं! साहब ने उन्हें आते हुए खिड़की से ही देख लिया था, नतीजतन कुर्सी को बेड मानकर और पसर गये!
वो बिजी नहीं थे, पर ऐसा दर्शाना जरुरी था, सो उन्हें दरवाजे पर आधे घंटे इंतजार करवाया गया, फिर परमीशन मिली!
दोनों दाँत चियारते हुए अंदर घुसीं....
दुआ-सलाम भई।
साहब उनके कागज का गौर से मुआयना करने लगे....
"आपका स्वेटर बहुत सुंदर है सर जी!"--एक ने खुशामद की।
"मॉल से ली है!"--साहब मुदित भाव से मुस्कराये।
"बहुत कीमत होगी ना सर जी!"
"बहोत!"
"फिर भी कितने की....!"
"जितनी तुमलोगों की महीने भर की पगार है!"--साहब बिहंसे।
दोनों का मुँह खुला रह गया!
"पूरे महीने भर की पगार का बस ये एक स्वेटर!"
"मेरी नहीं, तेरी रे! स्वेटर का दाम तो मेरी एक दिन की तनख्वाह से भी कम है!"
दोनों के चेहरे पर विस्मय के भाव आये! साहब को बल मिला तो दो-चार और हांक दिये!
"एक बात पूछें साहब!"
"एक क्या दो पूछो!"
"आप भी रोटी ही खाते हैं ना!"
"हहहहहहह, और क्या!
पर तुमलोगों की तरह खाली रोटी नहीं!
साथ में एक्स्ट्रा और भी बहुत कुछ!"
"ओ़़ओ़़ओओओओ....!"--दोनों मन ही मन एक्स्ट्रा के बारे में सोचने लगीं!
"ठीक है, अब तुमलोग जाओ! कागज पर सिग्नेचर कर दिया है, बड़े बाबू के यहाँ जमा कर देना!"--साहब ने कागज उनकी ओर बढ़ा दिया!
"सर जी, आप बड़े अच्छे हैं!"
साहब अधमुंदी आँखों से देखते हुए बस मुस्करा भर दिये।
"आपके बाल-बच्चे कितने हैं?"
"तीन हैं!"
"मेरे भी तीन ही हैं साहब!"
"अरी क्या बोल रही है! चुप कर!
ये हमारी तरह संविदा पर नहीं हैं,
साहब हैं!"--दूसरी ने धीरे से फुसफुसाते हुए
पहली को बाहर खींचा!*
Ankit Seth
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