Infinite Yog Academy
21/05/2026
घेरण्ड संहिता के अनुसार त्रिबन्ध (मूलबन्ध, उड्डियान बन्ध और जालंधर बन्ध) का वर्णन—
मूलस्थानं समाकुञ्च्य उड्डियानं तु कारयेत्।
इडां च पिङ्गलां बद्ध्वा जालन्धरमथाचरेत्॥
अनेनैव विधानेन प्राणो याति सुषुम्णगाम्।
त्रिबन्धं यो विजानाति स योगी मुक्तिभाजनम्॥
मूलस्थान को संकुचित करके मूलबन्ध लगाना, उदर को भीतर ऊपर खींचकर उड्डियान बन्ध करना तथा कंठ को संकुचित कर जालंधर बन्ध लगाना चाहिए।
इन तीनों बन्धों के संयुक्त अभ्यास से प्राण सुषुम्णा नाड़ी में प्रवाहित होता है। जो योगी त्रिबन्ध का ज्ञान और अभ्यास करता है, वह उच्च योग सिद्धि और मुक्ति का अधिकारी बनता है। 🕉
🕉 त्रिबन्ध — शरीर, प्राण और चेतना का समन्वय
योग में बन्धों का विशेष महत्व बताया गया है।
जब मूलबन्ध, उड्डियान बन्ध और जालंधर बन्ध का संयुक्त अभ्यास किया जाता है, तो उसे त्रिबन्ध या महाबन्ध कहा जाता है। यह साधना प्राणशक्ति को संतुलित कर सुषुम्ना नाड़ी में प्रवाहित करने में सहायक मानी जाती है।
✨ त्रिबन्ध के प्रमुख लाभ
• मन की स्थिरता और एकाग्रता
• प्राणशक्ति एवं आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि
• ध्यान एवं प्राणायाम में गहराई
• शरीर, मन और चेतना का संतुलन
• योग साधना में उन्नति
योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण साधना है।
नियमित अभ्यास, संयमित जीवनशैली और सकारात्मक विचार ही योग की वास्तविक शक्ति हैं। 🌿
⚠️ बन्धों का अभ्यास सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करें।
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29/03/2026
📬 लखनऊ से सिंगाही, लखीमपुर खीरी तक का 4-5 घंटे के सफर को — 5 साल तक तय किया इस पत्रक ने! 😅
यह पत्र आज मेरे घर पहुँचा है…
सोचिए, अगर यह कोई जरूरी सूचना होती तो क्या होता?
यह सिर्फ एक लेटर नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की धीमी रफ्तार का आईना है।
डिजिटल इंडिया की बात होती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत अभी भी डाक की इस रफ्तार में अटकी हुई है।
🚫 कहाँ है जवाबदेही?
🚫 कहाँ है सिस्टम की निगरानी?
🚫 आम नागरिक की परेशानी की चिंता किसे है?
जब एक साधारण पत्र को पहुँचने में 5 साल लग जाते हैं, तो सोचिए योजनाओं और सुविधाओं का हाल क्या होगा…
👉 सुधार की ज़रूरत सिर्फ तकनीक में नहीं, बल्कि नियत और कार्यप्रणाली में भी है।
26/01/2026
☀️ The real sunrise happens within.
हम रोज़ सूर्य को पूर्व से उगते देखते हैं, लेकिन योग और चेतना का संदेश कुछ और ही कहता है -
एक दिन ऐसा आता है जब सूर्य बाहर नहीं, हमारे भीतर से उदित होता है।
यह संभव होता है अपने गुरुओं के आशीर्वाद से तथा अपने अंदर की योग अग्नि की समझ से -
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👉 असली शक्ति शरीर में नहीं, चेतना में है।
👉 असली ऊर्जा बाहरी साधनों से नहीं, आत्मबोध से आती है।
👉 और असली परिवर्तन ध्यान, साधना और आत्म-अनुशासन से होता है।
जब मन शांत होता है, प्राण संतुलित होते हैं और चेतना जागृत होती है, तब व्यक्ति स्वयं प्रकाश बन जाता है।
यही योग का लक्ष्य है — Outer Success से Inner Awakening तक का सफर।
आज की तेज़ दुनिया में हमें तकनीक से ज़्यादा
🧘♂️ Self-Connection की ज़रूरत है।
"मैं खुद में झाँकने के लिए अपनी ही आँखें गढ़ रहा हूँ -
ताकि बाहर नहीं, भीतर से जीवन को समझ सकूँ।" -
क्योंकि एक दिन सच में ऐसा आता है -
The Sun stops rising in the sky and starts rising in you.
🔹 Are you working only on your career, or also on your consciousness?
सरायकेला-खरसावां जिले के श्रीनाथ विश्वविद्यालय में छात्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘योग से रोजगार’ एवं ‘स्वस्थ भारत’ संकल्प से प्रेरित होकर योग को न केवल करियर का माध्यम बना रहे हैं, बल्कि स्वास्थ्य जागरूकता अभियान के रूप में समाज तक भी पहुँचा रहे हैं।
भारत के उत्तर में स्थित हिमालय की कंदराओं में मंत्र-दृष्टा ऋषियों के गहन चिंतन का परिणाम योग, आज विश्वभर में भारत की पहचान बन चुका है। श्रीनाथ विश्वविद्यालय के युवा योग साधक इस प्राचीन विद्या को आधुनिक जीवन शैली के साथ जोड़कर इसे रोजगार, स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन एवं सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी साधन बना रहे हैं।
विश्व पटल पर योग की बढ़ती स्वीकार्यता के बीच यहाँ के छात्र योग को ‘ ’ के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं और स्वास्थ्य-संपन्न समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
Anand Kumar Gupta
11/11/2025
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“तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः” (योगसूत्र 2.49)
जब आसन सिद्ध हो जाता है, तब श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना, उसका नियमन करना ही प्राणायाम कहलाता है। ‘प्राण’ जीवनशक्ति है और ‘आयाम’ उसका विस्तार या नियंत्रण। प्राणायाम का उद्देश्य प्राण की गति को नियमित कर शरीर और मन को स्थिर बनाना है।
महर्षि पतंजलि ने तीन मुख्य प्रकार बताए —
🌿 बाह्य वृत्ति (रेचक) – श्वास छोड़कर रोकना
🌿 आभ्यन्तर वृत्ति (पूरक) – श्वास लेकर रोकना
🌿 स्तम्भ वृत्ति (कुम्भक) – श्वास को रोककर स्थिर रखना
इनसे परे एक चतुर्थ अवस्था है — “बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः” (2.51), जहाँ साधक का मन पूर्ण शांति में स्थित हो जाता है।
प्राणायाम के अभ्यास से अज्ञान का आवरण नष्ट होता है —
“ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्” (2.52)
मन ध्यान के योग्य बनता है —
“धारणासु च योग्यता मनसः” (2.53)
प्राणायाम केवल श्वास का अभ्यास नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना को जागृत करने का माध्यम है — जो साधक को आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है। 🌸