Nirmali Library
31/12/2021
धारक पानि जहिना समुद्रमे मिलिते तुष्टि प्राप्त करैए तहिना अप्पन किसानी जिनगीक धारमे बहैत योगी बाबा बजला-
“समदरसी, खेतमे लगौल जे किछु स्थायी वा अस्थायी सम्पैत–गाछ-बिरीछ–छल, सभ किछु नष्ट भऽ गेल। मात्र खेतटा बँचल रहल। अखन जँ हम लोककेँ कहबे करबै जे फल्लाँ साल एहेन उपजा भेल वा आमे फड़ल छल, तइसँ अपन भुखाएल पेटक भूख मेटाएत?”
समदर्शी बाबा मुड़ी डोलबैत कहलखिन-
“से तँ नहियेँ मेटाएत।”
योगी बाबा बजला-
“सभ आदमीकेँ ने अपन-अपन होश करए पड़तै जे जीवन धारमे केना हेलब?”
समदर्शी बाबा बजला- “हँ से तँ होश करए पड़तै..!”
योगी बाबा बजला-
“भरिसक अही बीचमे तूँ बेहोश भऽ गेलह तँए जिनगी खेपब भार बुझि पड़ि रहल छह। मानै छी घटना भेल, मुदा अप्पन टुटल जिनगीक जोड़ो-जाड़ तँ अपने ने करए पड़त।”
मुड़ी डोलबैत समदर्शी बाबा बजला- “हँ से करए पड़त।”
#कृषियोग jpm's literature
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