kapil ki kalam
प्रश्नों का विस्तार इतना था कि उत्तर सीमित पड़ गए,
और अन्ततः ज्ञात हुआ —
कुछ रहस्य सुलझाने के लिए नहीं,
स्वीकार करने के लिए जन्म लेते हैं।
आज एक अजीब बात हो गई,
मुझको मेरी परछाई से मुलाकात हो गई।
आज एक दिव्य अनुभूति हुई,
मेरी ही परछाई से साक्षात्कार हुआ।
वह देह का प्रतिबिंब नहीं था,
वह चेतना की प्रतिध्वनि थी।
वह मौन था, पर उस मौन में
अनहद नाद की गूंज थी।
मैंने देखा —
वह मुझमें नहीं,
मैं उसमें समाया हुआ था।
वह स्थिर दीपक-सी जल रही थी,
और मैं हवाओं में भटकता हुआ धुआँ था।
वह बोली नहीं,
पर भीतर एक स्वर उठा —
“तुम देह नहीं, तुम श्वास नहीं,
तुम वह ज्योति हो जो साक्षी है।
जिसे न समय बाँध सकता है,
न परिस्थितियाँ डिगा सकती हैं।”
उस क्षण जाना —
परछाई अंधकार की दासी नहीं,
वह प्रकाश की परिचारिका है।
जब साधक स्वयं से मिलता है,
तभी आत्मा परमात्मा की ओर कदम बढ़ाती है।
तब समझ आया —
परछाई अंधकार में नहीं जन्मती,
वह प्रकाश की सन्तान होती है।
और जब मनुष्य स्वयं से मिलता है,
वही उसकी सच्ची साधना होती है।
ki kalam
09/02/2026
वह मखमली बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। उस मुलायम चादर को समेटकर फर्श पर बिछा लिया और वहीं देह टिका दी। अब कुछ राहत-सी महसूस हुई। नींद दबे पाँव आती हुई उसे अपने आगोश में भरने लगी थी। पर मन था कि मानो कहीं और भटक रहा हो। उसे अपनी झोपड़ी का वह खुरदरा, सर्द फर्श याद आने लगा, जहाँ हर रात हवा की कनकनाहट उसके तन से बात करती थी। वहाँ असुविधा थी, पर अपनापन था। यहाँ सब कुछ आरामदेह होते हुए भी अजनबी लग रहा था—पराया, अनछुआ, और मन से दूर।
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