Vimal kumar

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16/07/2025

"बस की आखिरी सीट"

स्थान: भोपाल, मध्य प्रदेश
वर्ष: 2019

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सीन 1:
रात के करीब 9 बजे थे। सुमन, जो कि एक कॉलेज की छात्रा थी, भोपाल से अपने गाँव जा रही थी। उसके गाँव के लिए हर रोज़ एक ही सरकारी बस चलती थी – रात 9:30 बजे। उस दिन उसकी क्लास लेट हो गई थी, फिर भी दौड़ती हुई बस अड्डे पहुँची।

सीन 2:
बस में ज़्यादा भीड़ नहीं थी। सुमन को आखिरी सीट मिल गई। उसका सफर 3 घंटे का था। वह बस में बैठ गई और अपने हेडफोन लगा लिए। करीब एक घंटा बीत चुका था, तभी एक बुज़ुर्ग महिला बस में चढ़ीं।

सीन 3:
वो महिला बहुत थकी हुई लग रही थीं और किसी को जानती भी नहीं थीं। किसी ने उन्हें बैठने के लिए जगह नहीं दी। सुमन ने तुरंत अपनी सीट छोड़ दी और बोली – "दादी, आप यहां बैठ जाइए। मैं आगे खड़ी हो जाऊँगी।"

महिला ने मुस्कराकर कहा – "बिटिया, तू बहुत अच्छी है। भगवान तुझे बहुत देगा।"
बस फिर चलती रही। सुमन अब खड़ी थी, लेकिन खुश थी।

सीन 4:
गाँव आने से करीब 15 मिनट पहले, ड्राइवर ने अचानक ब्रेक मारा – सामने एक गाय आ गई थी। ब्रेक लगते ही पीछे की आखिरी सीट के ऊपर की लोहे की रॉड सीट पर गिर गई – ठीक उसी जगह जहां कुछ समय पहले सुमन बैठी थी।

सीन 5:
सब घबरा गए – अगर सुमन वहीं बैठी होती, तो उसे गंभीर चोट लग सकती थी। लेकिन वह तो खड़ी थी, क्योंकि उसने अपनी सीट दादी को दे दी थी।

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निष्कर्ष (Moral):

कभी-कभी किसी की मदद करना सीधे आपकी ज़िंदगी को बचा सकता है। भलाई कभी बेकार नहीं जाती।

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ये घटना भोपाल के पास एक छोटे से गाँव में सच में घटी थी।

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