Limra Agency

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09/07/2026

दिल्ली की मशहूर दरगाह Dargah of Qutbuddin Bakhtiar Kaki से जुड़ी एक बहुत मशहूर रिवायत आज भी लोगों के बीच सुनाई जाती है। ❤️

कहा जाता है कि जब Qutbuddin Bakhtiar Kaki रहमतुल्लाहि अलैहि का विसाल हुआ, उस समय उनके प्यारे ख़लीफ़ा Fariduddin Ganjshakar रहमतुल्लाहि अलैहि दिल्ली में मौजूद नहीं थे। ❤️

जब बाबा फ़रीद दिल्ली पहुँचे, तो उन्हें अपने मुर्शिद के आख़िरी दीदार न कर पाने का बहुत अफ़सोस हुआ।

मशहूर रिवायत के मुताबिक़, उन्होंने अपने मुर्शिद की क़ब्र पर मिट्टी डालनी शुरू की। अपने मुर्शिद की मोहब्बत और ग़म में वह इतने डूब गए कि लगातार मिट्टी डालते रहे।

कहा जाता है कि मिट्टी का ढेर इतना ऊँचा हो गया कि मज़ार का आकार आम क़ब्रों से बड़ा दिखाई देने लगा।

इसी रिवायत में यह भी बयान किया जाता है कि उस वक़्त एक रूहानी आवाज़ आई:

"बस करो फ़रीद..."

यह रिवायत मुर्शिद और मुरीद के बीच गहरी मोहब्बत और अदब की मिसाल के तौर पर सुनाई जाती है। ❤️

📚 References
Siyar al-Awliya – चिश्ती सिलसिले के बुज़ुर्गों का ज़िक्र।
Akhbar al-Akhyar – औलिया-ए-किराम के हालात।
Fawa'id al-Fu'ad – चिश्ती सिलसिले की तालीम और रिवायतें।

09/07/2026

🌹 क्या सचमुच एक भूखा शेर हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाहि अलैहि के सामने आ गया था? और फिर ऐसा क्या हुआ कि वह किसी को नुकसान पहुँचाए बिना लौट गया?

यह वाक़िया ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाहि अलैहि से जुड़ी मनाक़िब (औलिया की जीवनी) की मशहूर रिवायतों में बयान किया जाता है।

रिवायतों के मुताबिक़, एक बार ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाहि अलैहि अपने कुछ मुरीदों के साथ सफ़र कर रहे थे। रास्ते में एक भूखा शेर दिखाई दिया। मुरीद घबरा गए और उन्हें अपनी जान का ख़तरा महसूस होने लगा।

ख़्वाजा साहब ने उन्हें सब्र करने और अल्लाह पर भरोसा रखने की नसीहत की। फिर आपने अल्लाह तआला से दुआ की और शेर की तरफ़ देखा।

रिवायतों में आता है कि शेर ने हमला नहीं किया। वह कुछ देर शांत खड़ा रहा, फिर धीरे-धीरे वहाँ से चला गया। यह देखकर मुरीदों का डर दूर हो गया और उनका यक़ीन और मज़बूत हो गया कि अल्लाह अपने नेक बंदों की हिफ़ाज़त फ़रमाता है।

इस वाक़िये का सबसे बड़ा सबक़ यह है कि औलिया-ए-किराम की असली ताक़त उनकी करामात नहीं, बल्कि उनका मज़बूत ईमान, तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) और अल्लाह की इताअत थी।

याद रखिए, करामात का होना अल्लाह की तरफ़ से होता है। कोई वली अपनी ताक़त से करामत नहीं दिखाता। इसलिए हमारी असली तवज्जोह हमेशा अल्लाह की इबादत, सुन्नत की पैरवी और नेक अमल पर होनी चाहिए।

🤲 अल्लाह तआला हमें औलिया-ए-किराम की सच्ची मोहब्बत, अल्लाह पर पूरा भरोसा और दीन पर इस्तिक़ामत अता फ़रमाए। आमीन।

📚 हवाला:

• सियरुल औलिया
• अख़बारुल अख़्यार
• दलीलुल आरिफ़ीन

09/07/2026

क्या आपने कभी सोचा है कि काबा शरीफ़ के सामने रखा वह पत्थर इतना मुक़द्दस क्यों माना जाता है? आखिर उसमें मौजूद पैरों के निशान किसके हैं?

मक़ाम-ए-इब्राहीम वह मुबारक पत्थर है, जिस पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम काबा शरीफ़ की तामीर के दौरान खड़े होते थे। जब दीवार ऊँची होने लगी, तो यह पत्थर अल्लाह के हुक्म से ऊपर उठ जाता था, जिससे तामीर का काम आसान हो जाता।

तारीखी रिवायतों के मुताबिक़, इसी पत्थर पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के मुबारक क़दमों के निशान रह गए, जिन्हें आज भी सुरक्षित रखा गया है।

क़ुरआन मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"और मक़ाम-ए-इब्राहीम को नमाज़ की जगह बना लो।"

इसी वजह से हज और उमरा करने वाले मुसलमान तवाफ़ पूरा करने के बाद मक़ाम-ए-इब्राहीम के पीछे दो रकअत नमाज़ पढ़ने की कोशिश करते हैं। अगर वहाँ भीड़ हो, तो मस्जिद-ए-हरम में कहीं भी यह दो रकअत पढ़ी जा सकती हैं।

आज यह मुबारक पत्थर एक मज़बूत शीशे और धातु के ख़ूबसूरत घेरे में सुरक्षित रखा गया है, ताकि इसकी हिफ़ाज़त होती रहे और ज़ायरीन इसे देख सकें।

मक़ाम-ए-इब्राहीम हमें हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी, अल्लाह की फ़रमांबरदारी और तौहीद की याद दिलाता है। यह सिर्फ़ एक पत्थर नहीं, बल्कि अल्लाह के एक महान नबी की यादगार है।

🤲 अल्लाह तआला हमें हज और उमरा की सआदत नसीब फ़रमाए, मक़ाम-ए-इब्राहीम के पीछे नमाज़ पढ़ने की तौफ़ीक़ दे और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की तरह अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की इताअत में गुज़ारने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

📚 हवाला:

• क़ुरआन मजीद – सूरह अल-बक़रह 2:125
• सहीह बुख़ारी – हदीस 395 (मक़ाम-ए-इब्राहीम और तवाफ़ के बाद नमाज़)
• सहीह मुस्लिम – हदीस 1218 (हज का बयान)
• तफ़सीर इब्न कसीर
• अख़बार मक्का

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