Manoj Manav
09/07/2026
"ऎसे हत्यारे कब तक हत्या करते रहेंगे?"
हत्या का अर्थ केवल किसी का गला काट देना नहीं होता। किसी के विश्वास की हत्या, किसी की उपेक्षा करके हत्या, किसी की योग्यता होते हुए भी उसे अवसर न देकर हत्या, किसी की निष्ठा और ईमानदारी को संदेह के कटघरे में खड़ा करके हत्या, किसी को बदनाम करके हत्या, और किसी का इतना दमन करना कि वह मजबूर होकर आत्महत्या कर ले; ये सब भी हत्या के ही रूप हैं। विडंबना यह है कि ऐसी हत्याओं के विरुद्ध कानून की सीमाएँ असहाय हैं, जबकि ये हत्याएँ समाज में प्रतिदिन लाखों की संख्या में घटित होती रहती हैं।
और इन हत्याओं को अंजाम देने वाले अक्सर वही लोग होते हैं जो समाज की व्यवस्था में प्रतिष्ठित और प्रभावशाली स्थानों पर बैठे होते हैं। ऐसे हत्यारों की पहचान करना, उनके चरित्र को समाज के सामने उजागर करना और उनके कृत्यों पर नैतिक प्रश्न उठाना हर उस व्यक्ति का दायित्व है जो समाज को अधिक स्वच्छ, न्यायपूर्ण और संवैधानिक दिशा में ले जाकर देश और लोकतंत्र की गरिमा को विश्व में ऊँचा देखना चाहता है।
अतः समाज की मुक्ति केवल रक्त बहाने वाले हत्यारों को दंड देनें से नहीं होगा नहीं बल्कि किसी के अधिकार, सम्मान, विश्वास, अवसर, निष्ठा और आत्मसम्मान का सुनियोजित वध करने वाला भी उतना ही बड़ा हत्यारा है। ऐसे चेहरों की पहचान कर, उनके वास्तविक चरित्र को समाज के सामने उजागर करना और उनके विरुद्ध नैतिक चेतना का निर्माण कर हर जागरूक नागरिक का संवैधानिक एवं सामाजिक दायित्व है।
✍️ Manoj Manav की कलम से...
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