Kavya Chaupal
23/05/2026
वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया
मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया
जब उस की बज़्म में दार-ओ-रसन की बात चली
मैं झट से उठ गया और आगे आ के बैठ गया
दरख़्त काट के जब थक गया लकड़-हारा
तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया
तुम्हारे दर से मैं कब उठना चाहता था मगर
ये मेरा दिल है कि मुझ को उठा के बैठ गया
जो मेरे वास्ते कुर्सी लगाया करता था
वो मेरी कुर्सी से कुर्सी लगा के बैठ गया
फिर उस के बा'द कई लोग उठ के जाने लगे
मैं उठ के जाने का नुस्ख़ा बता के बैठ गया
-- ज़ुबेर अली ताबिश
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23/05/2026
सफर तबील था,कितने ही इम्तहान मिले।
सुलगती रेत पे दरिया के भी निशान मिले।
अभी चट्टान के सीने में ख़्वाब ज़िंदा है,
बस इंतज़ार है पत्थर को भी ज़ुबान मिले।
-- कृष्ण कुमार 'बेदिल'
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23/05/2026
जब न सूरज से डरे फिर ये सितारा क्या है,
हम भँवर वालों की नज़रों में किनारा क्या है।
हमको एहसास की बस्ती से भी बे-दख़्ल किया,
सब तुम्हारा है तो दुनिया में हमारा क्या है।
प्यास दरिया से बुझेगी किसी सागर से नहीं,
इसके पानी से अधिक और भी खारा क्या है।
इश्क में सोच सकें, वक़्त कहाँ मिलता है,
इश्क वालों के लिए ज़ह्र क्या पारा क्या है।
जीत अपने लिए रस्ते भी बना लेती है,
आदमी इश्क में ख़ुद के सिवा हारा क्या है।
-- रामबाबू रस्तोगी
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