Gaurav R Goswami
वर्तमान में अतीत की प्रासंगिकता
बेशक,भारत के लोगों ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कीर्ति स्थापित की, पर केवल अतीत की कृति के बल पर ही हम आज के ज्ञान- विज्ञान की उपलब्धियां का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते की प्राचीन भारतीय समाज सामाजिक अन्याय से मुक्त नहीं था। निम्न वर्णों पर विशेषत: शूद्रों और चांडलो पर जिस तरह से अपात्रयताएं थोप दी गई थी वह आज के विचार में बड़ा ही खेदजनक है। अगर पुरानी जीवन पद्धति में परिवर्तन न लाया जाए तो संभवत: वे सारी विषमताएं भी सर उठाएंगी ही। भारत में सभ्यता के विकास की धारा इस सामाजिक भेदभावों की वृद्धि के साथ-साथ बनी है। प्रकृतिमूलक और मानवमूलक कठिनाइयों पर विजय पाने में हमारे पूर्वजों को जो सफलता मिली है उससे हम भविष्य के लिए आश्वस्त हो सकते हैं, पर अतीत को पुन: लौटने का अर्थ होगा उन सामाजिक विषमताओं को सर चढ़ाए रखना जिनके कारण हमारा देश चिरकाल से दुर्दशाग्रस्त रहा है ।यह सारी बातें स्पष्ट करती हैं कि अतीत का मर्म समझना आवश्यक है।
Gaurav R Goswami
05/03/2026
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