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16/02/2026

माय लॉर्ड,
मुझे सिर्फ 10 मिनट चाहिए... और उन 10 मिनटों में एक साधारण छात्र ने देश की सबसे बड़ी अदालत को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया।

जबलपुर के अथर्व चतुर्वेदी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। NEET में 530 अंक आए थे। सरकारी कॉलेज थोड़े से अंकों से चूक गया और निजी कॉलेजों में EWS आरक्षण नहीं था। पिता की इतनी हैसियत नहीं थी कि प्राइवेट की पूरी फीस भर सकें या सुप्रीम कोर्ट में महंगा वकील कर सकें।

अथर्व ने हार मानने के बजाय भारत का संविधान उठाया। खुद कानून पढ़ा। खुद अपनी याचिका ड्राफ्ट की। दिल्ली जाने के पैसे नहीं थे, तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जबलपुर से ही पैरवी की।

सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा कम ही होता है जब कोई 18-19 साल का लड़का CJI की बेंच के सामने खड़ा होकर दलीलें दे। उनकी मासूमियत और तर्कों में इतना दम था कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 —जो कोर्ट को 'पूर्ण न्याय' करने की विशेष शक्ति देता है,उसका इस्तेमाल किया और अथर्व को MBBS में प्रवेश देने का आदेश सुनाया। इस फैसले से सब लोग आश्चर्य है। अथर्व के जज़्बे को सलाम।

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