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कानून और न्याय के जानकारों के बीच एक प्रचलित कहावत हैं कि बेल इज जेल, जमानत, जेल हैं, बेल एपलीकेशन is NOC एनओसी फार हाई कोर्ट। इसी तरह न्यायिक विवेक का मतलब आवेदन खारिज। यह कहावते बड़ी ही प्रचलित कहावते हैं। इसी तरह से दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 केवल राजनीतिज्ञों के लिए हैं, चार्ज पर डिस्चार्ज केवल राजनीतिज्ञ होते हैं।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में जमानत अधिकार हैं, न्यायिक अभिरक्षा जेल अपवाद हैं। यह किताबी बात हैं। सच इसका ठीक उल्टा हैं। दण्ड विधान में जमानत शर्तो पर दी जाती हैं। मसलन अभियोजन साक्षीगण को प्रभावित नहीं करेंगा, प्रत्येक पेशी पर हाजिर रहेगा। कानून कहता हैं कि धारा 437 (2) में महिला को हत्या के अपराध में जमानत देने का मजिस्ट्रेट को पूर्ण अधिकार हैं लेकिन एक वर्ष में एक उदाहरण देने के लिए भी नहीं मिलेगा। सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अजमानती अपराधों में 99 प्रतिशत मामलों में जमानत केवल हाई कोर्ट से मिलती हैं और जमानत की प्रक्रिया में 60 दिन का करीब समय लग जाता हैं। जमानत अर्जी खारिज करने के न्यायिक बहाने बहुत रोचक हैं, अपराध गंभीर प्रकृति का हैं, पुलिस की तहकीकात जारी हैं, साक्षीगण को प्रभावित करने की पूर्ण संभावना हैं, आरोपी के फरार होने की संभावना हैं।
दरअसल कानून के सामने खड़ा प्रथम अपराधी, जिसका पिछला कोई अपराधिक रिकार्ड नहीं हैं और दूसरा पेशेवर अपराधी के बीच फर्क नहीं कर पाता हैं। न्यायिक विवेक भी फर्क नहीं कर पाता हैं। प्रयोग में दिखाई पड़ता हैं कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 तो देश के प्रभावशाली एवं राजनीतिज्ञों को अग्रिम जमानत देने के लिए बनी हैं। धारा 439 में जमानत आम नागरिक के लिए और हाई कोर्ट द्वारा दिए जाने के लिए बनी हैं। कभी कभी तो एैसा लगता हैं कि न्यायिक अधिकारी हाई कोर्ट के दबाव में रहते हैं, इसलिए जमानत योग्य मामलों में भी और तो और एैसे मामले जिनको स्वीकार कर लिए जाए तो भी दोषसिद्धि संभव नहीं हैं उन मामलो में भी जमानत अर्जी खारिज हो जाती हैं। एक सवाल यह भी उठता हैं कि जो अदालत अपराध के लिए दोषी पाए गए व्यक्ति को सजा सुना सकती हैं, वही अदालत जमानत क्यों नहीं दे सकती हैं? हाई कोर्ट का न्यायिक विवेक आरोपी को जमानत देता हैं तो वही पर विचारण न्यायालय का न्यायिक विवेक आरोपी की जमानत अर्जी खारिज क्यों कर देता हैं? यह एैसा प्रश्र हैं जिसका जवाब कभी नहीं मिलेगा?
सरकारे राजनीतिक दलो की बनती हैं, एक के बाद दूसरी पार्टी आ जाती हैं लेकिन व्यवस्था वही रहती हैं। जरूरत व्यवस्था परिवर्तन की हैं, व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवाज उठाने की हैं। परिवर्तन इतना तो आना ही चाहिए कि 50 फीसदी मामलों में जमानत जिला एवं सत्र न्यायालय से मिल जाए, हाई कोर्ट तक ना जाना पड़े। हम वकील हैं, व्यवस्था परिवर्तन के लिए आवाज नहीं उठाते हैं, कभी लिखते नहीं हैं, हम खामोश हैं, यही हमारा सबसे बड़ा अपराध है
26/11/2018
सभी देशवासियों को संविधान दिवस की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं
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