The Positive Pitch
सरकारी नौकरी छोड़…
सत्ता नहीं, संघर्ष चुना।
6 लाख से ज्यादा लोगों का विश्वास,
आदिवासी नेतृत्व की नई पहचान,
और खरगोन-बड़वानी की राजनीति का असली सच।
क्या है पोरलाल खरते का विज़न?
हार के बाद भी क्यों मजबूत हुआ जनसमर्थन?
और आदिवासी राजनीति का अगला अध्याय क्या होगा?
पूरा एपिसोड जल्द आ रहा है…
यह सिर्फ़ ट्रेलर है।
1984 से शुरू हुई एक साधारण सी यात्रा…
आज बनी है भरोसे, गुणवत्ता और समर्पण की मिसाल।
इस बार The Positive Pitch पर आ रहे हैं
SachASabu के मालिक श्री गोपाल जी साबू —
एक ऐसा नाम जिसने साबूदाना उद्योग में
AGMARK के साथ शुद्धता की नई पहचान बनाई।
कैसे सीमित संसाधनों से बना राष्ट्रीय ब्रांड?
कैसे कायम रखा गुणवत्ता पर अडिग विश्वास?
और क्यों “Nothing Special, Only Dedication”
सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है?
देखिए इस प्रेरक बातचीत का ट्रेलर आज।
पूरा एपिसोड जल्द ही।
सरकारी सेवा की सुरक्षित राह छोड़कर,
जनता की सेवा का कठिन मार्ग चुनने वाले —
खरगोन-बड़वानी की धरती से उभरी एक सशक्त आवाज़।
इस विशेष संवाद में, पूर्व अधिकारी से जननेता बने पोरलाल खरते साझा कर रहे हैं
अपनी संघर्ष यात्रा, आदिवासी समाज का विज़न, चुनावी अनुभव,
और मध्यप्रदेश की राजनीति का वास्तविक परिदृश्य।
यह सिर्फ़ एक पॉडकास्ट नहीं,
बल्कि सिस्टम, समाज और सत्ता के बीच की सच्ची बातचीत है।
The Positive Pitch
जहाँ विचार बनते हैं परिवर्तन की शक्ति।
सरकारी नौकरी छोड़…
सत्ता नहीं, संघर्ष चुना।
6 लाख से ज्यादा लोगों का विश्वास,
आदिवासी नेतृत्व की नई पहचान,
और खरगोन-बड़वानी की राजनीति का असली सच।
क्या है पोरलाल खरते का विज़न?
हार के बाद भी क्यों मजबूत हुआ जनसमर्थन?
और आदिवासी राजनीति का अगला अध्याय क्या होगा?
पूरा एपिसोड जल्द आ रहा है…
यह सिर्फ़ ट्रेलर है।
MP की बीयर नीति पर सवाल – वैज्ञानिक कारण या प्रशासनिक आदेश?
एक ही बियर 🍺
एक ही ब्रांड
एक ही फैक्ट्री
फिर मध्यप्रदेश में 6 महीने एक्सपायरी… और अन्य राज्यों में 9–12 महीने क्यों? 🤔
इस वीडियो में हम व्यावहारिक, वैज्ञानिक और नियामकीय आधार पर इस अंतर का विश्लेषण कर रहे हैं।
जब गुणवत्ता, पैकेजिंग और FSSAI मानक पूरे भारत में समान हैं, तो एक्सपायरी अलग क्यों दिखाई देती है?
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक नीति है?
क्या यह स्टॉक रोटेशन और राजस्व से जुड़ा फैसला है?
या फिर कोई और वजह है?
तथ्यों के साथ समझिए पूरा मामला।
वीडियो देखें, अपनी राय कमेंट में ज़रूर दें।
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Madhya Pradesh beer 6 months
Beer expiry 12 months
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Beer expiry controversy
Indian liquor policy
Stock rotation beer
सरकारी सेवा की सुरक्षित राह छोड़कर,
जनता की सेवा का कठिन मार्ग चुनने वाले —
खरगोन-बड़वानी की धरती से उभरी एक सशक्त आवाज़।
इस विशेष संवाद में, पूर्व अधिकारी से जननेता बने पोरलाल खरते साझा कर रहे हैं
अपनी संघर्ष यात्रा, आदिवासी समाज का विज़न, चुनावी अनुभव,
और मध्यप्रदेश की राजनीति का वास्तविक परिदृश्य।
यह सिर्फ़ एक पॉडकास्ट नहीं,
बल्कि सिस्टम, समाज और सत्ता के बीच की सच्ची बातचीत है।
The Positive Pitch
जहाँ विचार बनते हैं परिवर्तन की शक्ति।
सरकारी नौकरी छोड़…
सत्ता नहीं, संघर्ष चुना।
6 लाख से ज्यादा लोगों का विश्वास,
आदिवासी नेतृत्व की नई पहचान,
और खरगोन-बड़वानी की राजनीति का असली सच।
क्या है पोरलाल खरते का विज़न?
हार के बाद भी क्यों मजबूत हुआ जनसमर्थन?
और आदिवासी राजनीति का अगला अध्याय क्या होगा?
पूरा एपिसोड जल्द आ रहा है…
यह सिर्फ़ ट्रेलर है।
इंदौर से जुड़े लगातार घटनाक्रमों के बीच राज्य के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का सार्वजनिक तौर पर चुप रहना कई सवाल खड़े करता है।
जो नेता कभी हर मुद्दे पर बेबाक राय रखते थे, आज वही राजनीतिक मौन साधे हुए हैं।
क्या यह रणनीतिक चुप्पी है?
क्या अंदरूनी दबाव है?
या आने वाले राजनीतिक समीकरणों का संकेत?
इंदौर की राजनीति में यह ख़ामोशी अब खुद एक बयान बनती जा रही है।
“बिना दिमाग की मंजूरी… और ‘बिना बात का बतंगड़’!”
आलोक खरे केस में हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी ने लोकायुक्त और शासन—दोनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जब अदालत कहे कि मामला कमजोर था, जांच में ‘बतंगड़’ बनाया गया और अभियोजन की मंजूरी बिना सोच-विचार दी गई—तो फिर सस्पेंशन किस आधार पर?
यह सिर्फ एक अफसर की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जहाँ पहले सजा दी जाती है और बाद में न्याय मिलता है।
अब सवाल साफ है—जवाबदेही किसकी होगी? प्रतिष्ठा की भरपाई कौन करेगा?
न्यायपालिका ने चेताया है—जांच मनमानी नहीं, जिम्मेदारी है।
#आबकारी
#शराब
मध्यप्रदेश में इंजेक्शन और वैक्सीन की जांच 15 साल से बंद!
राज्य में कई दवाओं की गुणवत्ता जांच की सुविधा ही नहीं है, इसलिए रिपोर्ट के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।
तीन महीने बाद रिपोर्ट आती है, तब तक वही दवा मरीजों को दी जाती रहती है!
सवाल ये है —
जब दवाओं की गुणवत्ता पर ही भरोसा नहीं,
तो मरीजों की सुरक्षा कौन करेगा?
क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही है
या स्वास्थ्य व्यवस्था की एक गंभीर सच्चाई?
अगर इंजेक्शन की जांच समय पर नहीं होगी,
तो जिम्मेदारी किसकी होगी — सरकार, सिस्टम या विभाग की?
अब वक्त है सवाल पूछने का…
क्योंकि स्वास्थ्य में लापरवाही, सीधे जीवन से जुड़ी होती है।
UGC ने उच्च शिक्षा में बड़ा कदम उठाया है।
SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ भेदभाव रोकने के लिए नए नियम लागू किए गए हैं।
अब हर विश्वविद्यालय में समान अवसर केंद्र, शिकायत समिति और सख्त निगरानी व्यवस्था अनिवार्य होगी।
नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों पर कार्रवाई भी संभव है।
लेकिन सवाल उठ रहा है —
क्या ये नियम समानता बढ़ाएंगे या नई बहस को जन्म देंगे?
सामान्य वर्ग के छात्रों में भी चिंता और प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
शिक्षा में न्याय जरूरी है,
लेकिन संतुलन भी उतना ही जरूरी है।
आप क्या सोचते हैं?
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