PathJeevani
26/05/2025
25/05/2025
जब लोग कहते थे — ये क्या नौटंकी है...
उन्होंने उस मंच को आवाज़ बना दिया, जहां पूरा शहर तालियां बजाने लगा।”
👨🏻 एक नौजवान था —
जो खुद को किसी कैमरे के सामने देखना चाहता था,
पर न कोई चैनल था, न टीम, न पैसा…
बस एक पुराना कैमरा, कुछ पोस्टकार्ड, और एक जुनून — मेला को ज़िंदा रखने का।
📍 नाम था Shrish Gupta —
पर पूरा शहर जानता था उन्हें एक ही नाम से:
गुड्डू भैया।
🎪 जब साल 2000 आया, तो उन्होंने कुछ ऐसा किया जो उस वक्त सिर्फ़ फिल्मों में होता था —
पोस्टकार्ड प्रतियोगिता।
बोले — "हमें भेजिए एक चिट्ठी… और जीतिए गिफ्ट।"
📬 लोग हंसे, बोले — “कौन भेजेगा अब पोस्ट?”
पर देखते ही देखते —
तीन लाख से ज़्यादा पोस्टकार्ड गुड्डू भैया के पते पर पहुंच गए।
हर कार्ड, एक कहानी।
हर विजेता, मंच पर एक मुस्कान।
🎁 गिफ्ट्स? दुकानदारों से मांगे गए छोटे-छोटे आइटम।
📦 कभी स्टील का गिलास, कभी खिलौना, कभी कुछ नहीं...
पर लोगों की आंखों में था — गौरव।
💔 जब पत्नी का नाम विनर लिस्ट में आया —
उन्होंने मंच से कहा: “इनाम नहीं दूंगा।”
जब रिश्तेदार निकले, बोले — “ये मंच मेरा नहीं, जनता का है।”
🎥 फिर आया डिजिटल युग।
YouTube, WhatsApp, Facebook —
गुड्डू भैया की आवाज़ अब वीडियो में गूंजने लगी।
👂🏼 लोग वीडियो नहीं, उनकी आवाज सुनने आते थे।
कभी बच्चे का इंटरव्यू, कभी बुजुर्ग की यादें,
कभी दुकान वाले का मज़ाक —
पर सबके बीच एक कॉमन बात थी:
प्योरिटी।
🧩 फिर मुश्किलें भी आईं —
टीम टूटी, वीडियो डिलीट हुए, लोग बोले “सब स्क्रिप्टेड है।”
पर गुड्डू भैया ने कहा:
“सच दिखाने के लिए कैमरा चाहिए, स्क्रिप्ट नहीं।”
💫 आज भी जब मेला सजता है —
तो हर झूले की चीख, हर लाइट की चमक,
और हर भीड़ में एक धड़कती हुई आवाज़ होती है—
“नमस्कार, मैं हूं गुड्डू भैया…”
📍 यह सिर्फ़ मेला की कहानी नहीं —
एक इंसान की आवाज़ है, जिसने शहर की आत्मा को रिकॉर्ड किया।
🎥 Shrish ‘गुड्डू भैया’ Gupta की पूरी कहानी देखें पर
✨ लिंक बायो में है | Highlight: Season 1 Stories
👇 कभी कभी असली स्टार कैमरे के पीछे होते हैं — और उनकी आवाज़ वक्त से आगे निकल जाती है।
24/05/2025
खुद से अपनी सच्ची पहचान का वादा करो..."
कृतिका चावला की ये पंक्तियाँ याद दिलाती हैं कि सबसे बड़ा सफ़र हमारे भीतर होता है —
जहाँ हम खुद को दूसरों से नहीं, खुद से पूरा करना सीखते हैं।
💫 यही आत्म-स्वीकार है, यही असली आत्मविश्वास।
✨ तुलना नहीं, स्वीकार करो। प्रतियोगिता नहीं, प्रगति करो।
यह सिर्फ एक quote नहीं, एक जीवन-दृष्टि है...
हर उस आत्मा के लिए जो खुद से जुड़ने का साहस रखती है।
🙏 आभार कृतिका चावला, इस गहराई और सच्चाई से भरे विचार को साझा करने के लिए।
18/05/2025
दो पैरों की ताकत खो दी, लेकिन हौंसलों की उड़ान कभी नहीं टूटी
सतेन्द्र सिंह लोहिया — पद्मश्री सम्मानित एशिया के पहले पैरा-स्वीमर और प्रेरणा का नाम।
12 साल की उम्र में बीमारी के कारण अपने दोनों पैरों की ताकत खो चुके सतेन्द्र ने दुनिया को दिखा दिया कि हिम्मत और जज़्बा ही असली जीत है। बचपन से ही उन्होंने खुद को सीमाओं में बंधने नहीं दिया।
🌊 उनकी कहानी है पानी की, समंदर की, और सबसे बड़ी चुनौती — नार्थ चैनल की।
12 डिग्री ठंडे पानी में 36 किलोमीटर लंबे नॉर्थ चैनल को पार कर सतेन्द्र सिंह लोहिया बने एशिया के पहले पैरा-स्वीमर, जिन्होंने ये रिकॉर्ड बनाया।
🏆 इससे पहले भी, सतेन्द्र ने कई अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत का नाम रोशन किया है।
उनकी मेहनत और हिम्मत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति, और कई राज्य प्रमुखों ने सराहा है।
🏅 पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित सतेन्द्र न केवल एक खिलाड़ी हैं, बल्कि दिव्यांगता को अवसर में बदलने वाले एक मिसाल हैं।
🏡 परिवार का साथ कम ही मिलता था, लेकिन उनकी आत्मा ने कभी हार नहीं मानी।
के मंच पर एक भावुक पल तब आया, जब पहली बार उनके पिता और भाई उनके साथ मौजूद हुए — एक परिवार की मजबूती और प्रेरणा का प्रतीक।
सतेन्द्र कहते हैं:
"अगर हौंसला हो तो #दिव्यांगता भी वरदान बन जाती है।"
उनकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपनी कमजोरियों से लड़कर आगे बढ़ना चाहता है।
🎥 पूरी कहानी देखें पर
📍 लिंक बायो में और Season 1 Highlights में उपलब्ध है।
यह समाज में छिपी प्रतिभाओं को मंच देने वाला एक जनआंदोलन बन चुका है।
कुछ समय पहले पद्मश्री सम्मानित पैरा-स्विमर श्री सतेन्द्र सिंह लोहिया जी ने पथ के मंच से अपनी जीवन यात्रा साझा की थी —
भिंड जैसे छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर तय करना, संघर्ष, साहस और संकल्प की जीवंत मिसाल है।
🙏 उनके शब्द आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
हम ऐसे विचारों और कहानियों को जन-जन तक पहुँचाने के अपने संकल्प में निरंतर सक्रिय हैं।
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