Sohail Sahil
17/01/2026
आजमगढ़ के शिया जमींदार फतेह हुसैन के घर शायरी की महफ़िल जमी हुई थी। फतह हुसैन का 10-11 साल का बेटा अतहर हुसैन रिज़वी मेहमानों के पानी-पान लाने का काम बड़ी सेवा भाव से करता था।
एक दिन महफ़िल में एक मिसरा उठा और तमाम लोग बगलें झांकने लगे। मिसरा था,'- इतना हंसो कि आंख से आंसू निकल पड़ें...
अतहर हुसैन के सभी बड़े भाई चुप थे कि मासूम अतहर ने ग़ज़ल पूरी कर दी,'
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े... हंसने से हो सुकून, ना रोने कल पड़े..
जिस तरह से हंस रहा हूं मैं, पी-पी के अश्केगम, यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े.!
इस ग़ज़ल ने मुशायरा लूट लिया, अब्बा दंग रह गए। तुरंत एक पार्कर पेन, एक शेरवानी के साथ एक तखल्लुस(उपनाम) "कैफ़ी" भी दे डाला। आगे चल के ये लड़का अतहर "कैफ़ी आज़मी" के नाम से जाना गया और आजमगढ़ समेत देश की आला शख्सियतों में शुमार हो गया।
कैफ़ी आज़मी 14 जनवरी को आजमगढ़ के छोटे से गांव मिजवां में पैदा हुए। उनकी उम्र जब 19 बरस थी, तब वे कम्युनिस्ट पार्टी में शरीक हो गए। उन्होंने पार्टी के अख़बार ‘क़ौमी जंग’ के लिए लिखना शुरू किया और अपनी सलाहियतों के लिए एक बड़े कैनवास की तलाश में मुंबई पहुंच गए। देशभर के मुशायरों में जब एक नौजवान शायर के तौर पर कैफ़ी के नाम की धूम मच रही थी, उस वक्त वे कम्यूनिस्ट पार्टी मेंबर के रूप में मज़दूर और किसानों के हक़ की आवाज़ बुलंद कर रहे थे। सन 47 में कैफ़ी ने शौकत से शादी की जिसके बाद अपने घर के बढ़ते खर्चो को देख कैफी आजमी ने फिल्मी गीत लिखने का निश्चय किया, क्यूंकि फिल्मों में लिखने पर पैसे अच्छे मिलते थे। बंटवारे पर बनी सबसे बेहतरीन फिल्म ‘गरम हवा’ की कहानी, पटकथा, संवाद कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे जिसके लिए उन्हें तीन-तीन फिल्म फेयर अवॉर्ड और राष्ट्रीय अवार्ड भी दिए गए।
1970 में आई फ़िल्म 'हीर-रांझा' ने भी इतिहास कायम कर दिया था। पूरी फ़िल्म शायरी में लिखी गई थी। ऐसा हिन्दी सिनेमा के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इस फ़िल्म के गीतों ने भी ख़ूब धूम मचाई। गरम हवा, कागज़ के फूल, मंथन, कोहरा, सात हिन्दुस्तानी, बावर्ची, पाकीज़ा, हँसते ज़ख्म, अर्थ, रज़िया सुल्तान सरीख़ी फिल्मों ने कैफ़ी को अमर कर दिया।
- कैफ़ी आज़मी ने सईद मिर्ज़ा की फिल्म 'नसीम' (1997) में अभिनय भी किया। यह किरदार पहले दिलीप कुमार निभाने वाले थे।
- कैफ़ी आज़मी केवल 'मॉन्ट ब्लॉक पेन' से लिखते थे। उनके पेन की सर्विसिंग न्यूयॉर्क में होती थी। मौत के वक्त उनके पास अट्ठारह मॉन्ट ब्लॉक पेन थे।
- कैफ़ी आज़मी की जन्मतिथि उनकी अम्मी को याद नहीं थी। उनके मित्र डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर सुखदेव ने उनकी जन्मतिथि 14 जनवरी रख दी थी।
- उन्हें 'सात हिन्दुस्तानी' (1969) के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार के 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।
- भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया था। इसके अलावा उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
- कैफ़ी आज़मी ने कुल 80 हिन्दी फ़िल्मों में गीत लिखे हैं।
- 1975 में कैफ़ी आज़मी आवारा सिज्दे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवॉर्ड से सम्मानित किए गए।
- अमीर परिवार से आई शौकत ने कैफ़ी आज़मी के लिए जितना समर्पण दिखाया,वो वाकई रुला देने वाला है। ग़रीबी में भी शबाना आज़मी और बाबा आज़मी की परवरिश की, घर संभाला और कैफ़ी को कभी एक लफ्ज़ तक नहीं कहा। यूं तो कैफ़ी से जुड़े ढेरों किस्से, ढेरों बातों और उपलब्धियां है, जिन्हें कितना भी लिख दें.. लिखने के लिए पोस्ट कम पड़ जाएगी।
Frank Joseph
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