Dhirendra
मुझे नहीं फर्क पड़ता कौन क्या कहेगा
अगर इसको भी कहना पड़ रहा है
तो आपको फर्क पड़ रहा है
कौन मेरा क्या कर लेगा
यह विचार है
तो फिर विचार की जरूरत है
जो होगा देखा जाएगा
दिखाते हो बेफिक्री
पर हो क्या, बेफिक्र
किसी ने युगांतर पहले कहा था
"वो काठ के पुतले होते हैं जिन्हें भय नहीं लगता
मजा तो उस भय का सामना करने में है।"
अगर नहीं फर्क पड़ता तो नहीं पड़ता
जो होगा देखा जाएगा तो देखा जाएगा, उसका चर्चा नहीं
किसी से भी सामना हो जाए तो जाए, इसको कहना क्या
"सरल और स्पष्ट जिंदगी आपको आपके धर्म से जोड़ती है"
(धीरेन्द्र सिंह)
क्यों फ़िक्र में है,
जो है वो पर्याप्त है।
कर इकट्ठा हौसला,
थाम के धैर्य का दामन।
कर जो तू कर सकता है,
फिर क्यों फ़िक्र करता है।
तू कब हारा है,
हार-जीत से तू ऊपर है।
राहें मुश्किल सही,
पर कदम तेरे मज़बूत हैं।
अंधेरों के बाद ही तो,
सुबह के रंग मौजूद हैं।
समय कभी एक-सा नहीं,
ये बादल भी छँट जाएंगे।
तेरे कर्मों की तपिश से,
नए सूरज निकल आएंगे।
मत डर गिरने से कभी,
गिरकर ही इंसान सँवरता है।
जो खुद पर विश्वास रखे,
वही इतिहास रचता है।
(धीरेन्द्र सिंह)
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