Tirath Raj

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Photos from Tirath Raj's post 08/01/2026

ये चित्र गाज़ा का नहीं है,और फिलिस्तीन का भी नहीं है,ये भारत की राजधानी दिल्ली का तुर्कमान गेट का है,बार-बार तुलना की जा रही है—गाज़ा पट्टी, फिलिस्तीन,युद्ध क्षेत्र।
अरे भाई, ज़रा रुकिए।
वो इलाका, जिसे वर्षों से अवैध कब्ज़ों और अवैध घुसपैठियों ने अपना सेफ ज़ोन बना लिया था। वो इलाका,जहाँ दिल्ली दंगों के समय सबसे ज़्यादा उग्रता देखी गई, और जहाँ पुलिस के लिए घुसना भी चुनौती बन जाता था।
अब जब अदालत के आदेश के बाद दिल्ली एमसीडी अतिक्रमण हटाने पहुँची,तो क्या हुआ?

• पत्थर चले
• हाथ-पैर चले
•भीड़ उग्र हुई
• कानून को डराने की कोशिश हुई

यानी वही पुरानी कहानी—कानून आए तो हिंसा दिखाओ,लेकिन इस बार फर्क था। करीब 40,000 वर्गफुट अवैध अतिक्रमण,
30 बुलडोज़र,
50 डंपर,
और पर्याप्त पुलिस बल के साथ
एमसीडी ने इलाका खाली कराया,और हाँ, अगर किसी को लगा कि “थोड़ा हंगामा कर देंगे, काम रुक जाएगा”—तो गलतफहमी दूर हो गई। कुछ लोग रो रहे हैं कि “इलाका गाज़ा बना दिया गया।”
सवाल सीधा है—
जब अवैध कब्ज़ा किया गया था, तब संविधान याद नहीं आया?
जब पत्थर फेंके गए, तब शांति की बातें क्यों नहीं हुईं? सच तो ये है कि– कानून जब तक नहीं पहुँचा, तब तक ये इलाका मिनी गाज़ा बना हुआ था। अब फर्क बस इतना है कि इस बार पत्थरबाज़ों के हाथ में कंट्रोल नहीं रहा और ये भी साफ कर दिया जाए–अभी कार्रवाई खत्म नहीं हुई है।पत्थर फेंकने वालों पर
•पहचान
• FIR
•कानूनी कार्रवाई
सब होगा।

क्योंकि ये भारत है।
यहाँ सेफ ज़ोन संविधान तय करता है,
भीड़ नहीं।

तुर्कमान गेट की ये कार्रवाई एक संदेश है—
दिल्ली अब नो-गो एरिया नहीं चलाएगी। अवैध कब्ज़ा चाहे जितना पुराना हो,और पत्थरबाज़ी चाहे जितनी तेज़—कानून आखिरकार पहुँचेगा और पहुँचा है।

30/12/2025
30/12/2025

राजनीति और मौन का पाखंड!

स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पुत्र, लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी,दीदी ममता बनर्जी और राहुल गांधी—इन सबकी राजनीति का एक साझा चरित्र आज साफ़ दिखाई देता है, चुनिंदा संवेदना।
ग़ज़ा और फिलिस्तीन के नाम पर इनकी ज़ुबान में अचानक इंसानियत जाग जाती है। सोशल मीडिया पोस्ट,बयान,मार्च–सब कुछ होता है। लेकिन जैसे ही बात पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार की आती है, वही ज़ुबान गूंगी हो जाती है।

बांग्लादेश में मंदिरों पर हमले,घरों की लूट,महिलाओं पर अत्याचार और जबरन पलायन–ये कोई छिपी हुई घटनाएँ नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें,वीडियो और प्रत्यक्षदर्शी सबूत मौजूद हैं। फिर भी तथाकथित सेकुलर राजनीति करने वाले नेताओं की चुप्पी सवाल खड़े करती है। क्या इंसानियत धर्म देखकर तय होती है? क्या पीड़ा का मूल्य वोट बैंक से आँका जाता है?
अगर मुस्लिम पीड़ा पर बोलना प्रगतिशील है,तो हिन्दू पीड़ा पर बोलना साम्प्रदायिक कैसे हो गया?दरअसल,यह राजनीति न्याय की नहीं,गणित की है,जहाँ बयान देने से वोट मिलते हैं,वहाँ आंसू बहते हैं। जहाँ सच बोलने से असहजता हो, वहाँ “रणनीतिक चुप्पी” ओढ़ ली जाती है। यही कारण है कि राहुल गांधी मानवाधिकार की दुहाई देते हैं,मगर बांग्लादेशी हिन्दुओं का नाम लेने से बचते हैं। ममता बनर्जी शरणार्थियों पर राजनीति करती हैं, मगर हिन्दू शरणार्थियों के दर्द पर नहीं। देश की जनता अब यह दोहरापन समझने लगी है।
संवेदना अगर सच्ची है,तो वह सार्वभौमिक होनी चाहिए धर्म,देश और राजनीति से ऊपर। वरना इतिहास ऐसे मौन को पाखंड के नाम से ही याद रखेगा।

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