Pyar ka Jugaad
23/08/2024
पुरानी य़ादें 90 का #दूरदर्शन और हम लोग :
1.सन्डे को सुबह-2 नहा-धो कर
टीवी के सामने बैठ जाना
2." #रंगोली"में शुरू में पुराने फिर
नए गानों का इंतज़ार करना
3." #जंगल-बुक"देखने के लिए जिन
दोस्तों के पास टीवी नहीं था उनका
घर पर आना
4." #चंद्रकांता"की कास्टिंग से ले कर
अंत तक देखना
5.हर बार सस्पेंस बना कर छोड़ना
चंद्रकांता में और हमारा अगले हफ्ते
तक सोचना
6.शनिवार और रविवार की शाम को
#फिल्मों का इंतजार करना
7.किसी नेता के मरने पर कोई #सीरियल
ना आए तो उस नेता को और गालियाँ देना
8.सचिन के आउट होते ही टीवी बंद
कर के खुद बैट-बॉल ले कर खेलने
निकल जाना
9." #मूक- #बधिर"समाचार में टीवी एंकर
के इशारों की नक़ल करना
10.कभी हवा से #ऐन्टेना घूम जाये तो
छत पर जा कर ठीक करना
बचपन वाला वो ' #रविवार' अब नहीं
आता, दोस्त पर अब वो प्यार नहीं आता।
जब वो कहता था तो निकल पड़ते
थे बिना #घडी देखे,
अब घडी में वो समय वो वार नहीं
आता।
बचपन वाला वो ' #रविवार' अब नहीं
आता...।।।
वो #साईकिल अब भी मुझे बहुत याद
आती है, जिसपे मैं उसके पीछे बैठ
कर खुश हो जाया करता था। अब
कार में भी वो आराम नहीं आता...।।।
#जीवन की राहों में कुछ ऐसी उलझी
है गुथियाँ, उसके घर के सामने से
गुजर कर भी मिलना नहीं हो पाता...।।।
वो ' #मोगली' वो ' #अंकल Scrooz',
' #ये जो है जिंदगी' ' #सुरभि' ' #रंगोली'
और ' #चित्रहार' अब नहीं आता...।।।
#रामायण, #महाभारत, #चाणक्य का वो
चाव अब नहीं आता, बचपन वाला वो
'रविवार' अब नहीं आता...।।।
वो #एक रुपये किराए की साईकिल
लेके, दोस्तों के साथ गलियों में रेस लगाना!
अब हर वार 'सोमवार' है
काम, ऑफिस, बॉस, बीवी, बच्चे;
बस ये जिंदगी है। दोस्त से दिल की
बात का इज़हार नहीं हो पाता।
बचपन वाला वो 'रविवार' अब नहीं
आता...।।।
बचपन वाला वो ' #रविवार' अब नही
आता...।।।
यादें बचपन की 📺 📷
🙂 🙏
21/08/2024
पांच साल ससुराल रहने के बाद बेटी पीहर लौट आई थी ससुराल कभी वापस ना जाने के लिए।
पिता की आँखों में सवाल थे। माँ के पास तमाम सवालों के जवाब।पर पिता बेटी से ही सुनना चाहते थे।
बेटी ने पिता का पर्दा किया और तमाम सवालों के जवाब दिये। "किस तरह ससुराल में दूधमुहि बेटी को छोड़ खेतों में काम करने के बाद भी बेटी को गले नहीं लगा सकती।काम का बोझ, उस पर भी ढोर डंगर की जिम्मेदारी भी उसी की। उस पर भी सासू जी के ताने छलनी करते हैं।
कई बार बेज्जती झेलने के बावजूद भी प्यार के दो बोल के लिए तरस जाती है वो।"
"इसमें नया क्या है बेटा, हमने भी यही सब किया है, हर औरत यही करती है। तुम कोई नवेली तो हो नही जो तुम्हारे साथ कुछ अलग होगा?" माँ ने घूँघट की ओट से कहा।
पिता कुछ पल सोचते रहे। फिर बेटी के ससुराल फ़ोन लगाया।
" आपसे बात करनी है, जितनी जल्दी आ सकें जवाई जी के साथ पधारिये।"
बेटी का पति, सास और ससुर हाजिर थे।
"बहू अगर घर का काम न करे, खेत पर न जाए, ढोर डंगर की देखभाल, दूध निकलना ना करे तो क्या उसे आले में बैठा के पूजा करें उसकी।" सास का सवाल था।
"ऐसा तो नहीं कहा उसने कि पूजा कीजिये उसकी। मगर कम से कम उसे इंसान तो समझिए। उसकी बच्ची से पूरा दिन उसे दूर रहना पड़ता है, आखिर दूध पीती बच्ची है अभी उसकी। पर आप लोग उसे बहू कम नौकरानी ज्यादा समझ रहे हैं।"
कमरे में क्षण भर चुप्पी छा गई।
"अब मेरी बेटी आपके साथ नहीं जाएगी। उसके नाम से जमीन का चौथा हिस्सा और मकान कीजिये। और आप चाहें तो दूसरी शादी करने को स्वतंत्र हैं।" पिता ने फैसला सुनाया।
"खाना खाकर पधारें आप..." पिता ने हाथ जोड़े और दरवाजे से निकल गए।
बेटी दरवाजे की ओट से सब सुन रही थी। पिता ने बेटी के सर पर हाथ रखा।
"शादी ही की है, इसका ये मतलब नहीं कि तुझे अकेला छोड़ दिया है। अब भी मेरा गुरुर है तू।" पिता ने बेटी के सर पर हाथ फेरा। आँखे दोनों की छलछला रहीं थी
बेटी पिता के सीने से लिपट गई और दोनों फफक कर रो पड़े ।।
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