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26/03/2026

श्री बुट भवानी माता - अरनेज

माता बूट भवानी का मंदिर गुजरात के अहमदाबाद जिले के धोलका तालुका में स्थित अरनेज नाम के गांव में आया हुआ अत्यंत पावन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह मंदिर चारण समाज की कुलदेवी आई श्री बूट भवानी को समर्पित है और अपनी आध्यात्मिक शांति और भक्तों की अटूट आस्था के लिए जाना जाता है।

लोककथाओं के अनुसार, माता बूट भवानी का जन्म करीब 500-600 साल पहले गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के सापड़का गांव में एक चारण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम बापल देथा और माता का नाम देवल बाई था, जो मा हिंगलाज के परम भक्त थे। माना जाता है कि माता हिंगलाज ने ही उनके घर पुत्री के रूप में अवतार लिया था। उनकी तीन और बहनें और थीं—आई बहुचरा जी, आई बलाड़ और आई बालवी ।

माता जी ने अपने भक्त तोड़ा बापा को स्वप्न में दर्शन दिए और बताया कि वे अरनेज गांव के पास एक पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान हैं। जब उन्होंने उस स्थान की खुदाई की, तो वहां से माता जी की मूर्ति, त्रिशूल और चावल (अक्षत) निकले। इसके बाद अरनेज गांव में माता जी का भव्य मंदिर स्थापित किया गया।

बूट' नाम के पीछे की मान्यता यूं है कि एक प्रचलित कथा के अनुसार, माता जी के 'बूट' नाम का संबंध उनके एक भक्त मेहरिया भुवा की भक्ति से है। कहा जाता है कि मेरिया भुवा माताजी के साथ पर्दे में रहकर बात करता था और हमेशा मा से प्रत्यक्ष दर्शन की विनती करता था । मा ने कहा कि वो आएगी तो भी पहचान नहीं पाएगा फिर भी मेरिया जिद पर अड़ा रहा । मा ने उसकी परीक्षा लेने के लिए वृद्धा और युवा स्वरूप लेकर उसके सामने आए । मेरिया ने वृद्धा को अपमानित करके भगा दिया लेकिन युवा स्वरूप माता को अपने साथ लेकर चला । बीच राह में कामवश उसकी नीयत बिगड़ी और माताजी ने कई बार रोका कि वो अपनी भूल सुधार के पर जब वह नहीं मान तो मा ने रौद्र स्वरूप धारण करके उसका वध कर किया । 'बूट' शब्द का स्थानीय संदर्भ उनके शक्तिशाली और रक्षक स्वरूप से भी जोड़ा जाता है। यह कथा का तात्पर्य है कि अगर शक्ति का उपासक हॉट हुए भी अगर आप स्त्री का सम्मान नहीं कर सकते हो या अपनी सीमा से बाहर जाते हो तो वही शक्ति आपका नाश भी कर सकती है ।

रेलवे और अंग्रेजों से जुड़ा चमत्कार :
इस मंदिर का एक आधुनिक इतिहास बहुत प्रसिद्ध है, जो ब्रिटिश काल से जुड़ा है । जब अंग्रेज इस क्षेत्र (भावनगर-अहमदाबाद रेल लाइन) में पटरी बिछा रहे थे, तो अरनेज के पास काम कर रहे इंजीनियरों को कई रहस्यमयी अनुभव हुए और काम में बाधाएं आने लगीं। कहा जाता है कि भावनगर के महाराजा ने भी अंग्रेजों को माता जी की शक्ति के बारे में बताया था। जब अंग्रेज अधिकारियों ने माता जी की शक्ति को स्वीकार किया और वहां शीश झुकाया, तब जाकर रेल लाइन का काम बिना किसी बाधा के पूरा हुआ। आज भी परंपरा है कि आज भी जब कोई ट्रेन अरनेज रेलवे स्टेशन से गुजरती है, तो वह माता जी के सम्मान में धीमी होती है या 'सलाम' के तौर पर तीन बार हॉर्न बजाती है। रेलवे की ओर से आज भी माता जी को चुनरी और नारियल भेंट करने की परंपरा निभाई जाती है।

जय अंबे जय गुरुदेव

21/03/2026

श्री जगदम्बा का बालिका स्वरूप : श्री बालात्रिपुरसुंदरी (बहुचराजी)

गुजरात के तीन शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ मेहसाणा जिले में बहुचराजी शक्तिपीठ है जो कालरी, डेडाना और बेचर गांवों के तिराहे पर स्थित है। यह मंदिर बेचर गांव के आसपास स्थित होने के कारण उस समय अंग्रेजों ने इस स्थान का नाम बेचराजी रखा था, लेकिन स्थानीय भाषा में लोग इसे माताजी के बहुचराजी नाम के साथ जोड़कर इस स्थान को कई वर्षों से बहुचराजी के नाम से ही जानते हैं।

नवरात्रि के दिनों में देश के कोने-कोने से लाखों भाविक श्रद्धालु इन तीनों शक्तिपीठों के दर्शन के लिए आते हैं।

बहुचराजी यात्राधाम में माताजी को श्री बालात्रिपुरसुंदरी के रूप में पूजा जाता है। यहां माताजी के मंदिर के मुख्य गोख में माताजी का स्फटिक का बाला यंत्र स्थापित है, जो सोने से मढ़ा हुआ है।

वड़ोदरा राज्य के राजा श्री मानाजीराव गायकवाड़ ने इस यंत्र को काशी से बनवाकर विद्वान ब्राह्मणों से इसकी पूजा कराकर स्थापित करवाया। श्रीमान मानाजीराव जब बड़ोदरा स्टेट के राजवी थे तब उन्हे पाठा का दर्द (अल्सर) हुआ था, तब उन्होंने माता की मन्नत मानी थी । माता के मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित वाव की मिट्टी का लेप करने से उनका वह दर्द दूर हुआ था और राजाजी ने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था ।

बहुचराजी मंदिर परिसर में कुल तीन मंदिर हैं । इन तीन स्थानों को आद्यस्थान, मध्यस्थान और मुख्य स्थान के नाम से जाना जाता है। माताजी के मुख्य मंदिर के पीछे एक वरखडी के पेड़ के नीचे माताजी का मूल मंदिर है, जहाँ माताजी ने सोलंकी राजा को दर्शन दिये थे।

यहां माताजी को सप्ताह के सातों दिन अलग-अलग सवारी दी जाती है। माताजी सोमवार को नंदी की सवारी पर, मंगलवार को सिंह पर, बुधवार को बाघ पर, गुरुवार को हंस पर, शुक्रवार को मोर पर, शनिवार को हाथी पर और रविवार को मुर्गे और पूनम पर विराजमान रहती हैं।

हर पूर्णिमा को रात 9:30 बजे माताजी की पालकी निकलती है और पूरे गांव में घूमती है। चैत्र सूद पूनम और आश्विन सूद पूनम के दिन माताजी की सवारी शंखलपुर स्थानक तक बहुचराजी मंदिर से जाती है। नगर यात्रा के दौरान स्थानीय पुलिस व्यवस्था द्वारा माताजी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। दशहरे के दिन माताजी को नवलखा हार भेंट किया जाता है जो गायकवाड़ राज्य के समय का उपहार है और इस दिन माताजी की सवारी शस्त्र पूजन के लिए बेचर गांव के खिजड़ियाली नामक स्थान पर जाती है।

जय अम्बे जय गुरुदेव
जय बहुचर

आदित शाह

18/03/2026

शक्तिसाधना आप सभी माईभक्तो के लिए लेकर आ रहा है एक विशेष श्रेणी, जिसमें गुजरात के अलग अलग क्षेत्रों में स्थित शक्तिपीठों एवं सिद्धपीठो के विषय में आपको माहिती दी जाएगी । जय अंबे जय गुरुदेव।

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