Nitish Kumar

Nitish Kumar

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09/12/2025

...संसद के शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम् पर हुई विशेष चर्चा के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि दोनों सदनों में हो रही यह बहस आने वाली पीढ़ियों को इस राष्ट्रगीत के महत्व और इसकी ऐतिहासिक भूमिका से परिचित कराएगी। शाह ने कहा कि वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा है।

प्रियंका गांधी द्वारा लगाए गए आरोपों कि यह चर्चा बंगाल चुनाव को ध्यान में रखकर की जा रही है , जवाब देते हुए शाह ने कहा कि आजादी की लड़ाई के दौरान जहां भी क्रांतिकारी गुप्त बैठकों में जाते थे, वे सबसे पहले वंदे मातरम् गाते थे। यह केवल बंगाल या किसी चुनाव से जुड़ा मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे भारत की भावना है।

राज्यसभा में शाह ने कहा,
“हम सौभाग्यशाली हैं कि वंदे मातरम् पर चर्चा जैसे ऐतिहासिक क्षण के साक्षी हैं। जिन्हें इसकी जरूरत समझ नहीं आ रही, उन्हें अपनी समझ पर सवाल उठाना चाहिए।”

कांग्रेस पर निशाना साधते हुए शाह ने यह भी कहा कि जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियों को हटा दिया था, जिससे इसका मूल रूप बदल गया।

संसद में यह बहस लगातार गर्मा रही है, और सरकार इसे राष्ट्रभक्ति और ऐतिहासिक चेतना से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी एजेंडा बता रहा है।

15/10/2025

...आपको अनंत दादा जैसा स्वैग चाहिए तो कॉन्फिडेंस लेवल ऐसा होना चाहिए बस🫣🤣

03/09/2025

मगध विश्वविद्यालय का मैदान...
जहाँ कभी बच्चे खेलते थे, दौड़ते थे, वही मैदान आज गड्ढों का अड्डा बन गया है।
प्रधानमंत्री जी आए थे, लाखों रुपये खर्च कर टेंट और मंच सजाया गया, सुरक्षा और भीड़ का तामझाम हुआ।
लेकिन जब वो चले गए, तो मैदान की हालत ऐसी कर दी गई कि लोग पैदल चल भी नहीं सकते।

अब देखिए हाल :

बच्चे खुद बैल की तरह मेहनत करके गड्ढे भर रहे हैं।
उन्हें दौड़ना है, प्रैक्टिस करनी है, नौकरी के लिए तैयारी करनी है।
तो वो मिट्टी ढो-ढोकर मैदान को बराबर कर रहे हैं।
क्या यही है आत्मनिर्भर भारत?
क्या सरकार चाहती है कि अब गड्ढे भी युवा ही भरें?

जिस ज़मीन पर लंबा-लंबा भाषण हुआ, उसी ज़मीन पर उतने ही लंबे-लंबे गड्ढे छोड़ दिए गए।

Narendra Modi जी क्या यही संदेश देना था कि “बिहार की बनी-बनाई चीज़ों को भी तहस-नहस कर देंगे”?

जब आप आए, तो अपनी व्यवस्था ज़रूर पूछी होगी।
तो क्या आपने जाने के बाद एक बार भी इस मैदान की हालत जानने की कोशिश की?

क्या भाषण तक ही आपकी ज़िम्मेदारी है, उसके बाद का सच देखने की ज़रूरत नहीं?
अगर बिहार आकर सिर्फ़ मंच सजाकर ज़मीन बर्बाद करनी है, तो कृपया यहाँ मत आइए। जी हां मत आइए ,
बना नहीं सकते तो बिगाड़िए भी मत।

विश्वविद्यालय प्रशासन से भी सवाल कम नहीं हैं।
क्या आपकी जिम्मेदारी सिर्फ़ कार्यक्रम कराने तक थी?
क्या छात्रों को अब “गड्ढा दौड़” का नया खेल सिखाया जाएगा?
क्यों उतनी ही तत्परता से मैदान को वापस नहीं सुधारा गया, जितनी तत्परता से भाषण के लिए सजाया गया था?

आज मैदान की मिट्टी चिल्ला रही है –
“भाषण से सपने मत गढ़ो, पहले मेरे गड्ढे तो भरो।
हम नौकरी की दौड़ जीतना चाहते हैं, न कि गड्ढे भरने में ज़िंदगी गंवाना। "

ये वीडियो देखिए – बच्चे खुद मिट्टी उठा-उठाकर मैदान को बराबर कर रहे हैं।
क्योंकि उन्हें उम्मीद है, उन्हें दौड़ना है, उन्हें नौकरी पाना है।लेकिन क्या सरकार का काम अब सिर्फ़ गड्ढे खोदना और युवाओं का काम गड्ढे भरना ही रह गया है?

मोदी जी विकास तब कहलाता, जब जिस जोश और जोर-शोर से कार्यक्रम कराया गया, उसी ईमानदारी और तेजी से मैदान को ठीक भी कराया जाता।
वरना ये मैदान भी आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ़ “गड्ढों की याद” बनकर रह जाएगा।

यह तस्वीर बताती है कि बिहार में विकास की परिभाषा क्या रह गई है –
एक दिन की रौनक, और उसके बाद महीनों की बदहाली।
जिन योजनाओं का उद्घाटन भाषण में हुआ, जनता कैसे यकीन करे कि उनका हाल भी इस मैदान जैसा नहीं होगा?

बिहार का युवा मैदान समतल चाहता है, ताकि वह दौड़ सके।
पर सरकार उसे गड्ढे देकर कहती है – “मेरे भाई आत्मनिर्भर बनो।”

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