Dictator
क्या आप वास्तव में स्वतंत्र हो? सच बताइएगा आपके विचारों का स्वागत है!
मेरा विश्वास मानिए, ज़िंदगी के इस सफ़र में अपने किस्मत के हिस्से में आई सारी कथित लड़ाइयां आपको अकेले ही लड़नी होती हैं। कोई साथी नहीं होता। सब भ्रम है। सब मात्र भौतिक रूप में ही साथ होते हैं। किसी को नहीं पता होता, किसके भीतर क्या चल रहा है, कौन किस द्वंद्व में उलझा है, डूबा है, कौन कहां अटका है, कौन कहां भटका है...!
बाहर से अच्छे-अच्छे खूबसूरत कपड़ों, तेल-क्रीम/कॉस्मेटिक्स लगाए, पद के गहनों में ढके, मुस्कुराते हुए सारे लोग खूबसूरत लगते हैं। लेकिन सबके भीतर अलग-अलग स्तर के बहुआयामी युद्ध चल रहे होते हैं। अज्ञानतावश, हर व्यक्ति उन युद्धों में बुरी तरह घायल होता है।
जीवन के उस युद्ध में आप ही अर्जुन होते हैं और आप ही खुद के कृष्ण होते हैं। आपके भीतर बैठे कृष्ण के न जाग पाने की स्थिति में आप कमजोर पड़ने लगते हैं। अंधेरे में फटफटाने लगते हैं। अवसाद में चले जाते हैं। कई बार आत्महत्या कर लेते हैं।
इसलिए, जीवन में खुद को अर्जुन की तरह धनुर्धर बनाने के साथ-साथ भीतर के कृष्ण को जगाना न भूलें। बिना उनके लड़ाई अधूरी रह जाएगी। जीवन अंधेरे में ही बीत जाएगा, दूसरों को सिर्फ उतना ही महत्व दीजिए जितना उनका महत्व, बेवजह न आप दखल करें न करने दें।
इसलिए भीतर के कृष्ण को जगाइए। इसके लिए आप किसी भी क्षेत्र में हों, उस क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ-साथ खुद की आध्यात्मिक चेतना का भी अधिकतम विकास करिए। खुद की साधना करिए। खुद को साधिये। ताकि, जीवनपथ में कृष्ण मुस्कुराते हुए आपका (अर्जुन का) रथ हाकते चले..
Writer!!
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