Ayush Shows
*निवाला*
बड़ी बेचैनी से रात कटी। बमुश्किल सुबह थोड़ा दाल चावल खाकर, घर से अपने शोरूम के लिए निकला। आज किसी के पेट पर पहली बार लात मारने जा रहा हूँ। ये बात अंदर ही अंदर कचोट रही है।
ज़िंदगी में यही फ़लसफ़ा रहा मेरा कि, अपने आस पास किसी को, रोटी के लिए तरसना ना पड़े। पर इस विकट काल मे अपने पेट पर ही आन पड़ी है।
दो साल पहले ही अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर कपड़े का शोरूम खोला था। मगर दुकान के सामान की बिक्री, अब आधी हो गई है। अपने कपड़े के शोरूम में, दो लड़के और दो लड़कियों को रखा है मैंने। ग्राहकों को कपड़े दिखाने के लिए। लेडीज डिपार्टमेंट की दोनों लड़कियों को निकाल नहीं सकता। एक तो कपड़ो की बिक्री उन्हीं की ज्यादा है।
दूसरे वो दोनों बहुत गरीब हैं। दो लड़कों में से एक पुराना है, और वो घर में इकलौता कमाने वाला है। जो नया वाला लड़का है दीपक, मैंने विचार उसी पर किया है। शायद उसका एक भाई भी है, जो अच्छी जगह नौकरी करता है। और वो खुद, तेजतर्रार और हँसमुख भी है। उसे कहीं और भी काम मिल सकता है। इन सात महीनों में, मैं बिलकुल टूट चुका हूँ। स्थिति को देखते हुए एक वर्कर कम करना मेरी मजबूरी है। यही सब सोचता दुकान पर पहुंचा।
चारो आ चुके थे। मैंने चारो को बुलाया और बड़ी उदास हो बोल पड़ा..
"देखो, दुकान की अभी की स्थिति तुम सब को पता है, मैं तुम सब को काम पर नहीं रख सकता"
उन चारों के माथे पर चिंता की लकीरें, मेरी बातों के साथ गहरी होती चली गईं। मैंने बोतल के पानी से अपने गले को तर किया
"किसी एक का..हिसाब आज.. कर देता हूँ!दीपक तुम्हें कहीं और काम ढूंढना होगा"
"जी अंकल" उसे पहली बार इतना उदास देखा। बाकियों के चेहरे पर भी कोई खास प्रसन्नता नहीं थी। एक लड़की जो शायद उसी के मोहल्ले से आती है, कुछ कहते कहते रुक गई।
"क्या बात है, बेटी? तुम कुछ कह रही थी?
"अंकल जी, इसके भाई का..भी काम कुछ एक महीने पहले छूट गया है, इसकी मम्मी बीमार रहती है"
नज़र दीपक के चेहरे पर गई। आँखों में ज़िम्मेदारी के आँसू थे। जो वो अपने हँसमुख चेहरे से छुपा रहा था। मैं कुछ बोलता कि तभी एक और दूसरी लड़की बोल पड़ी,
"अंकल! बुरा ना माने तो एक बात बोलूं?"
"हाँ..हाँ बोलो ना!"
"किसी को निकालने से अच्छा है, हमारे पैसे कम कर दो..बारह हजार की जगह नौ हजार कर दो आप"
मैंने बाकियों की तरफ देखा
"हाँ साहब! हम इतने से ही काम चला लेंगे"
बच्चों ने मेरी परेशानी को, आपस में बांटने का सोच, मेरे मन के बोझ को कम जरूर कर दिया था।
"पर तुम लोगों को ये कम तो नहीं पड़ेगा न?"
"नहीं साहब! कोई साथी भूखा रहे..इससे अच्छा है, हम सब अपना निवाला थोड़ा कम कर दें"
मेरी आँखों में आंसू छोड़,ये बच्चे अपने काम पर लग गए, मेरी नज़रों में, मुझसे कहीं ज्यादा बड़े बनकर..!
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19/09/2024
सविता देवी एक शांत, पर अनुभवी गृहिणी थीं। उनके बेटे राहुल और बहू अंजली का विवाह हुए कुछ ही समय बीता था। अंजली अपने ससुराल में धीरे-धीरे खुद को ढाल रही थी, लेकिन सास-बहू के बीच कुछ छोटी-मोटी बातें थीं जो अक्सर अनबन का कारण बन जाती थीं।
एक दिन सुबह के वक्त, सविता देवी ने देखा कि अंजली कमरे में एसी चलाकर बाहर निकल गई थी। उन्होंने अंजलि को बुलाया और बोलीं, “अंजली, तुमने कमरे में एसी चलती छोड़ दी है। क्या तुम्हें पता नहीं है कि इसका कितना बिल आएगा? अगर तुम्हें खुद बिल भरना पड़ता, तो तुम ऐसा नहीं करती।”
अंजली थोड़ी असहज हो गई, लेकिन शांत रही। वह तुरंत कमरे में गई और एसी बंद कर दी। राहुल को लगा कि माँ की बातों से अंजली का मन खट्टा न हो जाए, इसलिए वह भी कमरे में गया और बोला, “अंजली, माँ की बातों का बुरा मत मानना।”
अंजली ने मुस्कुराते हुए कहा, “बुरा मानने वाली कौन सी बात है? मेरे मायके में भी मम्मी ऐसी ही बातें कहती थीं। पापा बिल भरते थे, तो हम भी लापरवाही कर लेते थे। यहाँ भी वही हुआ। माँ की चिंता जायज है, और गलती हमारी है कि हमने ध्यान नहीं दिया, अगर मैं एसी बन्द कर देती तो उनको बोलने का मौका ही नही मिलता”
राहुल को यह सुनकर खुशी हुई कि उसकी पत्नी कितनी समझदार और व्यावहारिक है। उसे लगा कि उसकी शादी सही और समझदार लड़की से हुई है।
सविता देवी ने भी बहू की बातों को सुन लिया था, और उनके दिल में कहीं न कहीं यह चिंता थी कि अंजली उनके बेटे से उनके खिलाफ कुछ कह न दे। लेकिन जब उन्होंने अंजली के विचार सुने, तो उन्हें भी संतोष हुआ कि उनकी बहू समझदार है।
कुछ दिनों बाद, एक और घटना घटी। सविता देवी फोन पर किसी रिश्तेदार से बात कर रही थीं। खाना ठंडा हो रहा था, और उन्हें दवाइयाँ भी लेनी थीं। अंजली ने यह देखा, तो उसने चुपचाप जाकर सविता देवी के हाथ से फोन ले लिया और प्यार से बोली, “मम्मी, पहले खाना खा लीजिए और दवाइयाँ ले लीजिए, फिर आराम से बात कर लेना।”
सविता देवी का चेहरा अचानक बदल गया। उन्होंने घूरते हुए कहा, “बहू हो तो बहू बनकर रहो। मेरी सास बनने की कोशिश मत करना। तुम मेरी माँ बनने की ज़रूरत नहीं। आइंदा ऐसी गलती मत करना।”
अंजली की आँखों में आँसू आ गए। वह चुपचाप रसोई में चली गई। थोड़ी देर बाद, सविता देवी को अंजली की बातें सुनाई दीं। वह अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी, “माँ, मैंने सासू माँ को भी आपकी तरह ही माँ माना है। मैं तो उनकी सेहत का ख्याल रखना चाहती थी। पर उन्होंने मुझे बहुत जोर से डांट दिया। माँ, मुझे समझ में आ गया है कि चाहे जितनी भी कोशिश कर लूँ, सास-ससुर शायद कभी बहू को बेटी की तरह नहीं मानते।"
उसकी बातें सुनकर सविता देवी का दिल पिघल गया। उन्होंने महसूस किया कि अंजली का कोई बुरा इरादा नहीं था। वह तो सिर्फ अपनी माँ की तरह उनका ख्याल रख रही थी। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
सविता देवी ने धीरे-धीरे कमरे में जाकर अंजली को गले से लगा लिया और कहा, “बेटा, मैं बहुत सख्त रही हूँ, मुझसे गलती हो गई। आज से तुम ही मेरी दवाइयों का ध्यान रखा करना, और अगर मैं समय पर दवाइयाँ न लूँ, तो मुझे वैसे ही डांट लगा देना जैसे अपनी माँ को लगाती थी। इस घर की ज़िम्मेदारी अब तुम्हारे हाथों में है, और मैं हर कदम पर तुम्हारे साथ हूँ।”
अंजली की आँखों में आँसू छलक पड़े, लेकिन यह आँसू खुशी के थे।
सविता देवी ने अपनी समझदारी से रिश्ते को बिखरने से पहले ही संभाल लिया। उन्होंने यह समझ लिया कि एक मजबूत परिवार बनाने के लिए दोनों तरफ से समझदारी और प्यार की जरूरत होती है। दोनों ने एक-दूसरे को अपना लिया और उनके बीच का रिश्ता और भी गहरा हो गया।
अगर कहानी अच्छी लगी हो तो प्लीज फॉलो कर दीजियेगा और मुझे अच्छा लगेगा और भी ऐसी कहानी आपके सामने प्रस्तुत करने में
आप सभी जा बहुत बहुत धन्यवाद..
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