Arya Vichar
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ११
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*ऊर्ध्वाऽअ॑स्य स॒मिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचीष्य॒ग्नेः। द्युमत्तमा सुप्रतीकस्य सूनोः ।।*
*भावार्थ :-*
हे मनुष्यो ! जो यह ऊपर को उठनेवाला सबके देखने का हेतु सबकी रक्षा का निमित्त अग्नि है, उसको जानके कार्यों को निरन्तर सिद्ध किया करो ।
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नमस्ते जी
वेद - यजुर्वेद
अध्याय - सप्तविंशोऽध्यायः
मन्त्र - ०७
भाष्यकार :- महर्षि दयानन्द सरस्वती ।
*अ॒नाधृष्यो जा॒तवे॑दा॒ऽअनिष्टृतो वि॒राडग्ने क्षत्रभृद्दिदिहीह । विश्वा॒ऽआशाः प्रमुञ्चन्मानु॑षीर्भियः शिवेभिर॒द्य परिपाहि नो वृधे ।।*
*भावार्थ :-*
जो राजा वा राजपुरुष प्रजाओं को सन्तुष्ट कर मङ्गलरूप आचरण करने और विद्याओं से युक्त न्याय में प्रसन्न रहते हुए प्रजाओं की रक्षा करें, वे सब दिशाओं में प्रवृत्त कीर्त्तिवाले होवें ।
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